“महाराष्ट्र में कपास संकट: घटती खेती और किसानों का बदलता रुख”

2026-04-20 12:11:47
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“सफेद सोना संकट में: महाराष्ट्र में कपास की खेती का तेज़ी से सिमटता दायरा और किसानों का बदलता रुख”


महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों में कभी “सफेद सोना” कही जाने वाली कपास की खेती अब गंभीर संकट से गुजर रही है। जो इलाके कभी देश के प्रमुख “कॉटन बेल्ट” माने जाते थे, खासकर धाराशिव और आसपास के जिले, वहां कपास का रकबा तेजी से घटता जा रहा है और कई जगह यह लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच गया है।


धाराशिव जिले में स्थिति बेहद चिंताजनक है, जहां 5.5 लाख हेक्टेयर खरीफ क्षेत्र में अब केवल 172 हेक्टेयर में कपास की खेती बची है। कलंब तालुका में यह और भी निचले स्तर पर पहुंच गई है, जहां 78,000 हेक्टेयर में से मात्र 5 हेक्टेयर में कपास उगाई जा रही है। पहले जहां हजारों हेक्टेयर में यह फसल प्रमुख रूप से होती थी, अब इसमें 99 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। जलगांव सहित अन्य जिलों में भी पिछले कुछ वर्षों से कपास का रकबा लगातार घट रहा है।


कपास, जो 1990 के दशक में किसानों की प्रमुख नकदी फसल बनी थी, अब लगातार घाटे का सौदा साबित हो रही है। इसकी खेती में प्रति एकड़ लगभग ₹35,000 तक की लागत आ रही है। मजदूरी दरों में वृद्धि, पूरी तरह श्रमिकों पर निर्भर कटाई प्रणाली और कीटनाशकों पर बढ़ता खर्च किसानों पर बोझ बढ़ा रहे हैं। गुलाबी बॉलवॉर्म जैसे कीटों का प्रकोप, अनियमित बारिश, जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की घटती उर्वरता ने उत्पादन को और प्रभावित किया है।


हालांकि सरकार ने कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में लगातार वृद्धि की है—2021-22 में ₹5,726 से बढ़ाकर 2024-25 में ₹7,521 तक—लेकिन किसानों का कहना है कि यह बढ़ोतरी बढ़ती लागत के मुकाबले पर्याप्त नहीं है। कई बार बाजार में MSP से कम दाम मिलने से किसानों का भरोसा कमजोर हुआ है। साथ ही महाराष्ट्र में उत्पादकता भी केवल लगभग 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है।


इन परिस्थितियों के कारण किसान तेजी से सोयाबीन और मक्का जैसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि इनमें लागत कम है और आय अपेक्षाकृत जल्दी मिलती है। कपास उत्पादन में गिरावट का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव जिनिंग उद्योग, रोजगार और कपड़ा उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ रहा है।


विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मशीनीकरण, बेहतर बीज, प्रभावी कीट नियंत्रण और स्थिर बाजार मूल्य जैसी नीतियों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह फसल आने वाले वर्षों में कई क्षेत्रों से पूरी तरह गायब हो सकती है।

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