कपास आयात शुल्क कटौती पर मतभेद: निर्यातकों को राहत देने के पक्ष में कपड़ा मंत्रालय, कृषि मंत्रालय सतर्क
कच्चे कपास पर आयात शुल्क में कटौती को लेकर केंद्र सरकार के भीतर मतभेद उभरकर सामने आए हैं। कपड़ा मंत्रालय जहां परिधान निर्यातकों को राहत देने के लिए शुल्क घटाने या हटाने का समर्थन कर रहा है, वहीं कृषि मंत्रालय किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव पर फिलहाल सहमत नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट के कारण निर्यातकों की लागत बढ़ गई है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो रही है।
कपड़ा मंत्रालय का तर्क है कि आयात शुल्क में अस्थायी कटौती से कच्चे माल की लागत कम होगी और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। मंत्रालय ने यह भी आश्वासन दिया है कि यह कदम केवल ऑफ-सीजन में उठाया जाएगा, ताकि घरेलू किसानों पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। इसके बावजूद कृषि मंत्रालय इस मुद्दे को आर्थिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानते हुए सतर्क रुख अपना रहा है और व्यापक परामर्श के बाद ही निर्णय लेना चाहता है।
राजस्व विभाग ने भी स्पष्ट किया है कि आयात शुल्क में किसी भी बदलाव के लिए कृषि मंत्रालय की सहमति अनिवार्य होगी, जिससे निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है। इस बीच, परिधान निर्यात संवर्धन परिषद ने वित्त मंत्रालय से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि कपास की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है, खासकर उत्तर भारत में आपूर्ति की कमी के कारण। मिलों को अब कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की नीलामी पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है।
निर्यातकों का कहना है कि बाजार में सट्टेबाजी बढ़ने और यार्न व कपड़े की कीमतों में वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ रही है। इससे वैश्विक मांग मजबूत होने के बावजूद भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा कमजोर हो रही है। उन्होंने सरकार से तत्काल आयात शुल्क हटाने की अपील की है।
हालांकि भारत प्रमुख कपास उत्पादकों में से एक है, फिर भी ऑफ-सीजन में आयात की जरूरत पड़ती है। 2025-26 के लिए उत्पादन अनुमान 320.50 लाख गांठ है, लेकिन नीति निर्णय में किसानों और उद्योग दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बना हुआ है।