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दक्षिण हरियाणा में कपास की जगह किसानों की पहली पसंद बनी बाजरा खेती

2026-06-11 12:12:28
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दक्षिण हरियाणा में कपास की जगह बाजरा बना किसानों की नई पसंद

दक्षिण हरियाणा में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी कपास उत्पादन के लिए पहचान रखने वाले महेंद्रगढ़, भिवानी, झज्जर और चरखी दादरी जैसे जिलों में अब किसान बड़े पैमाने पर बाजरा की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण कपास की खेती में बढ़ता जोखिम, कीटों का प्रकोप और मौसम की अनिश्चितता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में कपास की खेती का रकबा सात वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। राज्य में कपास का कुल क्षेत्रफल लगभग 70 प्रतिशत घटकर 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पिंक बॉलवर्म (गुलाबी सुंडी) के लगातार हमलों ने कपास उत्पादकों को सबसे अधिक प्रभावित किया है। यह कीट अब Bt-कपास की कीट-प्रतिरोधक क्षमता को भी चुनौती दे रहा है, जिससे किसानों को बार-बार फसल नुकसान झेलना पड़ रहा है।

कपास की खेती में महंगे कीटनाशकों का उपयोग, अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता और बेमौसम बारिश जैसी मौसम संबंधी चुनौतियां भी किसानों की लागत बढ़ा रही हैं। नतीजतन, कई किसानों के लिए कपास की खेती लाभ के बजाय घाटे का सौदा बन गई है।

इसके विपरीत, बाजरा कम लागत और कम पानी में उगने वाली फसल है। यह सूखा सहन करने में सक्षम है तथा रेतीली मिट्टी और अधिक तापमान जैसी परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार देती है। यही वजह है कि दक्षिण हरियाणा के जल-संकट वाले क्षेत्रों में किसान इसे अधिक सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं। जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई सुविधा है, वे धान की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि शुष्क इलाकों में बाजरा और ग्वार की खेती तेजी से बढ़ रही है।

महेंद्रगढ़ कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, बाजरा को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), भावान्तर भरपाई योजना और मोटे अनाजों को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों का भी लाभ मिल रहा है। सरकार उन्नत बीजों, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों और बाजरा प्रसंस्करण इकाइयों को प्रोत्साहन देकर इसकी खेती को बढ़ावा दे रही है।

इन्हीं कारणों से दक्षिण हरियाणा में कपास का रकबा लगातार घट रहा है, जबकि बाजरा किसानों के लिए अधिक टिकाऊ, लाभकारी और भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर रहा है।


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