कर्नाटक में कमजोर मानसून से खरीफ फसलों और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ा संकट
2026-07-18 13:49:56
कर्नाटक की खेती को मानसून की अनिश्चितता से बचाने की चुनौती
मानसून में आई भारी कमी ने कर्नाटक के किसानों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिसका असर राष्ट्रीय स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है। जुलाई के पहले सप्ताह तक खरीफ़ फसलों की बुआई निर्धारित लक्ष्य के केवल एक-तिहाई हिस्से तक ही पहुंच पाई थी। जून से अक्टूबर तक चलने वाले इस कृषि मौसम में किसान आमतौर पर धान, मक्का, रागी, ज्वार और बाजरा जैसे अनाज; अरहर और अन्य दालें; मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन और नाइजर बीज जैसे तिलहन; तथा कपास, गन्ना, तंबाकू और लाल मिर्च जैसी नकदी फसलें उगाते हैं।
इन फसलों का उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। राजस्थान के बाद कर्नाटक में देश का सबसे बड़ा शुष्क कृषि क्षेत्र है और राज्य की लगभग 84.79 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बारिश पर आधारित है। इस कारण वर्षा में किसी भी तरह की कमी सीधे कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है। इस वर्ष अल-नीनो प्रभाव के कारण वर्षा में भारी कमी दर्ज की गई है। मलनाड क्षेत्र, तटीय कर्नाटक, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक और दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में वर्षा की कमी क्रमशः 34 प्रतिशत, 30 प्रतिशत, 24 प्रतिशत और 18 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।
इस संकट का प्रभाव केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य देश में मोटे अनाज के प्रमुख उत्पादकों में शामिल है और अरहर दाल की खेती के लिए सबसे अधिक क्षेत्रफल भी यहीं है। इसलिए कर्नाटक के कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट का असर देशभर में खाद्यान्न आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।
इस प्राकृतिक संकट के साथ मानवीय चुनौती भी बढ़ रही है। कर्नाटक की लगभग 1.37 करोड़ आबादी, यानी राज्य के हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति की आजीविका कृषि पर निर्भर है। ऐसे हालात में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्थिति का आकलन करने और राहत उपायों के लिए केंद्रीय टीम भेजने का आग्रह किया है।
केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता आवश्यक है, लेकिन कर्नाटक को इस संकट से एक दीर्घकालिक सबक भी लेना होगा। राज्य की खेती लंबे समय से मानसून की अनिश्चितता पर निर्भर रही है। अब आवश्यकता है कि सरकार केवल शहरी विकास, विशेषकर बड़े शहरों की परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय कृषि क्षेत्र की जल सुरक्षा को प्राथमिकता दे।
इसके लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, जल संरक्षण उपायों को मजबूत करना, सूखा-सहने वाली फसलों को बढ़ावा देना, नहर नेटवर्क का विस्तार, भूजल पुनर्भरण में सुधार और आधुनिक सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल जरूरी है। लक्ष्य केवल मौजूदा संकट से निपटना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए जो किसानों को मानसून की अनिश्चितताओं से दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान कर सके।
कृषि को प्राकृतिक अनिश्चितताओं का शिकार बनने से रोकना केवल कर्नाटक की जरूरत नहीं है, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।