ईरान संघर्ष और बढ़ती लागत के बीच मार्च में भारत के कपड़ा उत्पादन में गिरावट
मार्च में भारत के कपड़ा उद्योग पर कई मोर्चों से दबाव पड़ा, जिसके चलते उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई। रेडीमेड परिधान, सूती वस्त्र और मिश्रित कपड़े जैसे प्रमुख सेगमेंट सबसे अधिक प्रभावित रहे। बढ़ती इनपुट लागत, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर मांग ने इस गिरावट को और तेज कर दिया।
आंकड़ों के अनुसार, मार्च में कपड़ा विनिर्माण में साल-दर-साल 3.6% की कमी आई, जबकि परिधान उत्पादन में 14.6% की तेज गिरावट दर्ज की गई। लागत के मोर्चे पर स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण रही। सूती धागे की कीमतों में लगभग 20% की वृद्धि हुई, जबकि पैकेजिंग में उपयोग होने वाले पॉलिमर 50% तक महंगे हो गए। इसके अलावा, कागज की कीमतों में 10% और रंग-रसायनों में करीब 40% की बढ़ोतरी ने उत्पादन लागत को और बढ़ा दिया।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, विशेषकर ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने शिपमेंट और लॉजिस्टिक्स को गंभीर रूप से प्रभावित किया। कई निर्यात ऑर्डर अटक गए, माल ढुलाई की लागत बढ़ गई और युद्ध-जोखिम बीमा भी महंगा हो गया। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने इनपुट लागत को और बढ़ाया, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ा और कार्यशील पूंजी की स्थिति कड़ी हो गई।
उत्पादन के विभिन्न खंडों में गिरावट व्यापक रही। पॉलिएस्टर/विस्कोस मिश्रित कपड़े का उत्पादन 13.1% घटा, जबकि सूती कपड़ों में भी लगभग 4% की गिरावट देखी गई। होम टेक्सटाइल सेगमेंट, विशेषकर टेरी टॉवल, में 6.1% की कमी आई। वहीं, रेडीमेड गारमेंट्स में गिरावट अधिक रही—नॉन-निटेड कपड़ों का उत्पादन 14.9% और निटेड परिधानों का उत्पादन 11% कम हुआ।
वैश्विक स्तर पर भी चुनौतियां बनी हुई हैं। अमेरिका के टैरिफ, व्यापार मार्गों में व्यवधान और वियतनाम व बांग्लादेश से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने निर्यात पर असर डाला है। साथ ही, घरेलू मांग में कमजोरी भी उद्योग के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
कुल मिलाकर, कपड़ा और परिधान क्षेत्र—जो भारत के जीडीपी में 2.3% और औद्योगिक उत्पादन में लगभग 13% योगदान देता है—निकट अवधि में अनिश्चितता का सामना कर रहा है। यदि भू-राजनीतिक तनाव और लागत दबाव जारी रहते हैं, तो उत्पादन और मुनाफे पर असर आगे भी बना रह सकता है।