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हनुमानगढ़ में भाखड़ा नहर का पानी शुरू, कपास और खरीफ बुवाई को मिलेगा फायदा

भाखड़ा नहर प्रणाली से आज से सिंचाई पानी:रोटेशन घोषित, कपास-नरमा की बुवाई के लिए किसानों को मिलेगा पानीहनुमानगढ़ में भाखड़ा नहर प्रणाली से जुड़े किसानों को आज गुरुवार से सिंचाई का पानी मिलना शुरू हो जाएगा। सिंचाई विभाग ने भाखड़ा प्रणाली का नया रोटेशन जारी किया है। इसके तहत 1200 क्यूसेक क्षमता वाली नहरों में पूरी क्षमता से पानी छोड़ा जाएगा, जबकि छोटी नहरों में उनकी क्षमता के अनुसार पानी उपलब्ध होगा।जल संसाधन भाखड़ा-सिद्धमुख रेगुलेशन खंड ने भाखड़ा प्रणाली की नहरों का साप्ताहिक वरीयताक्रम भी जारी कर दिया है। यह वरीयताक्रम 21 से 29 मई तक प्रभावी रहेगा।विभाग द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, रतनपुरा (आरटीपी) नहर में 42 क्यूसेक, नाथवाना (एनटीडब्ल्यू) में 73, प्रतापपुरा (पीटीपी) में 248, हरिपुरा (एचआरपी) में 261, दीनगढ़ (डीएनजी) में 274, सूरतपुरा (एसटीपी) में 283, मोडिया (एमओडी) में 508, लोंगवाला (एलजीडब्ल्यू) में 653, पीलीबंगा (पीबीएन) में 868, अमरपुरा (एएमपी) में 963, रोड़ांवाली (आरआरडब्ल्यू) में 976, नवां-सतीपुरा (एनडब्ल्यूएन) में 987, मोरजण्डा (एमजेडी) में 1200, नगराना (एनजीडी) में 1208, लीलांवाली (एलएलडब्ल्यू) में 1448, भाखरांवाली (बीकेडब्ल्यू) में 1453, करनीसिंह (केएसडी) में 1783, मम्मड़खेड़ा (एमएमके) में 1978, जोड़कियां (जेआरके) में 2058, सूरतगढ़ (एसटीजी) में 2178, भगतपुरा (बीजीपी) में 2216 और संगरिया (एसएनजी) नहर में 2222 क्यूसेक पानी प्रवाहित होगा।जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि प्रत्येक नहर को आठ दिन तक पूरी क्षमता से चलाने के बाद बंद किया जाएगा। नहरों में पानी के उतार-चढ़ाव की स्थिति में यदि किसी नहर के रेगुलेशन में बदलाव की आवश्यकता हुई, तो भाखड़ा सिद्धमुख रेगुलेशन खंड और जल संसाधन खंड प्रथम/द्वितीय के अधिशाषी अभियंता से विचार-विमर्श के बाद व्यवस्था की जाएगी।कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यह समय नरमा और कपास की बुवाई का है। सिंचाई के लिए पानी मिलने से किसानों को बड़ी सहायता मिलेगी।पिछले दिनों तेज गर्मी और पानी की कमी के कारण किसानों को खेतों की तैयारी में परेशानी हो रही थी। अब नहरों में पानी आने से बुवाई के कार्यों में तेजी आने की उम्मीद है।किसानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में पानी की आपूर्ति नियमित बनी रहती है तो कपास, नरमा और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई बेहतर तरीके से हो सकेगी, जिससे उत्पादन पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। इधर, भीषण गर्मी के बीच पानी की उपलब्धता बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में भी राहत मिलने की संभावना जताई जा रही हैऔर पढ़ें :- हरियाणा के किसान कपास छोड़ धान की खेती की ओर क्यों बढ़ रहे हैं

हरियाणा के किसान कपास छोड़ धान की खेती की ओर क्यों बढ़ रहे हैं

कपास से धान की ओर: हरियाणा के किसान अपना रास्ता क्यों बदल रहे हैं।2020 और 2025 के बीच, हरियाणा के फसल पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। चावल की खेती का रकबा 2020 में 1,525.77 हेक्टेयर से बढ़कर 2025 में 1,867.51 हेक्टेयर हो गया, जबकि कपास का रकबा 719.86 हेक्टेयर से घटकर सिर्फ़ 401.05 हेक्टेयर रह गया। यह बदलाव किसानों की धान के लिए बढ़ती पसंद को दिखाता है, जिससे पक्की खरीद और स्थिर रिटर्न मिलता है। इसके उलट, कीड़ों के हमलों, Bt-कॉटन की घटती रेज़िस्टेंस और खेती में बढ़ते नुकसान के कारण कपास तेज़ी से फ़ायदेमंद नहीं रहा है।धान सबसे पहली पसंद क्यों है?किसान धान चुनने का मुख्य कारण मुनाफ़ा बताते हैं। किसानों के संगठन पगड़ी संभाल जट्टा किसान संघर्ष समिति के प्रेसिडेंट मंदीप नाथवान के मुताबिक, धान से हर एकड़ करीब 80,000 रुपये की इनकम हो सकती है, जिसमें खर्च निकालने के बाद भी करीब 50,000 रुपये का प्रॉफिट होता है।कुरुक्षेत्र के किसान एक्टिविस्ट राकेश बैंस भी यही बात कहते हैं, उनका कहना है कि दूसरी फसलों से हर एकड़ सिर्फ 50,000 रुपये ही मिलते हैं, जबकि धान से 80,000 रुपये मिलते हैं, जिससे चावल ज़्यादा अच्छा ऑप्शन बन गया है।हरियाणा के किसानों ने कौन सी फसलें छोड़ी हैं?इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) के पुराने साइंटिस्ट वीरेंद्र लाठेर बताते हैं कि हाल के सालों में किसानों ने कपास, मक्का, ज्वार, दालें और तिलहन छोड़कर धान की खेती शुरू कर दी है, जिसमें कपास की खेती सबसे ज़्यादा कम हुई है।BT-कॉटन, जो कभी पिंक बॉलवर्म जैसे कीड़ों के लिए रेज़िस्टेंट था, अब अपना असर खो चुका है क्योंकि कीड़ों ने समय के साथ खुद को ढाल लिया है। किसान अब पेस्टिसाइड पर बहुत ज़्यादा खर्च करते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें प्रति एकड़ सिर्फ़ दो क्विंटल पैदावार मिलती है, जो मुनाफ़े के लिए ज़रूरी आठ क्विंटल से बहुत कम है। इससे उन्हें प्रति एकड़ लगभग 15,000 रुपये का नुकसान होता है।सरकार ने फ़सलों में अलग-अलग तरह के बदलाव को बढ़ावा देने के लिए क्या किया है?ज़्यादा पानी वाली धान की खेती करने वाले किसानों के खतरों को समझते हुए, हरियाणा सरकार ने अलग-अलग तरह के बदलाव को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए हैं। ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ स्कीम के तहत, किसानों को दालें, कपास और मक्का जैसी कम पानी वाली फ़सलें उगाने के लिए प्रति एकड़ 8,000 रुपये मिलते हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने हाल ही में घोषणा की कि इस स्कीम के तहत 2.20 लाख एकड़ में 157 करोड़ रुपये बांटे गए हैं। एक्स्ट्रा फ़ायदों में माइक्रो-इरिगेशन टेक्नोलॉजी, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और तालाब बनाने के लिए 85 परसेंट तक की सब्सिडी शामिल है।एक्सपर्ट्स और किसान क्या सुझाव देते हैं? चावल की खेती में सस्टेनेबल तरीकों को बढ़ावा देने के लिए, सरकार डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) अपनाने पर हर एकड़ 4,000 रुपये देती है, जिसमें पारंपरिक रोपाई के मुकाबले कम पानी लगता है। हालांकि, वीरेंद्र लाठेर जैसे एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसानों का व्यवहार बदलने के लिए यह इंसेंटिव बहुत कम है और वे हरियाणा के गिरते वॉटर लेवल को ठीक करने के लिए पारंपरिक धान की खेती पर रोक लगाने का भी सुझाव देते हैं। वहीं, किसान इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अगर डायवर्सिफिकेशन को सफल बनाना है तो दूसरी फसलों के लिए बेहतर मार्केटिंग और खरीद की सुविधाएं ज़रूरी हैं।और पढ़ें :- भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 8 पैसे गिरकर 96.28 पर खुला

राजस्थान में भाखड़ा नहर से सिंचाई जल आपूर्ति शुरू, कपास और नरमा की बुवाई को मिलेगा बढ़ावा

राजस्थान: भाखड़ा नहर प्रणाली से आज से सिंचाई पानी, कपास-नरमा की बुवाई को मिलेगी रफ्तारहनुमानगढ़ जिले के किसानों के लिए राहत भरी खबर है। भाखड़ा नहर प्रणाली से गुरुवार से सिंचाई के लिए पानी की आपूर्ति शुरू हो गई है। जल संसाधन विभाग ने भाखड़ा प्रणाली का नया रोटेशन जारी करते हुए 21 से 29 मई तक का साप्ताहिक वरीयताक्रम घोषित किया है। इसके तहत 1200 क्यूसेक क्षमता वाली नहरों को पूरी क्षमता से चलाया जाएगा, जबकि छोटी नहरों में तय क्षमता के अनुसार पानी छोड़ा जाएगा।विभाग के अनुसार रतनपुरा नहर में 42 क्यूसेक, नाथवाना में 73, प्रतापपुरा में 248, हरिपुरा में 261, दीनगढ़ में 274 और सूरतपुरा में 283 क्यूसेक पानी प्रवाहित किया जाएगा। वहीं मोडिया, लोंगवाला, पीलीबंगा, अमरपुरा और रोड़ांवाली जैसी प्रमुख नहरों में भी पर्याप्त मात्रा में पानी छोड़ा जाएगा। सबसे अधिक 2222 क्यूसेक पानी संगरिया नहर में प्रवाहित होगा।अधिकारियों ने बताया कि प्रत्येक नहर को आठ दिन तक पूरी क्षमता से चलाने के बाद बंद किया जाएगा। यदि पानी के स्तर में बदलाव होता है तो संबंधित अधिकारियों से चर्चा के बाद रेगुलेशन में आवश्यक परिवर्तन किए जाएंगे।कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान समय नरमा और कपास की बुवाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ दिनों से भीषण गर्मी और पानी की कमी के कारण किसानों को खेत तैयार करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। अब नहरों में पानी आने से बुवाई कार्य में तेजी आने की उम्मीद है।किसानों ने उम्मीद जताई है कि यदि आने वाले दिनों में पानी की आपूर्ति नियमित बनी रही तो कपास, नरमा और अन्य खरीफ फसलों का उत्पादन बेहतर होगा। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बढ़ने से लोगों को गर्मी से भी राहत मिलेगी।और पढ़ें:- भारत को टेक्सटाइल कचरे का ‘डंपिंग ग्राउंड’ बताना भ्रामक: केंद्र सरकार

भारत को टेक्सटाइल कचरे का ‘डंपिंग ग्राउंड’ बताना भ्रामक: केंद्र सरकार

भारत को टेक्सटाइल कचरे का डंपिंग ग्राउंड बताना भ्रामक: केंद्र सरकारनई दिल्ली: केंद्र सरकार ने भारत के टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग इकोसिस्टम का बचाव करते हुए कहा है कि देश को टेक्सटाइल कचरे का “डंपिंग ग्राउंड” बताना भ्रामक और तथ्यों से परे है। टेक्सटाइल मंत्रालय ने गुरुवार को जारी बयान में कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े टेक्सटाइल रिकवरी और रीसाइक्लिंग नेटवर्क में शामिल है, जिसे लंबे समय से चले आ रहे पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण तंत्र का समर्थन प्राप्त है।मंत्रालय ने कहा कि हाल ही में कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में पानीपत जैसे टेक्सटाइल क्लस्टरों को केंद्र में रखकर पर्यावरण और श्रमिक सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, जबकि सेक्टर में सस्टेनेबिलिटी, नियामकीय सुधार और नई तकनीकों के उपयोग की दिशा में हुई प्रगति को नजरअंदाज किया गया।सरकार ने स्पष्ट कहा कि भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को पर्यावरण के प्रति लापरवाह या संरचनात्मक रूप से शोषणकारी बताना गलत है और इससे इस क्षेत्र में जारी सुधारात्मक प्रयासों और सस्टेनेबिलिटी आधारित पहलों की अनदेखी होती है।मंत्रालय के अनुसार, भारत में हर वर्ष लगभग 7,073 किलो टन टेक्सटाइल कचरा उत्पन्न होता है। “मैपिंग ऑफ टेक्सटाइल वेस्ट वैल्यू चेन इन इंडिया 2026” अध्ययन का हवाला देते हुए सरकार ने बताया कि विनिर्माण प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाले प्री-कंज्यूमर टेक्सटाइल वेस्ट का करीब 97 प्रतिशत हिस्सा पुनर्चक्रित किया जाता है।सरकार ने उन दावों को भी खारिज किया कि भारत पश्चिमी देशों के फास्ट फैशन कचरे का प्रमुख ठिकाना बन रहा है। मंत्रालय के अनुसार, देश में प्रबंधित किए जाने वाले लगभग 7.8 मिलियन टन टेक्सटाइल कचरे में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा घरेलू स्तर पर उत्पन्न होता है, जबकि आयातित कचरे की हिस्सेदारी केवल लगभग 7 प्रतिशत है।फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए मंत्रालय ने कहा कि टेक्सटाइल वेस्ट इकोसिस्टम से देश में प्रतिवर्ष लगभग 22,000 करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न होती है।सरकार ने आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं के अध्ययन का भी उल्लेख किया, जिसमें पानीपत क्लस्टर के आंकड़ों के आधार पर पाया गया कि टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से वर्जिन फाइबर उत्पादन की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन उपयोग जैसे पर्यावरणीय प्रभावों में लगभग 40 प्रतिशत तक कमी आती है।हालांकि सरकार ने यह स्वीकार किया कि पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट मैनेजमेंट, असंगठित इकाइयों और श्रमिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन उद्योग लगातार अधिक औपचारिक व्यवस्था, स्वच्छ तकनीक और बेहतर पर्यावरणीय अनुपालन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।मंत्रालय ने कहा कि टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग इकाइयां मौजूदा पर्यावरण और श्रम कानूनों के तहत संचालित होती हैं तथा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) सहित विभिन्न नियामक एजेंसियां नियमों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई कर रही हैं।और पढ़ें:- रुपया डॉलर के मुकाबले 10 पैसे की बढ़त के साथ 96.20 पर बंद हुआ।

भारत टेक्स 2026 के लिए टेक्सटाइल मंत्रालय ने लॉन्च किया AI आधारित स्मार्ट ऐप

कपड़ा मंत्रालय ने Bharat Tex 2026 के लिए AI-संचालित स्मार्ट ऐप लॉन्च कियाकपड़ा मंत्रालय ने Ministry of Textiles के तहत आयोजित होने वाले वैश्विक टेक्सटाइल इवेंट Bharat Tex 2026 के लिए एक AI-संचालित स्मार्ट इवेंट ऐप लॉन्च किया है। इस ऐप का उद्देश्य पूरे आयोजन को अधिक डिजिटल, इंटरैक्टिव और व्यवसायिक रूप से प्रभावी बनाना है, ताकि प्रदर्शकों, खरीदारों, प्रतिनिधियों, सोर्सिंग विशेषज्ञों, वक्ताओं और आगंतुकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके।इस प्लेटफ़ॉर्म की सबसे प्रमुख विशेषता इसका AI-आधारित स्मार्ट असिस्टेंट है, जो 24×7 संवादात्मक सहायता प्रदान करता है। उपयोगकर्ता सरल भाषा में प्रश्न पूछकर कार्यक्रम की समय-सारणी, स्थल की जानकारी, दिशा-निर्देश, सेवाओं और अन्य आवश्यक विवरण तुरंत प्राप्त कर सकते हैं। इससे प्रतिभागियों को इवेंट के दौरान जानकारी खोजने में समय नहीं गंवाना पड़ता और उनका अनुभव अधिक सहज बनता है।ऐप में एक मजबूत बिज़नेस नेटवर्किंग सिस्टम भी शामिल किया गया है, जो प्रदर्शकों और खरीदारों को संभावित व्यावसायिक साझेदारों की पहचान करने, बैठकें तय करने और अपनी उपलब्धता को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने की सुविधा देता है। सभी मीटिंग्स और इंटरैक्शन को डिजिटल रूप से ट्रैक किया जा सकता है, जिससे व्यापारिक गतिविधियों में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ती है।प्रदर्शकों के लिए ‘लीड वॉलेट’ और QR-आधारित लीड कैप्चर सिस्टम भी उपलब्ध है, जिसके माध्यम से वे विज़िटर के डिजिटल बैज स्कैन करके संपर्क जानकारी सुरक्षित रूप से संग्रहित कर सकते हैं। इससे इवेंट के बाद फॉलो-अप प्रक्रिया सरल और अधिक प्रभावी हो जाती है।इसके अतिरिक्त, ऐप में इंटरैक्टिव फ्लोर प्लान, बूथ लोकेशन सर्च और स्टॉल-स्तरीय नेविगेशन जैसी सुविधाएँ भी दी गई हैं। अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए ‘Exhibitor Discovery Module’ उपलब्ध है, जिससे वे कंपनियों को श्रेणी, नाम और उत्पाद प्रकार के आधार पर खोज सकते हैं। रियल-टाइम अपडेट, व्यक्तिगत शेड्यूल और अलर्ट सिस्टम इस प्लेटफ़ॉर्म को और भी उन्नत बनाते हैं, जिससे Bharat Tex 2026 एक स्मार्ट और वैश्विक व्यापार मंच के रूप में उभरता है।और पढ़ें:- कपास की समय पर बुवाई से किसानों को होगा अधिक लाभ, वैज्ञानिकों की सलाह

कपास की समय पर बुवाई से किसानों को होगा अधिक लाभ, वैज्ञानिकों की सलाह

कपास की खेती से किसानों को बेहतर मुनाफा, वैज्ञानिकों ने दी समय पर बुवाई की सलाहखरीफ सीजन नजदीक आने के साथ ही कपास की खेती को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। जिले में किसान अब कपास की बुवाई की ओर ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि यह फसल आर्थिक दृष्टि से लाभकारी मानी जाती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, क्षेत्र की जलवायु कपास उत्पादन के लिए अनुकूल है और सही समय पर बुवाई करने से पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह ने किसानों को सलाह दी है कि वे 25 मई के बाद कपास की बुवाई शुरू करें। उन्होंने बताया कि इस अवधि में तापमान धीरे-धीरे कम होने लगता है और मानसून की शुरुआती गतिविधियां भी शुरू हो जाती हैं, जो बीज अंकुरण और पौधों की शुरुआती वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती हैं। ऐसे समय में की गई बुवाई फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों के लिए लाभकारी साबित होती है।वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि किसानों को कपास की बुवाई जून महीने के अंत तक हर हाल में पूरी कर लेनी चाहिए। यदि बुवाई में देरी होती है, तो उसका सीधा असर फसल की वृद्धि और उत्पादन क्षमता पर पड़ता है। देर से बोई गई फसल में पौधों की बढ़वार कमजोर हो जाती है, जिससे पैदावार कम हो जाती है।हालांकि खेती की लागत लगभग समान ही रहती है, लेकिन उत्पादन घटने से किसानों का लाभ कम हो जाता है। इसलिए समय पर बुवाई को कपास की सफल खेती का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है। विशेषज्ञों ने किसानों को सही तकनीक और समय प्रबंधन अपनाकर अधिक मुनाफा कमाने की सलाह दी है, ताकि वे कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकें।और पढ़ें:- कपास आयात शुल्क हटाने से किसानों को भारी नुकसान होगा: CPI

कपास आयात शुल्क हटाने से किसानों को भारी नुकसान होगा: CPI

केंद्र का कपास पर से इंपोर्ट ड्यूटी हटाने का कदम किसानों को बुरी तरह प्रभावित करेगा: CPI को आशंकाआंध्र प्रदेश : मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से हस्तक्षेप की अपील करते हुए, CPI नेता ईश्वरैया ने कहा कि 2026 के खरीफ सीज़न के दौरान इंपोर्ट ड्यूटी और एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदियों में और ढील देने से कृषि संकट और गहरा जाएगा।CPI के प्रदेश सचिव जी. ईश्वरैया ने मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू से हस्तक्षेप करने और कपास पर लगी 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाने तथा भारत से कपास के एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदियों को हटाने वाले प्रस्तावों को वापस लेने का आग्रह किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे कदमों से कपास किसानों को भारी नुकसान होगा।बुधवार को मुख्यमंत्री को लिखे एक पत्र में, श्री ईश्वरैया ने उन रिपोर्टों का ज़िक्र किया जिनमें कहा गया था कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने केंद्रीय मंत्री किंजरापु राममोहन नायडू, सांसद लावु श्री कृष्ण देवरायालु और अन्य लोगों के साथ कपास की कीमतों को स्थिर करने के उपायों पर चर्चा की थी। रिपोर्टों के अनुसार, कपास पर लगी 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाने और एक्सपोर्ट को विनियमित करने के प्रस्ताव रखे गए थे।श्री ईश्वरैया ने कहा कि कपास व्यापारी, स्पिनिंग मिलें और कपड़ा निगम सस्ते विदेशी कपास से फ़ायदा उठा रहे हैं, जबकि घरेलू किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कीमतों में भारी गिरावट के बाद माल बिक न पाने के कारण 'कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया' को भी काफ़ी नुकसान हुआ है।प्रस्तावित उपायों को "किसान-विरोधी और कॉरपोरेट-समर्थक" बताते हुए, CPI नेता ने चेतावनी दी कि 2026 के खरीफ सीज़न के दौरान इंपोर्ट ड्यूटी और एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदियों में और ढील देने से कृषि संकट और गहरा जाएगा, और कपास उगाने वाले किसानों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।और पढ़ें:- तमिलनाडु में कपास की कीमतें आसमान छू गईं, ₹10,761 प्रति क्विंटल तक पहुंचीं।

तमिलनाडु में कपास की कीमतें आसमान छू गईं, ₹10,761 प्रति क्विंटल तक पहुंचीं।

तमिलनाडु: कॉटन की कीमत नई ऊंचाई पर; Rs10,761 प्रति क्विंटल बिकाचेन्नई: कॉटन की कीमतें नई ऊंचाई पर पहुंच गई हैं, विल्लुपुरम में रेगुलेटेड मार्केट ऑक्शन में कॉटन Rs 10,761 प्रति क्विंटल बिका। कीमतों में तेज बढ़ोतरी से टेक्सटाइल मिलों में चिंता फैलना तय है, लेकिन इससे किसानों और व्यापारियों में उत्साह है।डेली थांथी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑक्शन के दौरान, कुड्डालोर, रानीपेट, तिरुवन्नामलाई और पेरम्बलुर जैसे कॉटन की खेती वाले हब से किसान अपनी उपज मार्केट में लाते हैं।पिछले साल का रिकॉर्ड पार कियाआमतौर पर, कॉटन Rs 9,000 से Rs 1,000 प्रति क्विंटल के बीच बिकता है। उदाहरण के लिए, अधिकारियों ने कहा कि पिछले साल मार्केट में सबसे ज्यादा कीमत Rs 9,700 थी। हालांकि, इस साल डिमांड बढ़ने से कीमत में उछाल आया है। तिरुपुर, थेनी और कई दूसरी जगहों से व्यापारी बड़ी संख्या में विल्लुपुरम मार्केट में आए हैं। इस सीज़न में डिमांड बढ़ने से व्यापारियों के बीच मुकाबला तेज़ हो गया है, जो अच्छी क्वालिटी का कॉटन खरीदने के लिए एक-दूसरे से ज़्यादा बोली लगाने की कोशिश कर रहे हैं।कीमत और बढ़ने की संभावना1 अप्रैल से शुरू हुआ कॉटन बेचने का सीज़न जून तक चलेगा। अधिकारियों ने कहा कि अगर डिमांड का मौजूदा ट्रेंड जारी रहता है और आवक कम रहती है, तो आने वाले हफ़्तों में भी कॉटन की कीमतें ज़्यादा रह सकती हैं।इस बीच, किसानों ने रिकॉर्ड तोड़ कीमतों में बढ़ोतरी पर खुशी जताई और कहा कि बेहतर रेट से उन्हें खेती का खर्च निकालने में मदद मिलेगी और इस सीज़न में बेहतर इनकम होगी।और पढ़ें :-डॉलर के मुकाबले रुपया 52 पैसे बढ़त 96.30 पर खुला.

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