नागपुर जिले के कपास किसानों को इस साल खराब मौसम और जटिल खरीद प्रक्रिया के कारण गंभीर वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। खुले बाजार में कपास का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम है, लेकिन भारतीय कपास निगम (सीसीआई) की जटिल पंजीकरण और खरीद प्रक्रिया ने कई किसानों को कम कीमत पर व्यापारियों को कपास बेचने के लिए मजबूर कर दिया है।
जिले में इस सीजन में 2.21 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई। मौसम की अनिश्चितता और रुक-रुक कर बारिश होने के कारण फसल की वृद्धि धीमी रही। बाद में धूप और संतुलित बारिश से फसल बेहतर हुई, लेकिन पहले की अपेक्षा कपास की फसल नवंबर-अंत और दिसंबर की शुरुआत में ही तैयार हुई।
किसान एमएसपी का लाभ पाने की उम्मीद में कपास की बिक्री रोककर रख रहे थे। हालांकि, सीसीआई ने जिलेवार कोटा तय किया और ‘कपास किसान’ ऐप पर जटिल पंजीकरण और स्लॉट बुकिंग की प्रक्रिया ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दीं। कई किसानों को समय पर स्लॉट नहीं मिलने के कारण उन्हें एमएसपी से कम भाव पर व्यापारियों को कपास बेचनी पड़ी।
नागपुर जिले में आठ सीसीआई खरीद केंद्र शुरू किए गए हैं। लेकिन केंद्रों की दूरी, कपास परिवहन की लागत और कपास उतारने में श्रम व समय की मुश्किलों के कारण कई किसान इन्हें नहीं पहुंच पाए। इसके कारण केंद्रीय खरीद केंद्रों पर अपेक्षित खरीद गतिविधि नहीं हुई।
खुले बाजार में कपास का औसत भाव 7,350 रुपये प्रति क्विंटल है, जो लंबे रेशे वाली कपास के एमएसपी 8,110 रुपये से 350 से 1,010 रुपये कम है। किसानों का आरोप है कि सीसीआई नमी के नाम पर दर कम कर रही है और वास्तविक एमएसपी पर खरीद नहीं कर रही।
सीसीआई ने खरीद की अंतिम तिथि 28 फरवरी से बढ़ाकर 15 मार्च कर दी है, लेकिन इससे जिले के अधिकांश किसानों को कोई लाभ मिलने की संभावना कम है। कई किसानों ने अधिक कीमत की उम्मीद में कपास भंडारण भी किया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की घटनाओं और कीमतों में गिरावट ने उनकी उम्मीदें भी ध्वस्त कर दीं।
कपास किसान संजय वानखड़े ने कहा कि सरकार केवल एमएसपी की घोषणाओं से सहानुभूति दिखाती है, लेकिन पंजीकरण, स्लॉट बुकिंग और कोटा जैसी प्रक्रियाओं ने किसानों को परेशानी में डाल दिया है। उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी कार्रवाई न करने पर नाराजगी जताई।