कमजोर मानसून से नासिक में खरीफ बुवाई प्रभावित, 45% कृषि भूमि अब भी बिना बोई

2026-07-13 12:43:12
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नासिक डिवीजन में बुवाई पर बारिश की मार, 45% कृषि क्षेत्र अब भी खाली

नासिक रोड: नासिक डिवीजन में कमजोर और असमान मानसून के कारण खरीफ सीजन प्रभावित होता नजर आ रहा है। पिछले सप्ताह कुछ इलाकों में हुई बारिश से किसानों को राहत की उम्मीद जगी थी, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में लगातार और पर्याप्त वर्षा नहीं होने से बुवाई की रफ्तार धीमी बनी हुई है। मॉनसून शुरू हुए करीब डेढ़ महीना बीत जाने के बावजूद मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होने से बड़ी संख्या में किसान अब भी बुवाई का इंतजार कर रहे हैं। कृषि विभाग के अनुसार, डिवीजन की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 45 प्रतिशत हिस्से में अब तक बुवाई नहीं हो सकी है।

बढ़ती कृषि लागत ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। बीज, उर्वरक, खेत की तैयारी और मजदूरी पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में काफी बढ़ चुका है। ऐसे में किसान कम नमी वाली जमीन में बुवाई का जोखिम नहीं लेना चाहते। उनका कहना है कि यदि पर्याप्त बारिश के बिना बुवाई की गई, तो बीज खराब होने और दोबारा बुवाई की नौबत आ सकती है, जिससे लागत दोगुनी हो जाएगी। यही कारण है कि अधिकांश किसान अच्छी और लगातार बारिश का इंतजार कर रहे हैं।

कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नासिक डिवीजन में खरीफ फसलों का औसत रकबा 20.33 लाख हेक्टेयर है। इसके मुकाबले अब तक केवल 11.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई पूरी हो पाई है, यानी लगभग 55 प्रतिशत क्षेत्र में खेती शुरू हुई है, जबकि शेष 45 प्रतिशत क्षेत्र अब भी खाली है। नासिक और नंदुरबार जिले सबसे अधिक प्रभावित माने जा रहे हैं।

विभाग ने किसानों को मौसम का पूर्वानुमान देखकर ही बुवाई करने की सलाह दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मिट्टी में पर्याप्त नमी होने के बाद ही बीज बोए जाएं और उर्वरकों का संतुलित उपयोग किया जाए। यदि सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है, तो किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन और कृषि संबंधी सलाह उपलब्ध कराई जाएगी।

इस बीच, नगरसुल के सेवानिवृत्त शिक्षक अंकुश निवृत्ति निकम ने खेती की लागत कम करने के लिए आधुनिक मशीनों के उपयोग का उदाहरण पेश किया है। उन्होंने इंटर-कल्टिवेशन के लिए मैकेनिकल वीडर खरीदा है, जिससे एक एकड़ में गुड़ाई का काम केवल एक लीटर पेट्रोल में पूरा हो जाता है। उनके अनुसार, जहां बैलों से यही काम कराने पर करीब 1,600 रुपये प्रति एकड़ खर्च आता है, वहीं मशीन से यह लागत घटकर लगभग 100 रुपये रह जाती है। यह मशीन प्रतिदिन तीन से चार एकड़ क्षेत्र में काम कर सकती है, जिससे मजदूरी पर होने वाला खर्च भी काफी कम हो जाता है।

निकम ने किसानों से खेती में आधुनिक मशीनों को अपनाने की अपील की है। वहीं स्थानीय सोसायटी के प्रभाकर जगन्नाथ कुडके ने सरकार से मांग की है कि बड़े ट्रैक्टरों की तरह छोटे ट्रैक्टरों और इंटर-कल्टिवेशन मशीनों पर भी सब्सिडी दी जाए, ताकि अधिक किसान आधुनिक तकनीक का लाभ उठाकर खेती की लागत कम कर सकें।


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