कपास संकट: ‘सफेद सोने’ के पीछे छिपा काला सच
भारतीय कृषि व्यवस्था में कपास एक प्रमुख नकदी फसल के रूप में स्थापित है। ‘सफेद सोना’ कहलाने वाली यह फसल न केवल किसानों की आय का आधार है, बल्कि देश के विशाल वस्त्र उद्योग की रीढ़ भी है। महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में इसकी व्यापक खेती होती है, और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है।
फिर भी, हाल के वर्षों में कपास क्षेत्र गंभीर संकट से गुजर रहा है। पिछले पांच वर्षों में कपास के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल में 20 लाख हेक्टेयर से अधिक की कमी आई है। इसका प्रमुख कारण है—कपास की खेती का लगातार घाटे का सौदा बनना।
कम उत्पादकता, बढ़ती लागत और उचित मूल्य न मिल पाने के कारण किसान हतोत्साहित हो रहे हैं। इसके साथ ही, इस फसल में मशीनीकरण की भारी कमी है। बुवाई से लेकर तुड़ाई तक लगभग सभी कार्य श्रम-आधारित हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी लगातार बढ़ रही है। परिणामस्वरूप, मजदूरी बढ़ने के बावजूद किसानों को श्रमिक नहीं मिल पा रहे, जिससे उनकी लागत और बढ़ जाती है।
इस संकट के पीछे नीतिगत असंतुलन भी एक बड़ा कारण है। पिछले दो-तीन दशकों में सरकार की आयात-निर्यात नीतियों ने कपास उत्पादकों को अस्थिरता में धकेला है। जब घरेलू उत्पादन बढ़ता है और कीमतें गिरती हैं, तो किसान नुकसान झेलते हैं; वहीं जब कीमतें बढ़ती हैं, तो आयात को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे बाजार फिर से दबाव में आ जाता है। यह चक्र किसानों के लिए निराशाजनक साबित हुआ है।
अनुसंधान संस्थानों, विशेषकर सीआईसीआर (केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान), की भूमिका भी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई है। वर्षों से उत्पादकता बढ़ाने और समस्याओं की पहचान के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन ठोस परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं। गुलाबी इल्ली जैसी कीट समस्या भी लगातार चुनौती बनी हुई है।
यदि कपास को फिर से लाभकारी फसल बनाना है, तो बहुआयामी सुधार आवश्यक हैं। उन्नत और उच्च उत्पादकता वाली किस्मों का विकास और उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। बीटी कपास के बीज किसानों तक सीधे और सुलभ रूप में पहुंचने चाहिए। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना होगा और आधुनिक खेती तकनीकों को अपनाना अनिवार्य होगा।
साथ ही, खेती के हर चरण—बुवाई से लेकर कटाई तक—का मशीनीकरण किया जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों पर निर्भरता कम हो सके। देशी किस्मों की सघन खेती को भी बढ़ावा देना चाहिए, जिससे उत्पादकता में वृद्धि संभव है।
कपास की कीमत तय करने की प्रक्रिया में भी सुधार जरूरी है। मूल्य निर्धारण कपास की गुणवत्ता और उसमें मौजूद रेशे के प्रतिशत के आधार पर होना चाहिए। इसके अलावा, ‘कपास से कपड़े तक’ की पूरी वैल्यू चेन को स्थानीय स्तर पर विकसित किया जाना चाहिए, ताकि किसानों को मूल्य संवर्धन में उचित हिस्सेदारी मिल सके।
इन सुधारों के माध्यम से ही कपास की खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है। अन्यथा, ‘सफेद सोना’ धीरे-धीरे किसानों के लिए बोझ बनता जाएगा—और इसका असर पूरे कृषि और औद्योगिक तंत्र पर पड़ेगा।
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