गुजरात में कमजोर मानसून से खेती पर खतरा, फसल नुकसान मुआवजा ₹22,700 करोड़ के पार
2026-06-17 11:56:09
गुजरात में मॉनसून की देरी से खेती पर बढ़ा जोखिम, एक दशक में फसल नुकसान मुआवज़ा ₹22,700 करोड़ के पार
गुजरात में मॉनसून की कमजोर शुरुआत ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। 16 जून तक राज्य में सामान्य से 83 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि सौराष्ट्र क्षेत्र के नौ जिलों में वर्षा की कमी 100 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह स्थिति दर्शाती है कि राज्य में मॉनसून का आगमन न केवल देर से हुआ है, बल्कि इसकी शुरुआत भी असमान और कमजोर रही है। ऐसे में खरीफ़ फसलों की बुआई और शुरुआती विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
हालांकि बारिश की कमी के बावजूद किसानों ने बुआई शुरू कर दी है। अब तक लगभग 4.27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ़ फसलों की बुआई हो चुकी है, जो सामान्य खरीफ़ क्षेत्र का करीब 5 प्रतिशत है। इसमें कपास और मूंगफली प्रमुख फसलें हैं। किसानों ने लगभग 2.39 लाख हेक्टेयर में कपास तथा 1.36 लाख हेक्टेयर में मूंगफली की बुआई की है। लेकिन यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो इन शुरुआती फसलों को नमी की कमी (मॉइस्चर स्ट्रेस) का सामना करना पड़ सकता है, जिससे अंकुरण और पैदावार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
मौजूदा स्थिति राज्य में बढ़ती जलवायु अनिश्चितता की व्यापक तस्वीर का हिस्सा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2016 से वित्त वर्ष 2026 के बीच गुजरात सरकार ने फसल नुकसान के लिए किसानों को कुल ₹22,733 करोड़ का मुआवज़ा वितरित किया है। यह राशि बेमौसम बारिश, अत्यधिक वर्षा, चक्रवाती तूफानों और अन्य मौसम संबंधी आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई के लिए दी गई।
एक दशक में राहत राशि में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। वित्त वर्ष 2016 में मुआवज़ा केवल ₹279 करोड़ था, जो वित्त वर्ष 2021 में बढ़कर ₹2,906 करोड़ हो गया। वहीं वित्त वर्ष 2026 में यह राशि रिकॉर्ड ₹10,337 करोड़ तक पहुंच गई। कुल राहत राशि का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा केवल वित्त वर्ष 2026 में वितरित किया गया, जो हाल के वर्षों में मौसमजनित नुकसान की गंभीरता को दर्शाता है।
पिछले दस वर्षों में लगभग 1.36 करोड़ किसानों को फसल नुकसान के लिए सहायता मिली है। इनमें कई ऐसे किसान भी शामिल हैं जिन्हें अलग-अलग वर्षों में एक से अधिक बार राहत प्राप्त हुई। कुल राहत राशि में से ₹15,829 करोड़ SDRF के माध्यम से तथा ₹6,904 करोड़ राज्य सरकार के बजट से दिए गए। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि जलवायु जोखिम अब कृषि क्षेत्र के लिए लगातार बढ़ती चुनौती बनते जा रहे हैं, जिससे किसानों और राज्य दोनों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।