ड्यूटी-फ्री कपास आयात की अवधि बढ़ने से किसानों को दाम गिरने का डर
कम बारिश और सूखे की स्थिति से कपास की फसल प्रभावित होने के बीच विदर्भ के किसानों को उम्मीद है कि सरकार 31 अक्टूबर के बाद कपास के ड्यूटी-फ्री आयात की व्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाएगी। किसानों को डर है कि यदि शुल्क मुक्त आयात जारी रहा और विदेशी कपास की आवक बढ़ी, तो घरेलू बाजार में कपास की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। नई कपास की आवक अक्टूबर के मध्य तक शुरू होने की उम्मीद है।
भारत में कपास का आयात 31 अक्टूबर तक शुल्क मुक्त किया गया है। टेक्सटाइल उद्योग इस अवधि को आगे बढ़ाने की मांग कर रहा है। उद्योग का कहना है कि कपास की बढ़ती कीमतों से उत्पादन लागत बढ़ रही है और इससे मिलों के संचालन पर असर पड़ सकता है। वहीं, किसान और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ड्यूटी-फ्री आयात बढ़ने से घरेलू कपास के दाम कमजोर हो सकते हैं।
विदर्भ में कपास की खेती का बड़ा हिस्सा बारिश पर निर्भर है। यवतमाल जिले में 4.5 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती होती है। सूखे के आकलन से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, बारिश की कमी और गर्मी के तनाव से कपास के पौधों की वृद्धि प्रभावित हुई है। कई क्षेत्रों में कपास के डोडे झड़ने की समस्या भी सामने आई है।
किसानों के अनुसार, सामान्य स्थिति में एक पौधे पर करीब 40 से 50 डोडे हो सकते हैं, लेकिन कई खेतों में इनकी संख्या काफी कम रह गई है। यवतमाल की आर्णी तहसील के किसान शांतनु ठाकरे ने बताया कि उनके खेत में एक पौधे पर मुश्किल से 10 से 12 डोडे बचे हैं। उन्होंने कहा कि दूसरी तुड़ाई की भी ज्यादा उम्मीद नहीं है और आगे की तुड़ाई पर भी मौसम का असर पड़ सकता है।
इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) के अनुसार, भारत में लिंट यानी बीज निकालने के बाद बचने वाले कपास के रेशे का उत्पादन करीब 431 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले ब्राजील में यह करीब 2,200 किलोग्राम और उज्बेकिस्तान में करीब 1,700 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है। इससे वैश्विक बाजार में कपास की उपलब्धता पर्याप्त रहने की संभावना है।
कपास क्षेत्र के एक्टिविस्ट विजय जवंधिया ने कॉटलुक इंडेक्स का हवाला देते हुए कहा कि वैश्विक कपास की कीमत करीब 89 सेंट प्रति पाउंड है। उनके अनुसार, एक सप्ताह पहले कीमत करीब एक डॉलर प्रति पाउंड तक पहुंच गई थी, लेकिन अब इसमें गिरावट का रुख दिखाई दे रहा है। किसानों को आशंका है कि ऐसी स्थिति में ड्यूटी-फ्री आयात बढ़ने से घरेलू कपास की कीमतों पर और दबाव बन सकता है।
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