गुजरात की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में बढ़ती लागत से मार्जिन पर दबाव
गुजरात की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री इन दिनों विस्तार या नए ऑर्डर की बजाय बढ़ती इनपुट लागत से जूझने में ज्यादा समय बिता रही है। टेक्सटाइल, केमिकल, फार्मा और रियल एस्टेट सेक्टर के कारोबारी बताते हैं कि कच्चे माल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और कमजोर मांग ने मार्जिन बनाए रखना मुश्किल कर दिया है।
कई कंपनियां धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन MSME सेक्टर का बड़ा हिस्सा लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पा रहा है। इसका असर प्रोजेक्ट्स में देरी, उत्पादन में कमी और पूरी इंडस्ट्रियल वैल्यू चेन में महंगाई के दबाव के रूप में देखा जा रहा है।
टेक्सटाइल उद्योग विशेष रूप से दबाव में है। कॉटन यार्न की बढ़ती कीमतें, क्रूड-लिंक्ड केमिकल्स और ऊंची फ्यूल लागत ने उत्पादन खर्च को तेजी से बढ़ा दिया है। पिछले कुछ हफ्तों में धागे की उपलब्धता घटने और प्रोसेसिंग चार्ज बढ़ने के कारण कपड़े की कीमतें भी लगभग 10 से 25 रुपये प्रति मीटर तक बढ़ गई हैं।
उद्योग के अनुसार, चीन से मजबूत एक्सपोर्ट डिमांड ने कॉटन यार्न की कीमतों को चार साल के उच्च स्तर तक पहुंचा दिया है, जबकि वेस्ट एशिया में तनाव ने डाइंग और प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होने वाले क्रूड-आधारित इनपुट्स को और महंगा कर दिया है। पावरलूम यूनिट्स में धागे की कमी के चलते उत्पादन भी घटा है, जिससे सप्लाई और सीमित हो गई है।
हालांकि रुपये में गिरावट से एक्सपोर्टर्स को लाभ मिलने की उम्मीद थी, लेकिन ऊंची शिपिंग लागत और खरीदारों की डिस्काउंट मांग ने इस फायदा को कम कर दिया है। इंडस्ट्री प्रतिनिधियों का कहना है कि बढ़ती लागत और अनिश्चित मांग के कारण कई यूनिट्स को ऑर्डर होने के बावजूद उत्पादन रोकना पड़ रहा है।
इसी बीच, 11% कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की मांग भी तेज हुई है, ताकि कच्चे माल की लागत कम होकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
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