कॉटन ड्यूटी में राहत से मिलेगी राहत, लेकिन टेक्सटाइल इंडस्ट्री की असली चुनौती अभी बाकी
भारत सरकार ने 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक कपास (कॉटन) के आयात पर 11% कस्टम ड्यूटी में अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। सरकार का कहना है कि इस कदम से टेक्सटाइल उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल मिलेगा, इनपुट लागत घटेगी, MSME इकाइयों को राहत मिलेगी और भारतीय टेक्सटाइल उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।
केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह के अनुसार, यह निर्णय ऑफ-सीजन के दौरान कपास की उपलब्धता सुनिश्चित करने और निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिया गया है। उद्योग संगठनों का मानना है कि इस छूट से कपास की कीमतों में लगभग 6% तक कमी आ सकती है, जिससे यार्न, गारमेंट, टॉवल, बेडशीट और होम टेक्सटाइल बनाने वाली कंपनियों को राहत मिलेगी।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक अस्थायी समाधान है। भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की वास्तविक चुनौती कपास की कम उत्पादकता, गुणवत्ता संबंधी समस्याएं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा है। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) के अनुसार, भारत हर वर्ष औसतन करीब 20 लाख गांठ कपास आयात करता है, जो कुल घरेलू उत्पादन का लगभग 7% है। यह आयात मुख्य रूप से बेहतर गुणवत्ता वाले धागे और निर्यात ऑर्डर पूरे करने के लिए किया जाता है।
उद्योग का कहना है कि बांग्लादेश, वियतनाम, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों में कपास के आयात पर कोई शुल्क नहीं है। इसके मुकाबले भारतीय मिलों पर 11% आयात शुल्क उनकी लागत बढ़ाता है और निर्यात प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करता है। पिछले वर्षों में भारत की वैश्विक कॉटन यार्न निर्यात हिस्सेदारी में भी गिरावट दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की औसत कपास उत्पादकता 450–500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। साथ ही, फाइबर की गुणवत्ता और कंटैमिनेशन भी बड़ी समस्या बनी हुई है। उनका कहना है कि केवल ड्यूटी में राहत देने से दीर्घकालिक समाधान नहीं निकलेगा। भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को मजबूत बनाने के लिए बेहतर बीज, आधुनिक खेती, उच्च गुणवत्ता वाली कपास, सप्लाई चेन सुधार और उत्पादकता बढ़ाने पर समान रूप से ध्यान देना होगा। तभी भारत वैश्विक टेक्सटाइल बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रख सकेगा।