कभी सफेद सोना उगाकर हो रहे थे मालामाल, अब गुलाबी आफत ने किया बर्बाद !
भारत के कुछ राज्यों में कपास की खेती बीते काफी दिनों से किसानों के लिए घाटे का सौदा बन रही है. गुलाबी सुंडी कपास की खेती को भयंकर तरीके से नुकसान पहुंचा रही है.
सफेद सोना... यानी कपास. भारत के तीन राज्यों के हजारों किसान कपास की खेती कर अपनी तकदीर बदलते आए हैं. लेकिन अब यही 'सफेद सोना' उनके लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा. इस घाटे का सबब बनी है एक 'गुलाबी आफत'. ये ही गुलाबी सुंडी जिसे पिंक बॉलवर्म भी कहते हैं. इसके चलते अब तक मोटा मुनाफा कमाते आए किसानों को घाटा हो रहा. इस घाटे में 'होर्मूज संकट' भी काफी हद तक जिम्मेदार है. नतीजतन किसान अब मोटा अनाज बाजरा, मूंग की खेती कर रहे हैं.
दरअसल, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के हजारों किसान अब धीरे-धीरे कपास यानी नरमा की खेती छोड़कर बाजरा और दूसरी कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. कपास की खेती में काफी खाद का भी इस्तेमाल होता है. खाद की इन दिनों किल्लत चल ही रही है.
गुलाबी सुंडी' ने तोड़ी किसानों की कमर
कपास किसानों की सबसे बड़ी समस्या इस समय गुलाबी सुंडी है. यह कीड़ा कपास के फल के अंदर घुसकर बीज और रुई को अंदर ही अंदर खराब कर देता है. इसका असर ये होता है कि बाजार में किसानों को कपास का सही दाम तक नहीं मिल पाता. किसानों का कहना है कि कुछ साल पहले जहां एक एकड़ से 10 से 12 क्विंटल तक कपास निकल जाती थी, वहीं अब उत्पादन आधा या उससे भी कम रह गया है. कई इलाकों में तो किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है. हरियाणा के सिरसा, हिसार, फतेहाबाद और भिवानी, पंजाब के मानसा, भटिंडा, फाजिल्का और राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जैसे इलाके लंबे समय से देश की प्रमुख कपास बेल्ट माने जाते रहे हैं. लेकिन अब इन्हीं इलाकों में किसान कपास से दूरी बना रहे हैं.
महंगे स्प्रे भी बेअसर
कपास की फसल को बचाने के लिए किसानों को लगातार कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पड़ता है. अमेरिकन बॉलवर्म, स्पॉटेड बॉलवर्म, थ्रिप्स और अन्य कीड़ों से बचाव के लिए महंगे केमिकल्स का बार-बार छिड़काव करना पड़ता है. किसानों के मुताबिक एक सीजन में 5 से 10 बार तक स्प्रे करना पड़ता है. इसके बावजूद गुलाबी सुंडी खत्म नहीं होती. ज्यादा खाद और कीटनाशक ने खेती की लागत तो बढ़ा दी, लेकिन मुनाफा घटता जा रहा.
मजदूरों की कमी ने बढ़ाई परेशानी
खेत से कपास को चुनना बहुत मेहनत वाला काम माना जाता है. इस काम के लिए अच्छी खासी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती है, लेकिन गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन के कारण खेतों में मजदूरों की भारी कमी हो गई है. जो मजदूर मिल रहे हैं, वे भी कपास चुनने के लिए 12 से 25 रुपये प्रति किलो तक मजदूरी मांग रहे हैं. इससे खेती की लागत बढ़ गई है. किसान बताते हैं कि कपास बेचकर जो आमदनी होती है, उसका बड़ा हिस्सा मजदूरी और दवाइयों में ही निकल जाता है.
खाद और केमिकल का बढ़ता बोझ
कपास की खेती को सबसे महंगी फसलों में गिना जाता है इसमें भारी मात्रा में खाद और रासायनिक दवाइयों की जरूरत होती है. एक एकड़ खेत में ही कई बोरी डीएपी, यूरिया, एसएसपी और पोटाश डालनी पड़ती है. इसके अलावा अलग-अलग कीड़ों से बचाने के लिए महंगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पड़ता है. किसानों का कहना है कि हर साल खाद और दवाइयों के दाम तो बढ़ रहे हैं, लेकिन उत्पादन और मुनाफा घटता जा रहा है. ऐसे में कपास की खेती अब पहले जैसी फायदेमंद नहीं रही.
क्यों बढ़ रहा है बाजरे की ओर रुझान?
कपास से निराश किसान अब बाजरा जैसी फसलों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह कम लागत और कम जोखिम है. बाजरे की खेती में कम खाद लगती है. बहुत कम कीटनाशक की जरूरत होती है. पानी की खपत भी कम होती है. इसके साथ ही ये फसल जल्दी तैयार हो जाती है. जहां कपास की फसल को तैयार होने में लगभग छह महीने लगते हैं, वहीं बाजरा 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाता है. इन कारणों के चलते कपास के मुकाबले बाजरा किसानों को ज्यादा स्थिर और सुरक्षित विकल्प दे रहा है.
एक साल में तीन फसलें लेने का मौका
बाजरे की खेती करने वाले किसानों को साल के बचे समय में दो और खेती करने का मौका मिलता है. खरीफ में बाजरा बोने के बाद रबी में सरसों और फिर जायद सीजन में मूंग जैसी फसल बहुत आसानी से उगाई जा सकती है.
MSP पर खरीद सबसे बड़ी मांग
गुलाबी सुंडी, महंगी खाद और महंगी मजदूरी के बाद किसान जब मंडी में कपास बेचने जाता है तो वहां भी उसे MSP के मुताबिक दाम नहीं मिलता. अक्सर उन्हें एमएसपी से भी कम कीमत मिलती है.
साल 2025 में बाजरे का MSP 2775 रुपये प्रति क्विंटल था, लेकिन कई किसानों को बाजार में 2100 रुपये प्रति क्विंटल तक ही कीमत मिली. इस साल MSP बढ़ाकर 2900 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है, लेकिन किसानों को डर है कि अगर सरकारी खरीद नहीं हुई तो उन्हें फिर नुकसान उठाना पड़ सकता है.
खाद संकट ने बढ़ाई चिंता
इस साल अंतरराष्ट्रीय हालात ने भी किसानों की चिंता बढ़ा दी है. पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर के कारण खाद संकट की आशंका जताई जा रही है. भारत बड़े पैमाने पर खाद और उसके कच्चे माल के लिए इम्पोर्ट पर निर्भर है. अगर खाद महंगी हुई या समय पर उपलब्ध नहीं हुई तो धान, मक्का और गन्ने जैसी ज्यादा खाद मांगने वाली फसलों पर बड़ा असर पड़ सकता है.
क्या मिलेट्स ही भविष्य हैं?
संयुक्त राष्ट्र पहले ही 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स घोषित कर चुका है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा मिलेट उत्पादक देश है. बदलते मौसम, पानी की कमी और बढ़ती लागत के बीच अब बाजरा जैसे मोटे अनाज किसानों के लिए ज्यादा फायदे वाले विकल्प बनते दिख रहे हैं.
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