कॉटन में भारत की प्रतिस्पर्धा के लिए उन्नत तकनीक जरूरी: डॉ. परोदा
नई दिल्ली: भारत के कॉटन सेक्टर में बढ़ती आयात निर्भरता पर चिंता जताते हुए प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.एस. परोदा ने कहा है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए उन्नत कृषि तकनीकों, बायोटेक्नोलॉजी और विज्ञान-आधारित नीतियों को बढ़ावा देना जरूरी है।
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के हालिया अनुमानों पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. परोदा ने कहा कि भारतीय कॉटन उद्योग कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय सुधारने और टेक्सटाइल वैल्यू चेन को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता पर जोर दिया।
CAI के अनुसार, 2025-26 सीजन में भारत का कॉटन आयात लगभग 6 मिलियन बेल (60 लाख बेल) तक पहुंच सकता है, जबकि निर्यात घटकर करीब 1.5 मिलियन बेल (15 लाख बेल) रहने का अनुमान है। घरेलू खपत का अनुमान 34.8 मिलियन बेल (348 लाख बेल) तक बढ़ाया गया है, जो उत्पादन और मांग के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाता है।
डॉ. परोदा ने कहा कि भारत ने लंबे समय तक वैश्विक कॉटन बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि नई कृषि तकनीकों को अपनाने और पारदर्शी, विज्ञान-आधारित नियामक व्यवस्था के माध्यम से इस क्षेत्र को मजबूत किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि कई प्रमुख कॉटन उत्पादक देशों ने आधुनिक कृषि तकनीकों और जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों के जरिए उत्पादकता में सुधार किया है। भारतीय किसानों को भी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नई तकनीकों तक बेहतर पहुंच मिलनी चाहिए।
डॉ. परोदा ने बताया कि कॉटन सेक्टर करीब 70 लाख किसानों की आजीविका से जुड़ा है और देश के टेक्सटाइल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा कि उत्पादकता सुधार से किसानों की आय बढ़ाने के साथ पूरी कॉटन वैल्यू चेन को मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कॉटन मिशन को सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि इसमें उन्नत कृषि तकनीकों की भूमिका पर भी ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि विज्ञान-आधारित नीतियों और नवाचारों को बढ़ावा देकर भारत वैश्विक कॉटन क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।
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