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भारत में कपास बाज़ार: रुझान बढ़ा, चुनौतियाँ कायम

2026-04-13 11:48:26
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भारत कपास बाज़ार: कपास की ओर रुझान, लेकिन चुनौतियाँ बनी हुई हैं


भारत का कपास बाज़ार 2025–26 के दौरान कई उतार-चढ़ाव से गुज़र रहा है। एक ओर कीमतों में सुधार के संकेत हैं, तो दूसरी ओर संरचनात्मक और वैश्विक चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं।


2025 में घरेलू बाजार पर दबाव बना रहा, क्योंकि सरकार ने सितंबर से 31 दिसंबर तक कपास आयात को शुल्क मुक्त कर दिया था। इससे आयातित कपास और स्थानीय आवक दोनों बढ़ीं, जिसके कारण किसानों को बेहतर दाम नहीं मिल सके। हालांकि 1 जनवरी 2026 से 11 प्रतिशत आयात शुल्क लागू होने के बाद बाजार में सुधार देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कीमतों में मजबूती आई, जिससे घरेलू कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य के आसपास या उससे ऊपर टिकने लगीं।


हाल के वैश्विक घटनाक्रमों, विशेषकर युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, ने कपास बाजार को सहारा दिया है। तेल महंगा होने से पॉलिएस्टर और रेयान जैसे मानव निर्मित रेशों की लागत बढ़ी, जिससे कपास की मांग में वृद्धि हुई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास के दाम लगभग 13 प्रतिशत बढ़े, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा।


निर्यात के मोर्चे पर भी सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। कपास, धागा और वस्त्र निर्यात में संभावित वृद्धि से किसानों को बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद है। इसी वजह से आने वाले सीजन में किसान कपास की खेती बढ़ाने की ओर झुक सकते हैं। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुमान के अनुसार, 2026-27 में भारत में कपास का रकबा लगभग 3 प्रतिशत बढ़ सकता है और उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।

भारत में कपास की खेती क्षेत्रीय रूप से अलग-अलग समय पर की जाती है। उत्तर भारत (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान) में अप्रैल–मई के दौरान बुवाई होती है और यह क्षेत्र कुल उत्पादन का लगभग 14 प्रतिशत देता है। मध्य भारत (गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश) देश का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र है, जिसकी हिस्सेदारी करीब 55 प्रतिशत है और यहां जून–जुलाई में बुवाई होती है। दक्षिण भारत (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु) में अगस्त–सितंबर में बुवाई होती है, जहां लंबी किस्म के रेशे का उत्पादन होता है।


राज्य स्तर पर तस्वीर मिश्रित है। पंजाब में सरकार के प्रोत्साहन के चलते कपास क्षेत्र बढ़ने की संभावना है, जबकि हरियाणा और राजस्थान में कीट, सिंचाई और वैकल्पिक फसलों के कारण रकबा घट सकता है। गुजरात में किसान बेहतर लाभ देने वाली मूंगफली और जीरा जैसी फसलों की ओर झुक सकते हैं, जबकि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में क्षेत्र स्थिर रहने का अनुमान है। दक्षिण भारत में विशेषकर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में समर्थन मूल्य के कारण खेती बढ़ सकती है।

वैश्विक स्तर पर भी कपास उत्पादन और मांग में बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका में 2026-27 के लिए कपास क्षेत्र में लगभग 4 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। टेक्सास और जॉर्जिया जैसे प्रमुख राज्यों में उत्पादन बढ़ने की संभावना है।

हालांकि, कपास उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती मानव निर्मित रेशों से प्रतिस्पर्धा है। पिछले कुछ दशकों में पॉलिएस्टर का उपयोग तेजी से बढ़ा है। जहां 1970 में लगभग 50 प्रतिशत वस्त्र कपास से बनते थे, वहीं 2024 तक यह हिस्सा घटकर 20 प्रतिशत से भी कम रह गया है। इसके विपरीत, पॉलिएस्टर का उपयोग लगातार बढ़ रहा है और अब यह कुल वस्त्र उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा बन चुका है।

निष्कर्षतः, कपास बाजार में फिलहाल सुधार के संकेत हैं, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए उत्पादन लागत, जलवायु जोखिम और सिंथेटिक फाइबर से प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से निपटना आवश्यक होगा।


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