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बांग्लादेश की मांग से भिलवाड़ा के सूती धागा निर्यात में तेज़ी

2026-06-04 13:23:32
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भीलवाड़ा ने बांग्लादेश को सूत निर्यात बढ़ाकर वैश्विक चुनौतियों का किया सफल मुकाबला


राजस्थान का प्रमुख वस्त्र केंद्र भीलवाड़ा वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और मध्य पूर्व में जारी तनाव के बावजूद निरंतर विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। बांग्लादेश को सूती सूत और धागे के निर्यात में हुई उल्लेखनीय वृद्धि ने स्थानीय कपड़ा उद्योग को नई मजबूती प्रदान की है। उद्योग जगत के अनुसार, इस बढ़ती मांग के कारण जिले में 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का नया निवेश हुआ है, जिससे आने वाले समय में रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होने की उम्मीद है।


वैश्विक स्तर पर युद्ध, बढ़ती परिवहन लागत और अमेरिकी टैरिफ नीतियों के कारण कई उद्योग प्रभावित हुए हैं, लेकिन भीलवाड़ा का कपड़ा क्षेत्र अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है। यहां की कताई और डेनिम इकाइयों ने आधुनिक तकनीक, स्वचालन और नवाचार को अपनाकर उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता दोनों में सुधार किया है। परिणामस्वरूप, भीलवाड़ा में निर्मित सूती धागे की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लगातार बढ़ रही है।


उद्योग सूत्रों के अनुसार, जिले में सूती धागे का उत्पादन प्रतिवर्ष 15 से 17 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जबकि डेनिम उत्पादन में 10 से 12 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की जा रही है। बांग्लादेश का रेडीमेड गारमेंट उद्योग बड़ी मात्रा में भीलवाड़ा के सूती धागे पर निर्भर हो गया है। इसके अलावा, यहां निर्मित धागे की मांग मिस्र, चीन, पुर्तगाल, श्रीलंका और मोरक्को में भी है। वहीं, डेनिम कपड़ा कई लैटिन अमेरिकी देशों के बाजारों तक पहुंच रहा है।


केंद्र सरकार द्वारा आयातित कपास पर 11 प्रतिशत शुल्क हटाने के फैसले को भी उद्योग के लिए सकारात्मक माना जा रहा है। इससे कच्चे माल की लागत कम होगी और उत्पादकों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उत्पादन करने में मदद मिलेगी।


मेवाड़ चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के मानद महासचिव आर. के. जैन के अनुसार, भीलवाड़ा जिले में 500 से अधिक बुनाई इकाइयां, 18 कताई इकाइयां, पांच डेनिम संयंत्र और 21 प्रोसेसिंग इकाइयां कार्यरत हैं। ये इकाइयां प्रतिवर्ष लगभग 120 करोड़ मीटर कपड़ा उत्पादन करती हैं और करीब 1.5 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराती हैं। बढ़ते निर्यात और नए निवेश के कारण उद्योग में विस्तार की संभावनाएं लगातार मजबूत हो रही हैं।


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