महाराष्ट्र के खानदेश में अगेती कपास की फसल अच्छी, बारिश की कमी से किसान चिंतित
By jayesh chouhan 2026-07-23 14:10:10
खानदेश में प्री-सीजन कपास की फसल में तेजी, बारिश की कमी बनी चिंता
महाराष्ट्र के खानदेश क्षेत्र में मई के अंतिम सप्ताह और जून की शुरुआत में बोई गई प्री-सीजन (बागवानी) कपास की फसल तेजी से बढ़ रही है। किसानों ने खरपतवार नियंत्रण, इंटरक्रॉपिंग और खाद प्रबंधन जैसे शुरुआती कृषि कार्य समय पर पूरे कर लिए हैं। हालांकि, बारिश की कमी के कारण सूखी जमीन वाले क्षेत्रों में कपास की फसल प्रभावित हो रही है।
इस साल खानदेश में कपास का रकबा पिछले वर्षों की तुलना में कम हुआ है, लेकिन कई किसानों ने परंपरागत रूप से इस फसल की खेती जारी रखी है। किसानों का अनुभव है कि कम बारिश की स्थिति में तापी, गिरना, अनेर और पंजरा जैसी नदियों के किनारे स्थित काली और उपजाऊ मिट्टी में सिंचाई वाली कपास की फसल बेहतर रहती है।
इस बार भारी बारिश नहीं होने और जून-जुलाई में लगातार हल्की बारिश नहीं मिलने से किसानों को फसल प्रबंधन के लिए पर्याप्त समय मिला। इंटरक्रॉपिंग, हर्बिसाइड स्प्रे और खाद डालने जैसे काम समय पर पूरे हो गए। इससे कई क्षेत्रों में कपास की फसल की बढ़वार अच्छी देखने को मिल रही है। कुछ जगहों पर पौधे करीब दो फीट तक बढ़ चुके हैं। हल्की और मध्यम मिट्टी वाले क्षेत्रों में भी सिंचाई वाली कपास की स्थिति संतोषजनक बनी हुई है। कीटों के प्रकोप को रोकने के लिए कई किसानों ने दो बार छिड़काव भी पूरा कर लिया है।
इंटरक्रॉपिंग और खाद प्रबंधन पर जोर
कई किसानों ने कपास की फसल में दो बार इंटरक्रॉपिंग का काम पूरा कर लिया है। बारिश की संभावना को देखते हुए इन कृषि कार्यों में तेजी लाई गई। साथ ही, रासायनिक खाद की पहली खुराक भी खेतों में डाल दी गई है। काली मिट्टी वाले कुछ क्षेत्रों में कपास में जल्द फूल आने की संभावना है, जबकि मिट्टी में अभी नमी बनी हुई है।
खरपतवार नियंत्रण में हर्बिसाइड का बढ़ा इस्तेमाल
जलगांव जिले के कई गांवों में खरपतवार नियंत्रण के लिए मजदूरों की मांग बनी हुई है। कुछ क्षेत्रों में मजदूरी करीब 200 रुपये प्रतिदिन तक पहुंच गई है। हालांकि, इस साल कपास का रकबा कम होने और हर्बिसाइड के बढ़ते इस्तेमाल से कई इलाकों में खरपतवार की समस्या कम हुई है। बारिश की कमी के कारण खेतों में नई घास-फूस का उगना भी सीमित रहा है।
यूरिया की मांग बढ़ी
फसल में खाद का उपयोग शुरू होते ही यूरिया की मांग बढ़ गई है। सिंचाई वाले क्षेत्रों में कपास की अच्छी बढ़वार के कारण यूरिया की जरूरत अधिक बनी हुई है, लेकिन कई जगहों पर इसकी उपलब्धता सीमित है। इसके चलते किसान दूसरी बेसल डोज करीब 60 दिन बाद देने की योजना बना रहे हैं। किसानों का मानना है कि यदि मौसम अनुकूल रहा तो कपास की फसल अच्छी स्थिति में बनी रह सकती है।