युद्ध के दौर में भारतीय कॉटन यार्न निर्यात में उछाल
राजकोट/अहमदाबाद: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चेन और फ्यूल सप्लाई को प्रभावित किया है, जिससे भारत की कई फैक्ट्रियों पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, कॉटन यार्न उद्योग के लिए यह स्थिति अवसर में बदलती दिख रही है, क्योंकि चीन से मांग तेजी से बढ़ी है।
भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कॉटन उत्पादक, चीन के लिए एक अहम सप्लायर बनकर उभरा है। युद्ध के चलते ट्रेड रूट्स बाधित हुए हैं और अमेरिका व ब्राज़ील से कॉटन शिपमेंट में देरी हुई है, जिससे चीन को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़े। ऐसे में भारत से यार्न आयात बढ़ा है। साथ ही, युआन के मुकाबले रुपया लगभग 7% कमजोर होने से भारतीय उत्पाद चीनी खरीदारों के लिए सस्ते हो गए हैं।(sis)
गुजरात की स्पिनिंग मिल फियोटेक्स कॉटस्पिन के मैनेजिंग डायरेक्टर रिपल पटेल के अनुसार, कंपनी की एक्सपोर्ट ऑर्डर बुक में 40% की वृद्धि हुई है और उत्पादन अब 100% क्षमता पर पहुंच गया है। जून तक के ऑर्डर पहले ही बुक हो चुके हैं।
उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, नवंबर से भारत से चीन को हर महीने करीब 1,500 कंटेनर कॉटन यार्न भेजे जा रहे हैं, जो पहले 300 कंटेनर थे—यानी पांच गुना वृद्धि। पॉलिएस्टर सप्लाई पर असर से कॉटन की मांग और बढ़ी है।(sis)
हालांकि, गुजरात की मिलों को भौगोलिक लाभ मिल रहा है, जबकि तमिलनाडु की इकाइयों को अधिक ट्रांसपोर्ट लागत के कारण प्रतिस्पर्धा में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।