मानसून के बदले रुख से खरीफ फसलों पर संकट
दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमजोर होती गतिविधि और बारिश के असमान वितरण से इस साल खरीफ फसलों की पैदावार को लेकर चिंता बढ़ गई है। जून के अंत में करीब 40% बारिश की कमी के बाद स्थिति में कुछ सुधार हुआ, लेकिन 13 अगस्त तक देश में बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) से 12% कम रही।
सोयाबीन, मक्का, धान और अन्य खरीफ फसलें अब विकास के ऐसे महत्वपूर्ण चरण में हैं, जिनका सीधा असर अंतिम पैदावार पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगले दो सप्ताह फसलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 14 अगस्त तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में करीब 2% कम क्षेत्र में हुई। धान का रकबा 3.7%, अरहर और मक्का का 4-4%, कपास का 1% और गन्ने का रकबा 0.5% कम रहा। अब अंतिम उत्पादन काफी हद तक अगस्त और सितंबर में मिलने वाली पर्याप्त नमी पर निर्भर करेगा।
IMD ने अगस्त और सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है। 13-19 अगस्त के दौरान बारिश सामान्य के करीब रह सकती है, जबकि 20-26 अगस्त के दौरान मानसून गतिविधि कमजोर पड़ने की संभावना है। मानसून ट्रफ के उत्तर की ओर खिसकने को इसका एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
13 अगस्त तक मध्य भारत में बारिश की कमी सिर्फ 1% रही, जबकि उत्तर-पश्चिम भारत में 11%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 20% और पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत में 27% की कमी दर्ज की गई। बिहार में 39%, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और पंजाब में 31-31% बारिश की कमी रही।
विशेषज्ञों के अनुसार, कृषि के लिए केवल कुल बारिश ही नहीं, बल्कि बारिश का समय, वितरण और मिट्टी में नमी भी महत्वपूर्ण है। सोयाबीन में फूल और फलियां बनने, धान में बालियां निकलने तथा मक्का में फूल आने और दाने भरने के दौरान नमी की कमी से पैदावार प्रभावित हो सकती है। कपास को सूखे के साथ जलभराव से भी नुकसान का खतरा रहता है।
इसलिए अगस्त और सितंबर में बारिश की स्थिति खरीफ फसलों की अंतिम पैदावार तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
और पढ़ें :- दौंड में कपास का रकबा बढ़ा