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CCI ने कपास के दाम ₹300 बढ़ाए

CCI ने कॉटन कैंडी की कीमतें ₹300 प्रति कैंडी बढ़ाईं; साप्ताहिक नीलामी में बिक्री 2.69 लाख गांठ तक पहुंचीकॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (CCI) ने 9 अक्टूबर 2026 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान अपनी कपास (कॉटन) की बिक्री कीमत में ₹300 प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। इस सप्ताह के दौरान, CCI ने अपनी नीलामी के ज़रिए 2025–26 की फसल से लगभग **2,69,400 गांठ** कपास बेची।## CCI नीलामी का दिन-वार प्रदर्शन**5 अक्टूबर 2026 (सोमवार)**CCI ने सप्ताह की शुरुआत 1,200 गांठों की बिक्री के साथ की, जिन्हें पूरी तरह से मिलों ने खरीदा।**6 अक्टूबर 2026 (मंगलवार)**नीलामी की गतिविधि में तेज़ी आई और कुल बिक्री 36,800 गांठ तक पहुँच गई। मिलों ने 20,400 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 16,400 गांठें खरीदीं।**7 अक्टूबर 2026 (बुधवार)**CCI ने सप्ताह की सबसे ज़्यादा दैनिक बिक्री दर्ज की, जिसमें 96,400 गांठें बिकीं। इनमें से मिलों ने 43,400 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 53,000 गांठें खरीदीं।**8 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)**CCI ने 86,000 गांठें बेचीं, जिनमें मिलों द्वारा खरीदी गई 48,900 गांठें और व्यापारियों द्वारा खरीदी गई 37,100 गांठें शामिल थीं।**9 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)**सप्ताह का समापन 49,000 गांठों की बिक्री के साथ हुआ। मिलों ने 22,000 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने बाकी बची 27,000 गांठें खरीदीं।## कुल बिक्रीहालिया नीलामी गतिविधि के बाद, 2025–26 सीज़न के लिए CCI की कुल कपास बिक्री लगभग **97.16 लाख गांठ** तक पहुँच गई।

कपास उत्पादन में सिरसा पहले स्थान पर

हरियाणा में कपास के क्षेत्रफल और उत्पादन में सिरसा अव्वल, 3.61 लाख एकड़ में बुवाईसिरसा, हरियाणा:खरीफ सीजन 2025-26 की अस्थायी रिपोर्ट के अनुसार, सिरसा जिला कपास की खेती के क्षेत्रफल और कुल उत्पादन, दोनों मामलों में हरियाणा में पहले स्थान पर है। जिले में 3,61,336 एकड़ क्षेत्र में कपास की बुवाई दर्ज की गई है, जबकि अनुमानित उत्पादन 2,00,567.98 मीट्रिक टन है।रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा में कपास का कुल क्षेत्रफल 9,71,970 एकड़ और अनुमानित उत्पादन 4,96,418.70 मीट्रिक टन दर्ज किया गया है। क्षेत्रफल के मामले में सिरसा के बाद हिसार दूसरे और भिवानी तीसरे स्थान पर हैं।हिसार में 2,09,827 एकड़ और भिवानी में 1,11,891 एकड़ क्षेत्र में कपास की खेती दर्ज की गई है। वहीं, फतेहाबाद 90,624 एकड़ के साथ चौथे और चरखी दादरी 39,520 एकड़ के साथ पांचवें स्थान पर है।औसत उपज में नूंह सबसे आगेप्रति एकड़ औसत कपास उपज के मामले में नूंह (मेवात) जिला 694.49 किलोग्राम के साथ प्रदेश में पहले स्थान पर है। हरियाणा की औसत उपज 510.73 किलोग्राम प्रति एकड़ दर्ज की गई है। इससे स्पष्ट है कि कुल उत्पादन और औसत उपज के मामले में प्रदेश के अलग-अलग जिले आगे हैं।2020-21 में भी कपास की खेती में प्रमुख रहा सिरसावर्ष 2020-21 की संशोधित रिपोर्ट के अनुसार, सिरसा में कपास का क्षेत्रफल 209.10 हजार हेक्टेयर और औसत उपज 406 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई थी। उस वर्ष हरियाणा का कुल कपास क्षेत्रफल 719.86 हजार हेक्टेयर था।खरीफ सीजन 2025-26 के ये आंकड़े अस्थायी हैं। अंतिम रिपोर्ट जारी होने पर क्षेत्रफल, उत्पादन और उपज से संबंधित आंकड़ों में बदलाव संभव है।और पढ़ें :- अकोला में कपास किसानों को 70% नुकसान का डर

अकोला में कपास किसानों को 70% नुकसान का डर

अकोला में कपास किसानों पर सूखे की मार, 70% तक नुकसान की आशंका महाराष्ट्र के अकोला जिले में लंबे समय तक बारिश नहीं होने और बढ़ते तापमान के कारण कपास की फसल प्रभावित हुई है। पिछले सीजन में अच्छे बाजार भाव से किसानों को बेहतर कमाई हुई थी, लेकिन इस साल सूखे की स्थिति ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। किसानों के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में कपास की फसल को 70% तक नुकसान होने की आशंका है।पिछले सीजन में भारतीय कपास निगम (CCI) के खरीद मूल्य के तहत किसानों को लगभग ₹8,000 प्रति क्विंटल मिले थे। वहीं, अगस्त तक कपास का स्टॉक रोककर रखने वाले कुछ किसानों को ₹10,000 प्रति क्विंटल तक भाव मिलने की बात सामने आई थी। बेहतर कमाई से उत्साहित होकर क्षेत्र के कई किसानों ने हाई-डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS), जिसे 'अकोला मॉडल' भी कहा जाता है, को अपनाया था।सूखे से पारंपरिक और HDPS खेती प्रभावितसामान्य परिस्थितियों में पारंपरिक कपास खेती से प्रति एकड़ लगभग 8 क्विंटल उत्पादन मिल सकता है, जबकि HDPS के तहत 12 से 18 क्विंटल प्रति एकड़ उपज मिलने का दावा किया जाता है। हालांकि, इस सीजन लंबे समय तक बारिश नहीं होने से दोनों पद्धतियों से उगाई गई फसल प्रभावित हुई है।किसानों के मुताबिक, कपास के पौधे अपेक्षित ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाए हैं। समय से पहले डोडे फटने और पौधों की वृद्धि रुकने से उत्पादन तथा रेशे की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ गई है। मिट्टी में नमी की कमी के कारण पत्तियां, फूल और छोटे डोडे सूखकर गिर रहे हैं।अकोला के कपास उत्पादक और HDPS को शुरुआती दौर में अपनाने वालों में शामिल दिलीप ठाकरे ने बताया कि इस साल प्रति एकड़ केवल 2 से 4 क्विंटल उपज मिलने की आशंका है। उनके अनुसार, HDPS वाले खेतों में भी फसल की स्थिति अच्छी नहीं है, हालांकि अधिक पौधों के कारण इस पद्धति से कुछ बेहतर उत्पादन मिलने की उम्मीद है।लंबे समय से बारिश नहीं होने से फसल पर असरदिलीप ठाकरे के मुताबिक, जिले के खारे पानी वाले क्षेत्र में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। उन्होंने बताया कि उनके क्षेत्र में लगभग 70 दिनों से बारिश नहीं हुई है, जिससे कपास की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा है।सांगवी बाजार क्षेत्र के किसान डॉ. पुरुषोत्तम मधुकर काले पारंपरिक तरीके से कपास की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि बारिश की कमी से पौधों की वृद्धि प्रभावित हुई है और इस साल प्रति एकड़ केवल 2 से 3 क्विंटल उपज मिलने की उम्मीद है। उनके अनुसार, HDPS वाली फसल की स्थिति भी खराब है, हालांकि इससे कुछ बेहतर उत्पादन मिल सकता है।कीटों के हमले से बढ़ी खेती की लागतसूखे के साथ कीटों के हमले ने भी किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। फसल बचाने के लिए बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है। खाद, मजदूरी और कीटनाशकों पर खर्च करने के बावजूद किसानों को इस साल निवेश की भरपाई करना मुश्किल लग रहा है।उरल गांव के किसान दिलीप पटोकर ने बताया कि बार-बार छिड़काव के कारण खर्च बढ़ गया है और परिवार का रोजमर्रा का खर्च चलाना भी चिंता का विषय बन गया है। वहीं, अंडुरा गांव के शालिग्राम भगत ने कहा कि नमी की कमी और बढ़ते तापमान के कारण पत्तियां, फूल और छोटे कपास के डोडे झड़ गए हैं।किसानों का कहना है कि लंबे समय तक बारिश की कमी और मिट्टी में नमी के अभाव के सामने खेती की कोई भी पद्धति पूरी तरह नुकसान से नहीं बचा सकती। मौजूदा स्थिति ने अकोला के कपास उत्पादकों के सामने कम उत्पादन, बढ़ती लागत और आय में गिरावट की गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।और पढ़ें :- Texprocil का कस्तूरी कॉटन पर फोकस

Texprocil का कस्तूरी कॉटन पर फोकस

टेक्सप्रोसिल कस्तूरी कॉटन की ब्रांडिंग बढ़ाने और FTA के लाभ उठाने पर देगा जोरकॉटन टेक्सटाइल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (टेक्सप्रोसिल) अगले दो वर्षों में 'कस्तूरी कॉटन भारत' के तहत ब्रांडिंग के योग्य कपास की मात्रा बढ़ाने और मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) से भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को मिलने वाले लाभों का बेहतर उपयोग करने पर ध्यान देगी। परिषद के नवनिर्वाचित चेयरमैन रवि सैम ने इन दोनों क्षेत्रों को उद्योग के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया है।रवि सैम के अनुसार, ब्रांडिंग के लिए प्रस्तुत की जाने वाली कपास में से 50% से भी कम निर्धारित मानकों और गुणवत्ता परीक्षणों पर खरी उतरती है। इसलिए कस्तूरी कॉटन के रूप में ब्रांडिंग के योग्य कपास की मात्रा बढ़ाने के लिए गुणवत्ता सुधार पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय रिटेल ब्रांडों को भी कस्तूरी कॉटन की गुणवत्ता पहचाननी चाहिए और इसके उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। इस ब्रांड की प्रमुख विशेषताओं में ट्रेसेबिलिटी शामिल है, जिसके माध्यम से कपास के स्रोत और उसकी आपूर्ति श्रृंखला का पता लगाया जा सकता है। इससे उत्पाद की पहचान और गुणवत्ता के प्रति भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।किसानों को भी मिले कस्तूरी कॉटन का प्रीमियमरवि सैम ने कहा कि कस्तूरी कॉटन की ब्रांडिंग की प्रक्रिया जिनिंग इकाइयों से शुरू होती है। हालांकि, इस पहल का लाभ किसानों तक पहुंचाना भी जरूरी है। कपास में कचरे की मात्रा कम करने और फाइबर की गुणवत्ता बेहतर बनाने में किसानों की अहम भूमिका होती है।उन्होंने जोर दिया कि किसानों को भी कस्तूरी कॉटन से मिलने वाले प्रीमियम का उचित हिस्सा मिलना चाहिए। जिनर्स और टेक्सटाइल वैल्यू चेन के अन्य भागीदारों को मिलने वाले लाभ के साथ किसानों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इससे किसानों को कपास की गुणवत्ता सुधारने और बेहतर उत्पादन पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।उन्होंने सरकार से बाजार में नकली कपास बीजों की उपलब्धता पर नियंत्रण करने की अपील की। साथ ही, अनुमोदित बीज किस्मों की संख्या को तर्कसंगत बनाने पर जोर दिया, ताकि किसानों को सही बीज चुनने में आसानी हो।FTA से निर्यात के अवसर बढ़ाने पर जोरमुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के संबंध में रवि सैम ने कहा कि भारतीय टेक्सटाइल निर्यातकों को लंबे समय तक ब्रिटेन और यूरोपीय बाजारों में आयात शुल्क के कारण प्रतिस्पर्धात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारत के व्यापार समझौतों से मिलने वाले अवसरों का उद्योग को बेहतर उपयोग करना चाहिए।उन्होंने बताया कि भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के दक्षिणी क्षेत्र ने निर्यातकों को FTA की शर्तों, प्रक्रियाओं और संभावित लाभों की जानकारी देने के लिए विशेष सत्र शुरू किए हैं। इन सत्रों से निर्यातकों को संबंधित समझौतों के प्रावधानों को समझने और उनका लाभ उठाने में मदद मिल सकती है।रवि सैम के अनुसार, कस्तूरी कॉटन की ब्रांडिंग को मजबूत करना, किसानों को उचित आर्थिक लाभ दिलाना और FTA के माध्यम से निर्यात के अवसर बढ़ाना टेक्सप्रोसिल के लिए अगले दो वर्षों की प्रमुख प्राथमिकताएं होंगी।और पढ़ें :- आंध्र प्रदेश के 388 मंडल सूखा प्रभावित

आंध्र प्रदेश के 388 मंडल सूखा प्रभावित

आंध्र प्रदेश में सूखे का संकट: 21 जिलों के 388 मंडल प्रभावितआंध्र प्रदेश सरकार ने खरीफ 2026 के लिए राज्य के 21 जिलों के 388 मंडलों को सूखा-प्रभावित घोषित किया है। जून से अगस्त के दौरान राज्य में सामान्य से 53.4% कम बारिश दर्ज की गई। प्रभावित मंडलों में 283 को गंभीर और 105 को मध्यम सूखा-प्रभावित श्रेणी में रखा गया है।राज्य के कुल 28 जिलों में 688 मंडल हैं। इनमें से 388 मंडलों को सूखा-प्रभावित घोषित किया गया है, जो कुल मंडलों का लगभग 56.4% है। यह निर्णय बारिश की कमी और सूखे से जुड़े विभिन्न संकेतकों के आकलन के बाद लिया गया।राजस्व (आपदा प्रबंधन) विभाग के विशेष मुख्य सचिव (FAC) जी. साई प्रसाद ने 1 अक्टूबर 2026 को सरकारी आदेश G.O. Ms. No. 4 जारी कर सूखे की घोषणा की। यह फैसला जिला कलेक्टरों से प्राप्त प्रस्तावों और राज्य सूखा समिति की सिफारिशों की समीक्षा के बाद लिया गया। समिति ने 30 सितंबर को बैठक कर भारत सरकार के *सूखा प्रबंधन मैनुअल, 2016* के दिशानिर्देशों के अनुसार प्रस्तावों का मूल्यांकन किया। सामान्य से 53.4% कम बारिशसरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 31 अगस्त 2026 के बीच आंध्र प्रदेश में औसतन 197.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि इस अवधि में सामान्य बारिश 424.3 मिलीमीटर होती है। इस प्रकार, बारिश में लगभग 53.4% की कमी दर्ज की गई। बारिश की स्थिति और सूखे से जुड़े अन्य संकेतकों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सामान्य समयसीमा से पहले सूखे की घोषणा की।तीन चरणों में किया गया सूखे का आकलनसूखे का आकलन तीन चरणों में किया गया। पहले चरण में बारिश की कमी और लगातार सूखे की अवधि जैसे अनिवार्य संकेतकों की जांच की गई। दूसरे चरण में बोए गए क्षेत्र, वनस्पति की स्थिति, मिट्टी में नमी, जलाशयों में पानी के भंडारण और भूजल स्तर जैसे प्रभाव संकेतकों का विश्लेषण किया गया। तीसरे चरण में जमीनी स्तर पर स्थिति का सत्यापन किया गया।इस प्रक्रिया में अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय, कृषि एवं बागवानी विभाग, आंध्र प्रदेश स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (APSAC), सिंचाई विभाग, भूजल ऑडिट विभाग और आचार्य एन.जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय (ANGRAU) से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग किया गया।सरकार ने जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि वे प्रभावित मंडलों की सूची और संबंधित विवरण अंग्रेजी तथा तेलुगु में जिला राजपत्रों में प्रकाशित करें।और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 01 पैसे गिरकर 96.73 पर बंद हुआ।

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 01 पैसे गिरकर 96.73 पर बंद हुआ।

शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 01 पैसे गिरकर ₹96.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।घरेलू करेंसी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹96.72 पर खुली और पूरे ट्रेडिंग सेशन के दौरान इसमें उतार-चढ़ाव बना रहा। आखिर में यह ₹96.73 पर बंद हुई, जो शुरुआती स्तर से 01 पैसा कम था।सेंसेक्स 879 अंक चढ़कर 72,472.33 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 289 अंक बढ़कर क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के बाद 22,520.45 पर बंद हुआ। सेंसेक्स की फाइनल क्लोजिंग उसके प्री-CAS लेवल से लगभग 72 अंक नीचे थी, जबकि निफ्टी लगभग 15 अंक नीचे बंद हुआ। मार्केट का रुख पॉजिटिव रहा, जिसमें 1,686 शेयरों में गिरावट के मुकाबले 2,344 शेयरों में बढ़त देखी गई।और पढ़ें :- भारत में HTBt कपास का इस्तेमाल बढ़ा

भारत में HTBt कपास का इस्तेमाल बढ़ा

बिना मंज़ूरी वाले HTBt कपास का बढ़ता इस्तेमाल, स्टडी में 24-30% क्षेत्र का अनुमाननई दिल्ली: भारत में हर्बिसाइड-टॉलरेंट Bt (HTBt) कपास को आधिकारिक मंज़ूरी नहीं मिली है, इसके बावजूद किसानों के बीच इसके इस्तेमाल का दायरा बढ़ने का दावा एक नई फील्ड स्टडी में किया गया है। स्टडी के अनुमान के मुताबिक, 2025-26 खरीफ सीजन में देश के करीब 65-72 लाख एकड़ क्षेत्र में बिना मंज़ूरी वाले HTBt कपास बीज का इस्तेमाल हुआ। यह देश के कुल कपास क्षेत्र का अनुमानित 24-30% है।साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC) ने फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NSAI) के सहयोग से यह अध्ययन किया। इसमें महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के 16 कपास उत्पादक जिलों को शामिल किया गया। अध्ययन में किसानों का सर्वे, बीज आपूर्ति श्रृंखला का आकलन और कपास के नमूनों की प्रयोगशाला जांच की गई।HTBt कपास, Bt कपास का ऐसा रूप है जिसमें खरपतवारनाशी-सहनशीलता का अतिरिक्त गुण होता है। इसके कारण खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट जैसे खरपतवारनाशी का इस्तेमाल किया जा सकता है। स्टडी के अनुसार, ग्लाइफोसेट के जरिए खरपतवार नियंत्रण की लागत करीब ₹750-850 प्रति एकड़ है, जबकि हाथ से खरपतवार हटाने पर ₹12,000-15,000 तक खर्च हो सकता है। मजदूरों की कमी और बढ़ती श्रम लागत को इसके प्रसार की प्रमुख वजहों में बताया गया है।अध्ययन में महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में HTBt के इस्तेमाल का स्तर क्रमशः 58%, 66% और 49% बताया गया है। ये आंकड़े अध्ययन के आकलन पर आधारित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अनौपचारिक HTBt बीज बाजार का अनुमानित आकार ₹820-880 करोड़ है। अध्ययन में 2022 से 2026 के बीच कानूनी Bollgard-II बीज की बिक्री में 22.3% गिरावट का भी उल्लेख किया गया है।इस बीच, भारत में कपास उत्पादन में गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कपास उत्पादन 2020-21 के 35.2 मिलियन गांठ से घटकर 2025-26 में अनुमानित 29.1 मिलियन गांठ रह गया है। उत्पादकता भी इसी अवधि में 451 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से घटकर 431 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। कपास उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार ने ₹5,659 करोड़ के कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन को मंजूरी दी है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 6 पैसे की मजबूती के साथ 96.72 पर खुला।

गुजरात में CCI का सुधार उत्सव

विश्व कपास दिवस पर बोदेली APMC में सुधार उत्सव, 3 लाख किसानों को ₹7,900 करोड़ का भुगतानबोदेली, गुजरात: विश्व कपास दिवस के अवसर पर कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) लिमिटेड, अहमदाबाद की ओर से बोदेली APMC में ‘सुधार उत्सव 2026’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में CCI के वरिष्ठ अधिकारियों, कपास व्यापारियों और बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इस दौरान कपास खरीद, किसानों को भुगतान और कपास उत्पादन बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की गई।CCI के ई.जी.एम. रेड्डी ने बताया कि गुजरात में CCI ने 98 लाख क्विंटल कपास की खरीद की है। इसके बदले करीब 3 लाख किसानों को ₹7,900 करोड़ का भुगतान किया गया। इसे CCI की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया गया।कार्यक्रम में बताया गया कि गुजरात में करीब 4 लाख किसानों ने कपास बेचने के लिए पंजीकरण कराया है। आने वाले समय में यह संख्या बढ़कर लगभग 5 लाख तक पहुंचने की उम्मीद है। कार्यक्रम में कपास क्षेत्र में किए जा रहे सुधारों के साथ ‘कपास क्रांति’ और ‘कस्तूरी कॉटन’ को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।वैज्ञानिक चिराग पटेल ने कपास की उत्पादकता बढ़ाने के लिए खेतों में पौधों की उचित संख्या बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने किसानों को वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन करने की सलाह दी, ताकि उत्पादन क्षमता में सुधार किया जा सके।किसानों को फसल चक्र अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया। कार्यक्रम में बताया गया कि किसानों को कृषि उत्पादन में सुधार के लिए सब्सिडी, तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है। फसल चक्र से मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।CCI के संयुक्त सचिव एम.एम. पटेल ने कहा, “देश तभी आत्मनिर्भर बन सकता है, जब किसान आत्मनिर्भर बने।” उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाने और उपलब्ध सहायता का लाभ उठाने की अपील की।और पढ़ें :- वाशिम में कपास किसान परेशान

वाशिम में कपास किसान परेशान

विश्व कपास दिवस: कपास या सोयाबीन? बढ़ती लागत और सूखे ने किसानों की बढ़ाई चिंतावाशिम: महाराष्ट्र का वाशिम जिला कभी कपास उत्पादन के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल था। खासकर करंजा और मनोरा तालुका कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। हालांकि, बढ़ती उत्पादन लागत, मजदूरों की कमी, कपास चुनाई की बढ़ती मजदूरी और बाजार भाव में उतार-चढ़ाव के कारण किसान धीरे-धीरे अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।इस साल वाशिम जिले में 37,756 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई है। लेकिन लंबे समय तक पर्याप्त बारिश नहीं होने से फसल की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। मिट्टी में नमी कम होने से कपास के पौधों की बढ़वार प्रभावित हुई है और किसानों के सामने खड़ी फसल को बचाने की चुनौती है।15 साल में कपास का रकबा घटाकरीब 15 साल पहले वाशिम जिले में कपास की खेती 50,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में होती थी। अब कपास का रकबा पहले की तुलना में काफी कम हो गया है। इस साल जिले में कपास की बुवाई 37,756 हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है।कपास की खेती में अधिक लागत आती है और फसल लंबे समय तक खेत में रहती है। समय पर मजदूर नहीं मिलने और बढ़ती मजदूरी के कारण किसानों की परेशानी बढ़ रही है। बाजार भाव में अनिश्चितता के बीच कई किसान सोयाबीन, हल्दी और अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।बारिश की कमी से उत्पादन पर खतराकरंजा और मनोरा के कपास उत्पादक क्षेत्रों में करीब दो महीने तक पर्याप्त बारिश नहीं होने से मिट्टी की नमी कम हुई है। इससे पौधों की बढ़वार प्रभावित हुई है। यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो कपास में डोडे बनने और कुल उत्पादन पर असर पड़ सकता है।किसानों ने फसल नुकसान के लिए सरकार से ₹30,000 प्रति एकड़ मुआवजे की मांग की है।MSP पर बिक्री के लिए पंजीकरण जरूरी2026-27 सीजन में CCI को MSP पर कपास बेचने के इच्छुक किसानों के लिए ‘कपास किसान’ मोबाइल ऐप पर स्व-पंजीकरण करना जरूरी है। किसान 31 अक्टूबर 2026 तक पंजीकरण कर सकते हैं।2026-27 के लिए कपास का MSP मीडियम स्टेपल के लिए ₹8,267 प्रति क्विंटल और लॉन्ग स्टेपल के लिए ₹8,667 प्रति क्विंटल तय किया गया है। किसानों को उम्मीद है कि बाजार भाव MSP से नीचे जाने पर CCI की खरीद से उन्हें राहत मिलेगी।विश्व कपास दिवस पर किसानों की चुनौती7 अक्टूबर को विश्व कपास दिवस मनाया जाता है। वाशिम के किसानों के लिए बढ़ती लागत, मजदूरों की कमी, पानी की समस्या, मौसम की अनिश्चितता और बाजार भाव में उतार-चढ़ाव बड़ी चुनौती बने हुए हैं।ऐसे में इस सीजन किसानों की प्राथमिकता खड़ी फसल बचाना, फसल नुकसान पर राहत पाना और MSP के जरिए बाजार समर्थन प्राप्त करना है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 6 पैसे की मजबूती के साथ 96.71 पर खुला।

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