कपास खरीद में चुनौतियों का अंबार: किसानों के सामने बढ़ती मुश्किलें
कपास उत्पादक किसानों की स्थिति इस वर्ष बेहद जटिल हो गई है। एक ओर सरकार की ओर से कृषि क्षेत्र को लेकर सकारात्मक तस्वीर पेश की जा रही है, वहीं ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। खासकर विदर्भ क्षेत्र के किसान इस समय असमंजस में हैं कि वे अपनी उपज बेचें तो कहां।
कपास खरीद में प्रमुख भूमिका निभाने वाली Cotton Corporation of India (सीसीआई) द्वारा खरीद केंद्र समय से पहले बंद कर दिए जाने से हजारों किसान प्रभावित हुए हैं। केवल यवतमाल जिले में ही 40,000 से अधिक किसान कपास बेचने के लिए पंजीकरण कराने के बावजूद अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। राज्य स्तर पर यह संख्या कहीं अधिक हो सकती है।
इस साल खरीफ सीजन में भारी बारिश और लंबे मानसून के कारण कपास की फसल को काफी नुकसान पहुंचा। शुरुआती फसल भीगकर खराब हो गई और फसल पकने में भी देरी हुई। इसके अलावा, कपास तुड़ाई के लिए मजदूरों की कमी ने किसानों की लागत और बढ़ा दी है। मजबूरी में किसानों को अधिक मजदूरी देकर काम कराना पड़ रहा है।
सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 8110 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन बाजार में कीमतें 6000 से 7000 रुपये के बीच रहने के कारण किसानों का रुझान सीसीआई केंद्रों की ओर था। हालांकि, सीसीआई की खरीद प्रक्रिया इस वर्ष लगातार अनिश्चितता से घिरी रही।
इस बार पहली बार “कॉटन किसान ऐप” के माध्यम से पंजीकरण अनिवार्य किया गया, जो कई किसानों के लिए मुश्किल साबित हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में स्मार्टफोन और इंटरनेट की कमी के कारण अनेक किसान पंजीकरण से वंचित रह गए। जिन्होंने पंजीकरण कराया, उन्हें भी स्लॉट बुकिंग की नई व्यवस्था के चलते दिक्कतों का सामना करना पड़ा, क्योंकि अधिकांश केंद्रों पर स्लॉट उपलब्ध ही नहीं थे।
सरकार और सीसीआई की ओर से पहले यह आश्वासन दिया गया था कि सभी पंजीकृत किसानों से कपास खरीदा जाएगा, लेकिन व्यवहार में यह वादा पूरा होता नहीं दिखा। खरीद की समयसीमा भी किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बनी। जहां पहले उम्मीद थी कि मार्च के अंत तक खरीद जारी रहेगी, वहीं इसे केवल 15 मार्च तक ही बढ़ाया गया। छुट्टियों और सीमित कार्यदिवसों के कारण कई केंद्रों पर वास्तविक खरीद मात्र कुछ दिनों तक ही हो सकी।
इस परिस्थिति में किसानों की मांग है कि कपास खरीद केंद्रों को अप्रैल के अंत तक खुले रखा जाए और उन सभी किसानों से खरीद की जाए जो पंजीकरण का इंतजार कर रहे हैं या स्लॉट बुक नहीं कर पाए हैं।
इसके अलावा, मूल्य नीति भी किसानों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। शुरुआत में कम कीमत मिलने के कारण कई किसानों ने बेहतर दाम की उम्मीद में कपास का भंडारण किया था, लेकिन बाद में सीसीआई द्वारा कम कीमत पर कपास बेचने से बाजार में तेजी नहीं आ सकी। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ा।
कुल मिलाकर, बीज से लेकर बाजार तक की पूरी प्रक्रिया में नीतिगत खामियां साफ दिखाई देती हैं। यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो कपास उत्पादक किसानों की आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो सकती है।