ग्लोबल कीमतों में गिरावट से भारतीय कपास बाजार पर दबाव, आवक बढ़ने की उम्मीद
कपास बाजार: वैश्विक कपास कीमतों में गिरावट, घरेलू बाजार में नई फसल की बढ़ती आवक और कमजोर मांग का असर भारतीय कपास बाजार पर दिखाई देने लगा है। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) की नीलामी में 2025-26 सीजन की कपास की कीमतें पिछले दो दिनों में करीब ₹1,200 प्रति कैंडी घट गई हैं।
व्यापारिक सूत्रों के अनुसार, घरेलू कपास की कीमतें हाल के करीब ₹70,000 प्रति कैंडी के उच्च स्तर से घटकर ₹64,500-65,500 प्रति कैंडी के आसपास आ गई हैं। इस बाजार संदर्भ में एक कैंडी 356 किलोग्राम मानी गई है। कपास बीज की कीमतों में भी गिरावट आई है, जिसका असर कच्चे कपास की कीमतों पर पड़ रहा है।
वैश्विक बाजार में भी कमजोरी देखी गई। न्यूयॉर्क के इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (ICE) पर दिसंबर डिलीवरी वाले कॉटन फ्यूचर्स का भाव करीब 80.13 सेंट प्रति पाउंड था, जबकि अगस्त के अंत में यह करीब 93 सेंट प्रति पाउंड के उच्च स्तर पर पहुंच गया था।
खरीदारी धीमी, नई फसल की आवक बढ़ने की उम्मीद
रायचूर के सोर्सिंग एजेंट रामानुज दास बूब के अनुसार, कपास बीज की कीमतें ₹300-400 प्रति क्विंटल घटकर करीब ₹4,600-4,700 प्रति क्विंटल रह गई हैं। उन्होंने बताया कि खरीदार फिलहाल धीमी गति से खरीदारी कर रहे हैं। स्पिनिंग मिलों की ओर से गांठों की मांग भी सीमित है और कई मिलों के पास करीब 1 से 1.5 महीने का स्टॉक उपलब्ध है।
नई फसल की दैनिक आवक फिलहाल करीब 45,000-50,000 गांठ बताई जा रही है। CotYarn ट्रेड लिंक के आनंद पोपट के अनुसार, अक्टूबर में नई फसल की आवक और बढ़ने की उम्मीद है। इससे घरेलू कपास की कीमतों पर कुछ समय के लिए दबाव बना रह सकता है। हालांकि, स्पिनिंग मिलों के पास पुरानी फसल की सीमित उपलब्धता बाजार को कुछ सहारा दे सकती है।
आनंद पोपट के अनुसार, भारतीय कपास बाजार अब आपूर्ति-आधारित दौर में प्रवेश कर रहा है। आगे कीमतों की दिशा नई फसल की आवक, मिलों की खरीद और ड्यूटी-फ्री कपास आयात पर सरकारी नीति जैसे कारकों पर निर्भर कर सकती है।
वहीं, राधालक्ष्मी ग्रुप के CMD अतुल एस. गनात्रा ने कपास उत्पादक राज्यों में किसानों से बातचीत और खड़ी फसल के सर्वे के आधार पर अनुमान जताया है कि 2026-27 में कपास उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में करीब 10 प्रतिशत कम रह सकता है। गनात्रा के अनुसार, इस साल जून से सितंबर के दौरान कम बारिश हुई। इससे आगे की तुड़ाई के लिए किसानों के पास पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
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