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नवाचार और वैल्यू एडिशन से आगे बढ़ रहा तमिलनाडु का टेक्सटाइल उद्योग

तमिलनाडु टेक्सटाइल उद्योग वैल्यू एडिशन और नवाचार के जरिए बढ़ा रहा है प्रतिस्पर्धात्मक बढ़तवैश्विक स्तर पर टैरिफ, मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव, महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियों के बावजूद तमिलनाडु का टेक्सटाइल उद्योग मजबूती से आगे बढ़ रहा है। उद्योग अब केवल उत्पादन क्षमता पर निर्भर रहने के बजाय वैल्यू एडिशन, उत्पाद विविधीकरण और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के माध्यम से नई विकास संभावनाएं तलाश रहा है।तमिलनाडु भारत के टेक्सटाइल सेक्टर का प्रमुख केंद्र है। राज्य में देश की 3,376 स्पिनिंग मिलों में से 1,861 मिलें स्थित हैं, जो कुल स्पिनिंग क्षमता का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा हैं। कोयंबटूर स्पिनिंग उद्योग का प्रमुख हब है, जबकि करूर होम टेक्सटाइल और इरोड वीविंग एवं प्रोसेसिंग गतिविधियों के लिए जाना जाता है।उद्योग जगत के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद टेक्सटाइल उत्पादों की मांग स्थिर बनी हुई है। इसी वजह से कई कंपनियां होम टेक्सटाइल, स्पेशलिटी यार्न और तकनीकी टेक्सटाइल जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश बढ़ा रही हैं। ऑर्गेनिक, रिसाइकिल्ड और वैकल्पिक फाइबर आधारित उत्पादों के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।कंपनियां अब बेहतर मार्जिन और दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा के लिए विशेष उत्पादों पर फोकस कर रही हैं। पॉलिएस्टर-विस्कोस ब्लेंड, अल्ट्रा-फाइन फाइबर, प्रोटेक्टिव गारमेंट्स और मिलिट्री टेक्सटाइल जैसे सेगमेंट तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कई निर्माता हेम्प और केले के फाइबर जैसे वैकल्पिक कच्चे माल पर भी काम कर रहे हैं।तिरुपुर और इरोड जैसे क्लस्टरों में भी सकारात्मक माहौल बना हुआ है। बाजार में अब छोटे प्रोडक्ट साइकिल, अधिक कस्टमाइजेशन और कम रिपीट ऑर्डर देखने को मिल रहे हैं, जिससे कंपनियां ऑर्डर-आधारित उत्पादन मॉडल की ओर बढ़ रही हैं।साथ ही, कई निर्माता यार्न डाइंग, फैब्रिक प्रोसेसिंग, डिजिटल प्रिंटिंग और गारमेंटिंग सुविधाओं में निवेश कर वर्टिकल इंटीग्रेशन को मजबूत कर रहे हैं। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में सफलता केवल बड़े पैमाने के उत्पादन से नहीं, बल्कि नवाचार, डिफरेंशिएशन और ग्राहकों की बदलती जरूरतों के अनुरूप समाधान विकसित करने की क्षमता से तय होगी।और पढ़ें :- भारत का टेक्सटाइल उद्योग 2030 तक $350 बिलियन के लक्ष्य की ओर

भारत का टेक्सटाइल उद्योग 2030 तक $350 बिलियन के लक्ष्य की ओर

2030 तक 350 अरब डॉलर के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा भारत का टेक्सटाइल उद्योग: गिरिराज सिंहकेंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने गुरुवार को कहा कि भारत का टेक्सटाइल उद्योग वर्ष 2025-26 तक लगभग 190 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है और 2030 तक 350 अरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे यह देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन का प्रमुख आधार बनकर उभरा है।मंत्री के अनुसार, घरेलू टेक्सटाइल बाजार 2014-15 में लगभग 6 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 16 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। वहीं, टेक्सटाइल और परिधान क्षेत्र वर्तमान में 5.3 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रहा है। आने वाले तीन वर्षों में इस क्षेत्र से करीब 2 करोड़ अतिरिक्त रोजगार अवसर सृजित होने की उम्मीद है।पिछले 12 वर्षों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘5F’ विजन—‘फार्म टू फाइबर’, ‘फाइबर टू फैक्ट्री’, ‘फैक्ट्री टू फैशन’ और ‘फैशन टू फॉरेन’—ने किसानों, बुनकरों, कारीगरों, निर्माताओं और निर्यातकों को जोड़ते हुए एक मजबूत और एकीकृत मूल्य श्रृंखला विकसित की है।उन्होंने बताया कि सरकार ने टेक्सटाइल क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए PM MITRA पार्क, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना, नेशनल टेक्निकल टेक्सटाइल्स मिशन (NTTM), टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (TEEM), नेशनल फाइबर मिशन और रॉ मटेरियल सपोर्ट स्कीम (RMSS) जैसी कई प्रमुख पहलें शुरू की हैं। ये योजनाएं निवेश, तकनीकी नवाचार, स्थिरता और निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत कर रही हैं।सिंह ने कहा कि कपास किसानों के समर्थन और उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन शुरू किया गया है तथा कपास पर आयात शुल्क हटाया गया है। इसके अलावा, RoSCTL और RoDTEP जैसी योजनाओं के माध्यम से निर्यात को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि भारत का एफटीए नेटवर्क 2014 में 19 देशों के साथ 10 समझौतों से बढ़कर अब 56 देशों के साथ 18 समझौतों तक पहुंच चुका है, जिससे निर्यात और निवेश के नए अवसर पैदा हुए हैं।और पढ़ें :- कपास का कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक 85 लाख गांठ से ऊपर जा सकता है

कपास का कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक 85 लाख गांठ से ऊपर जा सकता है

बढ़ते आयात से 2026-27 में भारत का कॉटन कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक 85 लाख गांठ से अधिक रहने का अनुमानटेक्सटाइल उद्योग को बेहतर गुणवत्ता वाला कपास उपलब्ध कराने के लिए सरकार द्वारा हाल ही में आयात शुल्क में दी गई छूट का असर कपास बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2025-26 सीज़न में भारत का कुल कपास आयात 60-65 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलोग्राम) तक पहुंच सकता है। इसके परिणामस्वरूप अक्टूबर 2026 में शुरू होने वाले 2026-27 सीज़न के लिए देश का कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक लगभग 42 प्रतिशत बढ़कर 85 लाख गांठ से अधिक रहने की संभावना है।Cotton Association of India (CAI) के अनुसार, मई 2026 के अंत तक देश में 43.5 लाख गांठ कपास का आयात हो चुका था, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 33 लाख गांठ की तुलना में करीब 32 प्रतिशत अधिक है। इससे पहले CAI ने पूरे सीज़न के लिए 47 लाख गांठ आयात का अनुमान लगाया था, लेकिन शुल्क छूट के बाद इसमें उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना बन गई है।CAI की क्रॉप कमेटी के चेयरमैन Atul S. Ganatra के अनुसार, मई के अंत तक 43.5 लाख गांठ कपास भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच चुका था। उनका मानना है कि हालिया नीति बदलाव के बाद लगभग 15 लाख गांठ अतिरिक्त आयात हो सकता है, जिससे कुल आयात 60-65 लाख गांठ तक पहुंच जाएगा।CAI ने 2025-26 के लिए कपास उत्पादन का अनुमान 334 लाख गांठ पर बरकरार रखा है। वहीं, सीज़न के अंत में क्लोजिंग स्टॉक 85.59 लाख गांठ रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 60 लाख गांठ के मुकाबले लगभग 25 लाख गांठ अधिक है।विशेषज्ञों के अनुसार, घरेलू और आयातित कपास की कीमतें लगभग समान होने के बावजूद टेक्सटाइल मिलें आयातित कपास को प्राथमिकता दे रही हैं, क्योंकि इससे लगभग 4 प्रतिशत अधिक धागा प्राप्त होता है और तैयार धागे को बाजार में करीब ₹7 प्रति किलोग्राम अधिक कीमत मिलती है। यही कारण है कि आयातित कपास की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 27 पैसे बढ़कर 95.11 पर बंद हुआ।

देशभर में मानसून की प्रगति से कपास और सोयाबीन फसलों के लिए सकारात्मक संकेत

भारत में मॉनसून का और विस्तार: कपास और सोयाबीन की फसलों के लिए अच्छे संकेतअगले कुछ दिनों में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के और हिस्सों में आगे बढ़ने की उम्मीद है। कपास और सोयाबीन से जुड़े लोग इस पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं क्योंकि बुवाई और फसल के अच्छी तरह उगने के लिए समय पर बारिश बहुत ज़रूरी है।मौसम विभाग का कहना है कि मौसम की अनुकूल स्थितियां मॉनसून के उत्तर की ओर बढ़ने में मदद कर रही हैं। कई मध्य और पूर्वी इलाकों में बारिश बढ़ने की संभावना है, जिससे खरीफ की फसलों के लिए मिट्टी में ज़रूरी नमी मिलेगी।कपास पर असरमहाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों जैसे कपास उगाने वाले मुख्य इलाकों में, अनुमानित बारिश से बुवाई के काम में मदद मिलने और खेतों में नमी का स्तर बेहतर होने की उम्मीद है। सीज़न की शुरुआत में अच्छी बारिश से आम तौर पर फसल अच्छी तरह उगती है और किसान ज़्यादा ज़मीन पर खेती करने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं।हालांकि, किसानों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय बारिश की तेज़ी पर नज़र रखें, क्योंकि हाल ही में बोई गई फसलों वाले खेतों में बहुत ज़्यादा बारिश से बीज के अंकुरण और खेती के कामों पर कुछ समय के लिए असर पड़ सकता है। विदर्भ और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में अभी चल रही लू (heatwave) की स्थिति मॉनसून के तेज़ होने के साथ धीरे-धीरे कम हो सकती है।सोयाबीन पर असरमध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में सोयाबीन उगाने वाले इलाकों को आगे बढ़ते मॉनसून से फ़ायदा होने की उम्मीद है। मिट्टी में नमी बेहतर होने से आने वाले हफ़्तों में ज़मीन तैयार करने और बुवाई के काम में तेज़ी आ सकती है।बाज़ार से जुड़े लोग बारिश के वितरण पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं, क्योंकि मॉनसून के समय पर आने से अक्सर फसल की बेहतर संभावनाओं और बुवाई में तेज़ी आती है। फसल के अच्छी तरह उगने के लिए जून में लगातार बारिश होना बहुत ज़रूरी होगा।क्षेत्रीय मौसम का हालअगले 24 घंटों के दौरान बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पूर्वी मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और आस-पास के इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश होने की उम्मीद है। केरल, तटीय कर्नाटक, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल, सिक्किम और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में मध्यम से भारी बारिश हो सकती है।इस बीच, राजस्थान और विदर्भ के कुछ हिस्सों में कहीं-कहीं लू (heatwave) की स्थिति बनी रह सकती है। उत्तरी राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धूल भरी आंधी और गरज के साथ बारिश भी हो सकती है।बाज़ार की रायआगे बढ़ते मॉनसून को आम तौर पर कपास और सोयाबीन के आने वाले सीज़न के लिए अच्छा माना जा रहा है। हालांकि अगले दो हफ़्तों में बारिश का वितरण बहुत अहम होगा, लेकिन मौसम के मौजूदा हालात प्रमुख कृषि क्षेत्रों में खरीफ़ की बुआई की प्रगति के लिए उत्साहजनक हैं। व्यापारी, प्रोसेसर और टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़े लोग मॉनसून के फैलाव और बारिश के पैटर्न पर नज़र बनाए रखेंगे, क्योंकि इनका फ़सल की संभावनाओं और बाज़ार के मूड पर असर पड़ सकता है।और पढ़ें :- टेक्सटाइल PLI योजना के तीसरे दौर में 96 कंपनियों को मंजूरी, ₹12,822 करोड़ निवेश का अनुमान

टेक्सटाइल PLI योजना के तीसरे दौर में 96 कंपनियों को मंजूरी, ₹12,822 करोड़ निवेश का अनुमान

टेक्सटाइल PLI स्कीम के राउंड-III में 96 कंपनियों को मंजूरी, ₹12,822 करोड़ निवेश की उम्मीदकेंद्र सरकार ने टेक्सटाइल क्षेत्र के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तीसरे राउंड के तहत 22 नए आवेदकों को मंजूरी दी है। इसके साथ ही राउंड-III के तहत मंजूर कंपनियों की कुल संख्या बढ़कर 96 हो गई है।टेक्सटाइल मंत्रालय के अनुसार, नए स्वीकृत प्रोजेक्ट्स से ₹2,339.14 करोड़ के निवेश, अधिसूचित उत्पादों में ₹15,561.34 करोड़ के अनुमानित कारोबार और टेक्सटाइल वैल्यू चेन में 36,000 से अधिक रोजगार अवसरों के सृजन की संभावना है।ताजा मंजूरियों के बाद PLI स्कीम के तीसरे राउंड के तहत कुल प्रतिबद्ध निवेश ₹12,822.67 करोड़ तक पहुंच गया है। वहीं, स्वीकृत परियोजनाओं से ₹58,294.18 करोड़ के अनुमानित टर्नओवर की उम्मीद जताई गई है।मंजूर किए गए आवेदक मुख्य रूप से मैन-मेड फाइबर (MMF) परिधान, MMF फैब्रिक और टेक्निकल टेक्सटाइल जैसे प्रमुख क्षेत्रों से जुड़े हैं। सरकार ने इन क्षेत्रों को भारत की वैल्यू-एडेड टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने के लिए प्राथमिकता दी है।मंत्रालय का कहना है कि यह मंजूरी उभरते टेक्सटाइल सेगमेंट्स में उद्योग जगत की बढ़ती रुचि को दर्शाती है। प्रस्तावित परियोजनाओं से उत्पादन क्षमता विस्तार, तकनीकी उन्नयन और एकीकृत टेक्सटाइल विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को बल मिलने की उम्मीद है।सरकार ने टेक्सटाइल PLI स्कीम की शुरुआत मैन-मेड फाइबर और टेक्निकल टेक्सटाइल क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से की थी। इन क्षेत्रों को वैश्विक टेक्सटाइल एवं परिधान बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।मंत्रालय के अनुसार, स्वीकृत निवेश विनिर्माण वृद्धि को गति देने, रोजगार सृजन को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के अनुरूप घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। साथ ही, नई उत्पादन क्षमताएं भारत को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी टेक्सटाइल हब बनाने में मदद करेंगी।और पढ़ें :- कपास गांठ QCO वापस, जिनिंग उद्योग को राहत

कपास गांठ QCO वापस, जिनिंग उद्योग को राहत

कॉटन बेल्स QCO रद्द, जिनिंग उद्योग को राहत.केंद्र सरकार ने कॉटन बेल्स (क्वालिटी कंट्रोल) ऑर्डर (QCO), 2023 को तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया है। कपड़ा मंत्रालय द्वारा 9 जून 2026 को जारी अधिसूचना के साथ उस गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था का अंत हो गया है, जिसे लागू करने का प्रयास पिछले तीन वर्षों से चल रहा था, लेकिन उद्योग के विरोध और व्यावहारिक चुनौतियों के कारण इसे कभी लागू नहीं किया जा सका।कॉटन बेल्स QCO को 28 फरवरी 2023 को ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) अधिनियम के तहत अधिसूचित किया गया था। इसके तहत घरेलू बाजार में बेची जाने वाली सभी कॉटन बेल्स के लिए भारतीय मानक IS 12171:2019 के अनुरूप BIS प्रमाणन अनिवार्य किया जाना था। हालांकि, निर्यात के लिए तैयार की जाने वाली कॉटन बेल्स और विदेशी खरीदारों की विशेष आवश्यकताओं के अनुसार बनाए गए उत्पादों को इस नियम से छूट दी गई थी।सरकार ने QCO को लागू करने से पहले उद्योग को 180 दिनों का संक्रमणकाल दिया था। लेकिन जिनिंग उद्योग की ओर से लगातार उठाई गई चिंताओं के कारण इसकी प्रभावी तिथि कई बार आगे बढ़ाई गई। जुलाई 2025 में जारी अधिसूचना के तहत इसकी समय-सीमा 27 अगस्त 2025 से बढ़ाकर 27 अगस्त 2026 कर दी गई थी। इससे पहले भी आदेश के क्रियान्वयन को टाला जा चुका था।उद्योग संगठनों, विशेष रूप से कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI), ने तर्क दिया था कि BIS मानकों का पालन करने के लिए जिनिंग इकाइयों को आधुनिक मशीनरी और गुणवत्ता नियंत्रण प्रणालियों में भारी निवेश करना पड़ेगा। अधिकांश जिनिंग इकाइयाँ MSME श्रेणी में आती हैं और सीमित संसाधनों के कारण उनके लिए निर्धारित समय में इन मानकों को अपनाना आसान नहीं था। उद्योग का कहना था कि नमी, अशुद्धियों और कचरे के स्तर से संबंधित मानकों का अनुपालन करने के लिए व्यापक तकनीकी उन्नयन की आवश्यकता होगी।सरकार ने इन आपत्तियों को देखते हुए कई बार समय-सीमा बढ़ाई, लेकिन अंततः आदेश को पूरी तरह निरस्त करने का फैसला लिया। मंत्रालय की ताजा अधिसूचना में रद्द करने के कारणों का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है। इसमें केवल इतना कहा गया है कि भारतीय मानक ब्यूरो के साथ विचार-विमर्श के बाद जनहित में यह निर्णय लिया गया है।और पढ़ें:- डॉलर के मुकाबले रुपया 38 पैसे मजबूत, 95.38 पर खुला

मध्य प्रदेश में कपास मंडी शुल्क आधा, जिनिंग मिलों और आदिवासी रोजगार को मिलेगा बड़ा लाभ

कपास पर मंडी शुल्क आधा: जिनिंग मिलों को राहत, आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ेंगे रोजगार के अवसरमध्यप्रदेश सरकार ने कपास पर लगने वाले मंडी शुल्क को 1 प्रतिशत से घटाकर 0.5 प्रतिशत करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री Mohan Yadav की अध्यक्षता में हुई मंत्रिपरिषद बैठक में लिए गए इस निर्णय से मनावर, गंधवानी, सिंघाना और बाकानेर क्षेत्र की करीब 9 जिनिंग मिलों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। साथ ही आदिवासी बहुल इलाकों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।स्थानीय उद्योग को मिलेगा प्रोत्साहनमनावर स्थित बायोसस्टेन फाइबर्स के फैक्ट्री मैनेजर पवन कुशवाह के अनुसार, मंडी शुल्क में कमी से स्थानीय जिनिंग उद्योग को मजबूती मिलेगी। अब तक क्षेत्र का बड़ा हिस्सा कच्चा कपास पड़ोसी राज्यों, विशेषकर गुजरात के व्यापारियों द्वारा खरीदा जाता था, जिससे स्थानीय मिलों को पर्याप्त कच्चा माल नहीं मिल पाता था। लंबे समय से जिनर एसोसिएशन मंडी शुल्क में कटौती की मांग कर रहा था।पहले सरकार कपास पर प्रति सैकड़ा एक रुपये की दर से मंडी शुल्क वसूलती थी। शुल्क घटने के बाद मध्यप्रदेश से गुजरात और महाराष्ट्र की ओर कच्चे कपास का प्रवाह कम होने की संभावना है। इसके विपरीत, महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्रों से कपास अब मध्यप्रदेश की जिनिंग इकाइयों तक पहुंच सकता है।रोजगार और निवेश को मिलेगा बढ़ावापिछले वर्ष मनावर में लगभग 25 हजार गठान, बाकानेर में 7,500 गठान और सिंघाना में करीब 40 हजार गठान कपास की आवक दर्ज की गई थी। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि नई व्यवस्था से प्रदेश से बाहर चले गए कुछ उद्योग फिर लौट सकते हैं, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलने की संभावना बनेगी।यह कदम मनावर, गंधवानी और उमरबन जैसे आदिवासी विकासखंडों में मजदूरों के महाराष्ट्र और गुजरात की ओर होने वाले पलायन को कम करने में भी मददगार साबित हो सकता है।किसानों को भी मिलेगा लाभविशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय मंडियों में कपास उत्पादक किसानों को प्रति क्विंटल 40 से 50 रुपये तक अधिक मूल्य मिल सकता है। व्यापारियों के परिवहन और कर संबंधी खर्च में कमी आने से उसका कुछ लाभ किसानों तक पहुंचने की संभावना है। इससे कपास उत्पादन को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।सामान्य मंडी शुल्क में बढ़ोतरीमंत्रिपरिषद ने किसान हित में सामान्य मंडी शुल्क को 1 रुपये से बढ़ाकर 1.50 रुपये प्रति सैकड़ा करने का निर्णय भी लिया है। इस अतिरिक्त आय का उपयोग किसान सड़क निधि और कृषि अनुसंधान से जुड़े विकास कार्यों में किया जाएगा, जिससे कृषि अवसंरचना को और मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।और पढ़ें :- भारत ने वस्त्र और इस्पात क्षेत्र में अधिक उत्पादन क्षमता के अमेरिकी आरोपों को खारिज किया

भारत ने वस्त्र और इस्पात क्षेत्र में अधिक उत्पादन क्षमता के अमेरिकी आरोपों को खारिज किया

US की 'सेक्शन 301' जांच में भारत ने टेक्सटाइल और स्टील क्षेत्र में ओवरकैपेसिटी के आरोपों को खारिज कियाभारत ने अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) की 'सेक्शन 301' जांच के तहत लगाए गए उन आरोपों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि देश के टेक्सटाइल और स्टील क्षेत्रों में जरूरत से अधिक उत्पादन क्षमता (ओवरकैपेसिटी) मौजूद है।रॉयटर्स के अनुसार, अतिरिक्त व्यापार सचिव अमिताभ कुमार ने बुधवार को कहा कि भारत में इन उद्योगों की उत्पादन क्षमता घरेलू मांग के अनुरूप है और इसे देश की बड़ी आबादी तथा बढ़ती खपत की आवश्यकताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रति व्यक्ति आधार पर भारत का उत्पादन और खपत स्तर कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अभी भी काफी कम है।अमेरिका ने अपनी जांच में भारत के सोलर उपकरण, पेट्रोकेमिकल्स, स्टील और टेक्सटाइल जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कथित संरचनात्मक ओवरकैपेसिटी का मुद्दा उठाया है। साथ ही, अमेरिका के साथ भारत के लगभग 42 अरब डॉलर के व्यापार अधिशेष का भी उल्लेख किया गया है।इस बीच, टेक्सटाइल निर्यात संवर्धन परिषद (TEXPROCIL) ने भी अमेरिकी दावों का विरोध करते हुए USTR को विस्तृत जवाब सौंपा है। उद्योग संगठन का कहना है कि कॉटन, यार्न और फैब्रिक सेगमेंट के उत्पादन आंकड़े किसी असामान्य क्षमता विस्तार की ओर संकेत नहीं करते। इसके विपरीत, कई क्षेत्रों में उत्पादन स्थिर रहा है या उसमें गिरावट दर्ज की गई है, जिससे संरचनात्मक ओवर-सप्लाई के आरोप कमजोर पड़ते हैं।वाणिज्य मंत्रालय ने भी प्रभावित उद्योगों की ओर से अपना पक्ष रखते हुए ओवरकैपेसिटी और भारतीय कॉटन टेक्सटाइल क्षेत्र में जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से जुड़े आरोपों को खारिज किया है।गौरतलब है कि USTR की यह जांच इस बात की समीक्षा के लिए शुरू की गई है कि क्या विभिन्न देश सब्सिडी, श्रम लागत या अन्य नीतिगत उपायों के माध्यम से ऐसे विनिर्माण लाभ पैदा कर रहे हैं, जो वैश्विक व्यापार में असंतुलन उत्पन्न कर सकते हैं। जांच के दायरे में टेक्सटाइल और स्टील के अलावा पेट्रोकेमिकल्स, स्वास्थ्य उत्पाद और ऑटोमोटिव क्षेत्र भी शामिल हैं।और पढ़ें :- दक्षिण हरियाणा में कपास की जगह किसानों की पहली पसंद बनी बाजरा खेती

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