पंजाब में कपास की बुवाई रिकॉर्ड निचले स्तर पर
पंजाब में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और धान जैसी अधिक पानी खपत वाली फसलों पर निर्भरता कम करने के सरकार के प्रयासों को झटका लगा है। 2026-27 के खरीफ सीजन में कपास की बुवाई रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। राज्य सरकार ने 1.25 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती का लक्ष्य रखा था, लेकिन 2 जून तक केवल 70,000 हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है, जो निर्धारित लक्ष्य का महज 56 प्रतिशत है।
कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, फाजिल्का जिले में सबसे अधिक 40,000 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती हुई है। इसके बाद बठिंडा, मानसा और श्री मुक्तसर साहिब जिलों में लगभग 10,000-10,000 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई दर्ज की गई है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम आंकड़े 15 जून के बाद सामने आएंगे, लेकिन रकबे में बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम है क्योंकि किसान कपास की खेती से दूरी बना रहे हैं।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले कई वर्षों से खराब मौसम, सफेद मक्खी और गुलाबी सुंडी जैसे कीटों के हमलों तथा आर्थिक नुकसान ने किसानों का भरोसा कमजोर कर दिया है। वर्ष 2025 में कीटों का बड़ा प्रकोप नहीं हुआ था, लेकिन अक्टूबर में कपास तुड़ाई के दौरान हुई बेमौसम बारिश ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। इससे उत्पादन और किसानों की आय दोनों प्रभावित हुईं।
पंजाब कृषि विभाग के उप निदेशक (कपास) चरणजीत सिंह ने कहा कि कपास का रकबा घटने से अधिक किसान धान की खेती की ओर रुख करेंगे, जिससे भूजल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि सरकार धान का क्षेत्र कम करने और वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर कीट-प्रतिरोधी और उच्च उत्पादकता वाली नई हाइब्रिड कपास किस्में भविष्य में किसानों का विश्वास वापस जीत सकती हैं। हालांकि, नकली बीजों की समस्या, बाजार में एमएसपी से कम कीमतें और लगातार फसल जोखिम अभी भी किसानों की सबसे बड़ी चिंताएं बनी हुई हैं।
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