तेलंगाना में कपास की बुआई सामान्य रकबे से आगे, सोयाबीन और तिलहन भी पिछले साल से अधिक
तेलंगाना में खरीफ 2026 सीज़न के दौरान कपास की बुआई सामान्य रकबे से आगे निकल गई है। वहीं, सोयाबीन और कुल तिलहन का रकबा भी पिछले साल की समान अवधि की तुलना में बढ़ा है। तेलंगाना कृषि विभाग के 2 सितंबर 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में प्रमुख खरीफ फसलों की बुआई की स्थिति में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है।
कपास की बुआई सामान्य रकबे से अधिक
2 सितंबर तक तेलंगाना में कपास की बुआई 4,822,219 एकड़ (48.22 लाख एकड़) में हो चुकी है। राज्य में कपास का सामान्य रकबा 4,741,541 एकड़ (47.42 लाख एकड़) है। इस तरह कपास की बुआई सामान्य रकबे के 101.70% तक पहुंच गई है।
पिछले साल इसी अवधि में कपास की बुआई 4,541,547 एकड़ (45.42 लाख एकड़) में हुई थी। यानी इस साल कपास का रकबा पिछले साल के मुकाबले 280,672 एकड़ (करीब 2.81 लाख एकड़) अधिक है।
सोयाबीन का रकबा भी बढ़ा
सोयाबीन की बुआई 2 सितंबर तक 372,400 एकड़ (3.72 लाख एकड़) में हुई है। हालांकि यह राज्य के सामान्य रकबे 416,656 एकड़ (4.17 लाख एकड़) से कम है, लेकिन सामान्य रकबे का 89.38% हिस्सा कवर हो चुका है।
पिछले साल इसी अवधि में सोयाबीन की बुआई 360,385 एकड़ (3.60 लाख एकड़) में हुई थी। इस लिहाज से इस साल सोयाबीन का रकबा 12,015 एकड़ (करीब 0.12 लाख एकड़) बढ़ा है।
कुल तिलहन में भी बढ़ोतरी
राज्य में कुल तिलहन की बुआई 391,694 एकड़ (3.92 लाख एकड़) तक पहुंच गई है। इसके मुकाबले सामान्य रकबा 447,585 एकड़ (4.48 लाख एकड़) है। यानी अब तक सामान्य रकबे का 87.51% हिस्सा कवर हो चुका है।
पिछले साल इसी अवधि में कुल तिलहन की बुआई 368,630 एकड़ (3.69 लाख एकड़) में हुई थी। इस तरह इस साल तिलहन का रकबा 23,064 एकड़ (करीब 0.23 लाख एकड़) अधिक है।
मौसम पर रहेगी नजर
आने वाले दिनों में मौसम की स्थिति फसलों के विकास के लिए महत्वपूर्ण रहेगी। मौजूदा पूर्वानुमानों के अनुसार, तेलंगाना में मौसम सामान्यतः गर्म और बारिश अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना है। वहीं, आने वाले सप्ताह में प्रायद्वीपीय भारत में भी बारिश कम रहने का अनुमान है।
ऐसे में राज्य में फसल उत्पादन और बाजार की स्थिति को समझने के लिए दो प्रमुख रुझानों पर नजर रहेगी—कपास का रकबा सामान्य स्तर से ऊपर जाना और सोयाबीन व कुल तिलहन का रकबा पिछले साल की समान अवधि से अधिक रहना। मौसम की स्थिति आगे इन फसलों की उत्पादकता और बाजार में उपलब्धता पर असर डाल सकती है।
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