कपास उत्पादक किसानों के सामने बीटी (बैसिलस थुरिंजिएन्सिस) कपास बीजों की बढ़ती कीमतें गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा पिछले कुछ वर्षों में बोल्गार्ड-2 बीजों के दामों में लगातार बढ़ोतरी की गई है, जिससे किसानों की उत्पादन लागत में इजाफा हुआ है। दूसरी ओर, किसान अब भी इस तकनीक के अधिक उन्नत और प्रभावी संस्करण का इंतजार कर रहे हैं, जिससे असंतोष बढ़ रहा है।
देश में कपास की सबसे अधिक खेती बोल्गार्ड-2 किस्म से होती है, जबकि बोल्गार्ड-1 का उपयोग सीमित है। लेकिन बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के चलते कपास की खेती किसानों के लिए कम लाभकारी होती जा रही है। इस वर्ष उचित बाजार मूल्य न मिलने से किसानों की आर्थिक स्थिति और दबाव में आ गई है।
खेती के दौरान किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिनमें मजदूरों की कमी, उर्वरकों की बढ़ती कीमतें और बीजों की कालाबाजारी प्रमुख हैं। इन समस्याओं के बावजूद किसानों ने बुवाई की, लेकिन फसल से अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल सका।
किसान लंबे समय से पिंक बॉलवर्म जैसे कीटों के प्रति अधिक प्रभावी प्रतिरोध वाली नई कपास किस्म की मांग कर रहे हैं, लेकिन इस दिशा में अभी तक ठोस प्रगति नहीं दिखी है। इसके विपरीत, बीटी बीजों की कीमतों में लगातार वृद्धि से कपास उत्पादक क्षेत्रों में नाराज़गी बढ़ती जा रही है।
किसानों का आरोप है कि सरकार बीजों की कीमत तय तो करती है, लेकिन बाजार में उसका पालन सुनिश्चित नहीं कर पाती। कालाबाजारी और ऊंचे दामों पर बिक्री के कारण किसानों का आर्थिक शोषण जारी है।
बीज कीमतों का हाल:
2023-24: ₹853 प्रति बैग (बोल्गार्ड-2)
2024-25: ₹864 प्रति बैग
2025-26: ₹901 प्रति बैग
2025-26 (बोल्गार्ड-1): ₹635 प्रति बैग
कपास बीजों में आनुवंशिक सुधार की धीमी प्रगति भी चिंता का विषय है। एक समय में प्रमुख नकदी फसल रही कपास अब किसानों के लिए कम और बीज, कीटनाशक व शाकनाशी कंपनियों के लिए अधिक लाभदायक होती जा रही है।