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कपास की समय पर बुवाई से किसानों को होगा अधिक लाभ, वैज्ञानिकों की सलाह

कपास की खेती से किसानों को बेहतर मुनाफा, वैज्ञानिकों ने दी समय पर बुवाई की सलाहखरीफ सीजन नजदीक आने के साथ ही कपास की खेती को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। जिले में किसान अब कपास की बुवाई की ओर ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि यह फसल आर्थिक दृष्टि से लाभकारी मानी जाती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, क्षेत्र की जलवायु कपास उत्पादन के लिए अनुकूल है और सही समय पर बुवाई करने से पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह ने किसानों को सलाह दी है कि वे 25 मई के बाद कपास की बुवाई शुरू करें। उन्होंने बताया कि इस अवधि में तापमान धीरे-धीरे कम होने लगता है और मानसून की शुरुआती गतिविधियां भी शुरू हो जाती हैं, जो बीज अंकुरण और पौधों की शुरुआती वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती हैं। ऐसे समय में की गई बुवाई फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों के लिए लाभकारी साबित होती है।वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि किसानों को कपास की बुवाई जून महीने के अंत तक हर हाल में पूरी कर लेनी चाहिए। यदि बुवाई में देरी होती है, तो उसका सीधा असर फसल की वृद्धि और उत्पादन क्षमता पर पड़ता है। देर से बोई गई फसल में पौधों की बढ़वार कमजोर हो जाती है, जिससे पैदावार कम हो जाती है।हालांकि खेती की लागत लगभग समान ही रहती है, लेकिन उत्पादन घटने से किसानों का लाभ कम हो जाता है। इसलिए समय पर बुवाई को कपास की सफल खेती का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है। विशेषज्ञों ने किसानों को सही तकनीक और समय प्रबंधन अपनाकर अधिक मुनाफा कमाने की सलाह दी है, ताकि वे कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकें।और पढ़ें:- कपास आयात शुल्क हटाने से किसानों को भारी नुकसान होगा: CPI

कपास आयात शुल्क हटाने से किसानों को भारी नुकसान होगा: CPI

केंद्र का कपास पर से इंपोर्ट ड्यूटी हटाने का कदम किसानों को बुरी तरह प्रभावित करेगा: CPI को आशंकाआंध्र प्रदेश : मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से हस्तक्षेप की अपील करते हुए, CPI नेता ईश्वरैया ने कहा कि 2026 के खरीफ सीज़न के दौरान इंपोर्ट ड्यूटी और एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदियों में और ढील देने से कृषि संकट और गहरा जाएगा।CPI के प्रदेश सचिव जी. ईश्वरैया ने मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू से हस्तक्षेप करने और कपास पर लगी 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाने तथा भारत से कपास के एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदियों को हटाने वाले प्रस्तावों को वापस लेने का आग्रह किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे कदमों से कपास किसानों को भारी नुकसान होगा।बुधवार को मुख्यमंत्री को लिखे एक पत्र में, श्री ईश्वरैया ने उन रिपोर्टों का ज़िक्र किया जिनमें कहा गया था कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने केंद्रीय मंत्री किंजरापु राममोहन नायडू, सांसद लावु श्री कृष्ण देवरायालु और अन्य लोगों के साथ कपास की कीमतों को स्थिर करने के उपायों पर चर्चा की थी। रिपोर्टों के अनुसार, कपास पर लगी 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाने और एक्सपोर्ट को विनियमित करने के प्रस्ताव रखे गए थे।श्री ईश्वरैया ने कहा कि कपास व्यापारी, स्पिनिंग मिलें और कपड़ा निगम सस्ते विदेशी कपास से फ़ायदा उठा रहे हैं, जबकि घरेलू किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कीमतों में भारी गिरावट के बाद माल बिक न पाने के कारण 'कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया' को भी काफ़ी नुकसान हुआ है।प्रस्तावित उपायों को "किसान-विरोधी और कॉरपोरेट-समर्थक" बताते हुए, CPI नेता ने चेतावनी दी कि 2026 के खरीफ सीज़न के दौरान इंपोर्ट ड्यूटी और एक्सपोर्ट पर लगी पाबंदियों में और ढील देने से कृषि संकट और गहरा जाएगा, और कपास उगाने वाले किसानों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।और पढ़ें:- तमिलनाडु में कपास की कीमतें आसमान छू गईं, ₹10,761 प्रति क्विंटल तक पहुंचीं।

तमिलनाडु में कपास की कीमतें आसमान छू गईं, ₹10,761 प्रति क्विंटल तक पहुंचीं।

तमिलनाडु: कॉटन की कीमत नई ऊंचाई पर; Rs10,761 प्रति क्विंटल बिकाचेन्नई: कॉटन की कीमतें नई ऊंचाई पर पहुंच गई हैं, विल्लुपुरम में रेगुलेटेड मार्केट ऑक्शन में कॉटन Rs 10,761 प्रति क्विंटल बिका। कीमतों में तेज बढ़ोतरी से टेक्सटाइल मिलों में चिंता फैलना तय है, लेकिन इससे किसानों और व्यापारियों में उत्साह है।डेली थांथी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑक्शन के दौरान, कुड्डालोर, रानीपेट, तिरुवन्नामलाई और पेरम्बलुर जैसे कॉटन की खेती वाले हब से किसान अपनी उपज मार्केट में लाते हैं।पिछले साल का रिकॉर्ड पार कियाआमतौर पर, कॉटन Rs 9,000 से Rs 1,000 प्रति क्विंटल के बीच बिकता है। उदाहरण के लिए, अधिकारियों ने कहा कि पिछले साल मार्केट में सबसे ज्यादा कीमत Rs 9,700 थी। हालांकि, इस साल डिमांड बढ़ने से कीमत में उछाल आया है। तिरुपुर, थेनी और कई दूसरी जगहों से व्यापारी बड़ी संख्या में विल्लुपुरम मार्केट में आए हैं। इस सीज़न में डिमांड बढ़ने से व्यापारियों के बीच मुकाबला तेज़ हो गया है, जो अच्छी क्वालिटी का कॉटन खरीदने के लिए एक-दूसरे से ज़्यादा बोली लगाने की कोशिश कर रहे हैं।कीमत और बढ़ने की संभावना1 अप्रैल से शुरू हुआ कॉटन बेचने का सीज़न जून तक चलेगा। अधिकारियों ने कहा कि अगर डिमांड का मौजूदा ट्रेंड जारी रहता है और आवक कम रहती है, तो आने वाले हफ़्तों में भी कॉटन की कीमतें ज़्यादा रह सकती हैं।इस बीच, किसानों ने रिकॉर्ड तोड़ कीमतों में बढ़ोतरी पर खुशी जताई और कहा कि बेहतर रेट से उन्हें खेती का खर्च निकालने में मदद मिलेगी और इस सीज़न में बेहतर इनकम होगी।और पढ़ें :-डॉलर के मुकाबले रुपया 52 पैसे बढ़त 96.30 पर खुला.

अल नीनो की चिंताओं के बीच, समय से पहले आए मॉनसून से राहत की उम्मीदें जगीं।

जल्दी मॉनसून से राहत की उम्मीदें, लेकिन अल नीनो का खतरा भारत की बारिश पर मंडरा रहा हैभारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, भारत का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 26 मई को केरल पहुँचने की संभावना है, जो इसके सामान्य 1 जून के आगमन से लगभग छह दिन पहले है। जहाँ एक ओर जल्दी मॉनसून अक्सर गर्मियों की तेज़ गर्मी से राहत की उम्मीदें जगाता है और खेती के लिए एक अच्छा मौसम लाने का वादा करता है, वहीं विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनने की संभावना के कारण बारिश का कुल अनुमान अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।अल नीनो, जिसकी पहचान प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने से होती है, आमतौर पर भारत में ज़्यादा गर्म गर्मियों और कमज़ोर मॉनसून की बारिश से जुड़ा होता है। चूँकि देश की लगभग आधी खेती की ज़मीन सिंचाई के बजाय बारिश पर निर्भर करती है, इसलिए मॉनसून में किसी भी तरह की कमज़ोरी खेती और पानी की उपलब्धता पर काफ़ी असर डाल सकती है।IMD ने कहा कि केरल में मॉनसून के आने का समय 26 मई से चार दिन आगे या पीछे हो सकता है। मौसम विभाग ने दक्षिण बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में मॉनसून के आगे बढ़ने के लिए अनुकूल स्थितियों का भी ज़िक्र किया है, और 28 मई तक दक्षिणी पश्चिमी तट पर बड़े पैमाने पर बारिश होने की उम्मीद है।हालाँकि, मौसम विज्ञानी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जल्दी मॉनसून आने का मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि पूरे मौसम में सामान्य से ज़्यादा बारिश होगी। मौसम विशेषज्ञ बताते हैं कि मॉनसून का प्रदर्शन कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें समुद्र का तापमान, हवा का बहाव और कम दबाव वाले सिस्टम का बनना शामिल है। मॉनसून आमतौर पर अलग-अलग चरणों या "लहरों" में आगे बढ़ता है, जिसका मतलब है कि जल्दी शुरू होने के बावजूद जून, जुलाई और अगस्त में बारिश का बँटवारा असमान रह सकता है।और पढ़ें :-कभी 'सफेद सोने' से समृद्ध रहे किसान, अब 'गुलाबी आफत' से तबाह

कभी 'सफेद सोने' से समृद्ध रहे किसान, अब 'गुलाबी आफत' से तबाह

कभी सफेद सोना उगाकर हो रहे थे मालामाल, अब गुलाबी आफत ने किया बर्बाद !भारत के कुछ राज्यों में कपास की खेती बीते काफी दिनों से किसानों के लिए घाटे का सौदा बन रही है. गुलाबी सुंडी कपास की खेती को भयंकर तरीके से नुकसान पहुंचा रही है.सफेद सोना... यानी कपास. भारत के तीन राज्यों के हजारों किसान कपास की खेती कर अपनी तकदीर बदलते आए हैं. लेकिन अब यही 'सफेद सोना' उनके लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा. इस घाटे का सबब बनी है एक 'गुलाबी आफत'. ये ही गुलाबी सुंडी जिसे पिंक बॉलवर्म भी कहते हैं. इसके चलते अब तक मोटा मुनाफा कमाते आए किसानों को घाटा हो रहा. इस घाटे में 'होर्मूज संकट' भी काफी हद तक जिम्मेदार है. नतीजतन किसान अब मोटा अनाज बाजरा, मूंग की खेती कर रहे हैं. दरअसल, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के हजारों किसान अब धीरे-धीरे कपास यानी नरमा की खेती छोड़कर बाजरा और दूसरी कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. कपास की खेती में काफी खाद का भी इस्तेमाल होता है. खाद की इन दिनों किल्लत चल ही रही है. गुलाबी सुंडी' ने तोड़ी किसानों की कमरकपास किसानों की सबसे बड़ी समस्या इस समय गुलाबी सुंडी है. यह कीड़ा कपास के फल के अंदर घुसकर बीज और रुई को अंदर ही अंदर खराब कर देता है. इसका असर ये होता है कि बाजार में किसानों को कपास का सही दाम तक नहीं मिल पाता. किसानों का कहना है कि कुछ साल पहले जहां एक एकड़ से 10 से 12 क्विंटल तक कपास निकल जाती थी, वहीं अब उत्पादन आधा या उससे भी कम रह गया है. कई इलाकों में तो किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है. हरियाणा के सिरसा, हिसार, फतेहाबाद और भिवानी, पंजाब के मानसा, भटिंडा, फाजिल्का और राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जैसे इलाके लंबे समय से देश की प्रमुख कपास बेल्ट माने जाते रहे हैं. लेकिन अब इन्हीं इलाकों में किसान कपास से दूरी बना रहे हैं.महंगे स्प्रे भी बेअसरकपास की फसल को बचाने के लिए किसानों को लगातार कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पड़ता है. अमेरिकन बॉलवर्म, स्पॉटेड बॉलवर्म, थ्रिप्स और अन्य कीड़ों से बचाव के लिए महंगे केमिकल्स का बार-बार छिड़काव करना पड़ता है. किसानों के मुताबिक एक सीजन में 5 से 10 बार तक स्प्रे करना पड़ता है. इसके बावजूद गुलाबी सुंडी खत्म नहीं होती. ज्यादा खाद और कीटनाशक ने खेती की लागत तो बढ़ा दी, लेकिन मुनाफा घटता जा रहा. मजदूरों की कमी ने बढ़ाई परेशानीखेत से कपास को चुनना बहुत मेहनत वाला काम माना जाता है. इस काम के लिए अच्छी खासी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती है, लेकिन गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन के कारण खेतों में मजदूरों की भारी कमी हो गई है. जो मजदूर मिल रहे हैं, वे भी कपास चुनने के लिए 12 से 25 रुपये प्रति किलो तक मजदूरी मांग रहे हैं. इससे खेती की लागत बढ़ गई है. किसान बताते हैं कि कपास बेचकर जो आमदनी होती है, उसका बड़ा हिस्सा मजदूरी और दवाइयों में ही निकल जाता है.खाद और केमिकल का बढ़ता बोझकपास की खेती को सबसे महंगी फसलों में गिना जाता है इसमें भारी मात्रा में खाद और रासायनिक दवाइयों की जरूरत होती है. एक एकड़ खेत में ही कई बोरी डीएपी, यूरिया, एसएसपी और पोटाश डालनी पड़ती है. इसके अलावा अलग-अलग कीड़ों से बचाने के लिए महंगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पड़ता है. किसानों का कहना है कि हर साल खाद और दवाइयों के दाम तो बढ़ रहे हैं, लेकिन उत्पादन और मुनाफा घटता जा रहा है. ऐसे में कपास की खेती अब पहले जैसी फायदेमंद नहीं रही.क्यों बढ़ रहा है बाजरे की ओर रुझान?कपास से निराश किसान अब बाजरा जैसी फसलों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह कम लागत और कम जोखिम है. बाजरे की खेती में कम खाद लगती है. बहुत कम कीटनाशक की जरूरत होती है. पानी की खपत भी कम होती है. इसके साथ ही ये फसल जल्दी तैयार हो जाती है. जहां कपास की फसल को तैयार होने में लगभग छह महीने लगते हैं, वहीं बाजरा 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाता है. इन कारणों के चलते कपास के मुकाबले बाजरा किसानों को ज्यादा स्थिर और सुरक्षित विकल्प दे रहा है.एक साल में तीन फसलें लेने का मौकाबाजरे की खेती करने वाले किसानों को साल के बचे समय में दो और खेती करने का मौका मिलता है. खरीफ में बाजरा बोने के बाद रबी में सरसों और फिर जायद सीजन में मूंग जैसी फसल बहुत आसानी से उगाई जा सकती है.MSP पर खरीद सबसे बड़ी मांगगुलाबी सुंडी, महंगी खाद और महंगी मजदूरी के बाद किसान जब मंडी में कपास बेचने जाता है तो वहां भी उसे MSP के मुताबिक दाम नहीं मिलता. अक्सर उन्हें एमएसपी से भी कम कीमत मिलती है. साल 2025 में बाजरे का MSP 2775 रुपये प्रति क्विंटल था, लेकिन कई किसानों को बाजार में 2100 रुपये प्रति क्विंटल तक ही कीमत मिली. इस साल MSP बढ़ाकर 2900 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है, लेकिन किसानों को डर है कि अगर सरकारी खरीद नहीं हुई तो उन्हें फिर नुकसान उठाना पड़ सकता है.खाद संकट ने बढ़ाई चिंताइस साल अंतरराष्ट्रीय हालात ने भी किसानों की चिंता बढ़ा दी है. पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर के कारण खाद संकट की आशंका जताई जा रही है. भारत बड़े पैमाने पर खाद और उसके कच्चे माल के लिए इम्पोर्ट पर निर्भर है. अगर खाद महंगी हुई या समय पर उपलब्ध नहीं हुई तो धान, मक्का और गन्ने जैसी ज्यादा खाद मांगने वाली फसलों पर बड़ा असर पड़ सकता है.क्या मिलेट्स ही भविष्य हैं?संयुक्त राष्ट्र पहले ही 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स घोषित कर चुका है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा मिलेट उत्पादक देश है. बदलते मौसम, पानी की कमी और बढ़ती लागत के बीच अब बाजरा जैसे मोटे अनाज किसानों के लिए ज्यादा फायदे वाले विकल्प बनते दिख रहे हैं.और पढ़ें :-आंध्र प्रदेश ने केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के समक्ष कपास से जुड़ी चिंताएं उठाईं।

आंध्र प्रदेश ने केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के समक्ष कपास से जुड़ी चिंताएं उठाईं।

आंध्र प्रदेश ने केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के सामने कॉटन के मुद्दे उठाए।विजयवाड़ा : नरसारावपेट के MP और लोकसभा में TDP के फ्लोर लीडर लवू श्री कृष्ण देवरायालू, सिविल एविएशन मिनिस्टर के राम मोहन नायडू के साथ, नई दिल्ली में केंद्रीय कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल से मिले और आंध्र प्रदेश के एग्रीकल्चर, एक्सपोर्ट और इंडस्ट्रियल सेक्टर से जुड़े कई खास मुद्दों पर चर्चा की।मीटिंग के दौरान, AP टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन के रिप्रेजेंटेटिव डेलीगेशन के साथ थे और उन्होंने कॉटन की बढ़ती कीमतों और घरेलू मार्केट में अच्छी क्वालिटी वाले कॉटन की कमी के कारण टेक्सटाइल और स्पिनिंग इंडस्ट्री के सामने आ रही गंभीर चुनौतियों पर रोशनी डाली।जिन खास बातों पर चर्चा हुई, उनमें कॉटन पर मौजूदा 11% इंपोर्ट ड्यूटी को कुछ समय के लिए हटाना, घरेलू उपलब्धता और कीमत में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए 31 अक्टूबर, 2026 तक कॉटन एक्सपोर्ट पर कुछ समय के लिए रोक लगाना, और ट्रेडर्स के बजाय मैन्युफैक्चरर्स को कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) के स्टॉक की सप्लाई को प्राथमिकता देना शामिल था।कृष्णा देवरायालु ने ज़ोर देकर कहा कि AP भारत के टेक्सटाइल, सीफूड और तंबाकू सेक्टर में एक बड़ी भूमिका निभाता है, और एक्सपोर्ट, MSMEs और किसानों को बचाने के लिए समय पर पॉलिसी सपोर्ट ज़रूरी है।और पढ़ें :-कपड़ा उद्योग कपास की बढ़ती कीमतों की भरपाई के लिए उपायों की मांग कर रहा है। 

कपड़ा उद्योग कपास की बढ़ती कीमतों की भरपाई के लिए उपायों की मांग कर रहा है।

टेक्सटाइल कंपनियों ने कॉटन की कीमतों में तेज़ी से निपटने के लिए राहत मांगी है।चेन्नई: टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने पिछले दो महीनों में कॉटन की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी पर चिंता जताई है और घरेलू सप्लाई में कमी, साथ ही कच्चे माल और लॉजिस्टिक्स की बढ़ी हुई लागत, पिछले साल US टैरिफ से बुरी तरह प्रभावित इंडस्ट्री पर बुरा असर डाल सकती है।वर्धमान टेक्सटाइल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर नीरज जैन ने कंपनी की लेटेस्ट अर्निंग्स कॉल के दौरान घरेलू सप्लाई को लेकर चिंता जताई और अगस्त से कॉटन की कमी का खतरा बताया। साथ ही, एनालिस्ट कॉल के दौरान, अरविंद लिमिटेड के मैनेजमेंट ने कहा कि ज़्यादा इनपुट कॉस्ट, खासकर कॉटन की कीमतों से, साल के पहले छह महीनों में मार्जिन पर दबाव डाल सकती है, और इसने महंगाई के माहौल को मैनेज करने के लिए लंबे समय की कीमतों को पहले से ही लॉक कर लिया है और कच्चे माल का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित कर लिया है। अलग-अलग साइज़ की एक्सपोर्ट करने वाली यूनिट्स और इंडस्ट्री कंपनियों ने मांग की है कि केंद्र सरकार कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी और कमज़ोर रुपये के बीच कम से कम दिसंबर तक 11% कॉटन ड्यूटी से छूट दे। मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का कहना है कि कीमतों में बढ़ोतरी से लागत बढ़ जाती है और वे दूसरे मुख्य हब के मुकाबले कम कॉम्पिटिटिव हो जाती हैं।"बांग्लादेश और वियतनाम जैसे कई मुकाबले वाले एशियाई देशों को ज़ीरो ड्यूटी एक्सेस है। घरेलू सप्लाई में लगातार कमी और ज़्यादा कीमतें भारतीय टेक्सटाइल बनाने वालों और एक्सपोर्ट करने वालों को ज़्यादा इनपुट कॉस्ट से जूझना पड़ रहा है, खासकर ऐसे समय में जब खास मार्केट से ऑर्डर बढ़ रहे हैं।अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के वाइस चेयरमैन डॉ. ए. शक्तिवेल ने कहा, "कुछ यूनिट्स पक्के तौर पर ऑर्डर नहीं ले सकतीं।" उन्होंने आगे कहा कि इससे भारतीय यूनिट्स की फ्लेक्सिबिलिटी पर बहुत बुरा असर पड़ता है और प्राइस-सेंसिटिव मार्केट और सेगमेंट में उनका मार्केट शेयर कम होता है।कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि घरेलू कॉटन का प्रोडक्शन 328 लाख बेल की खपत मांग के मुकाबले घटकर 291 लाख बेल रहने का अनुमान है, जिससे 37 लाख बेल की कमी होगी। तमिलनाडु स्पिनिंग मिल्स एसोसिएशन के डॉ. के. वेंकटचलम ने कहा कि सप्लाई की कमी हेडलाइन आंकड़ों से कहीं ज़्यादा गंभीर है और उन्होंने व्यापारियों पर जमाखोरी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इम्पोर्ट होने में 45 दिन लगेंगे, और सरकार को कॉटन की बहुत ज़्यादा कमी होने से पहले समय पर इम्पोर्ट करने की कोशिश करनी चाहिए।टेक्सप्रोसिल के डेटा के अनुसार, अप्रैल 2026 में कपड़ों के एक्सपोर्ट में सालाना आधार पर 11.66% की गिरावट आई, जबकि टेक्सटाइल और कपड़ों के कुल एक्सपोर्ट में 3.42% की गिरावट आई।और पढ़ें :-डॉलर के मुकाबले रुपया 33 पैसे गिरकर 96.86 पर खुला.

महाराष्ट्र: पुसद में 75 हजार हेक्टेयर में खरीफ बुवाई की तैयारी

महाराष्ट्र: पुसद तालुका में 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ खेती की तैयारीखरीफ मौसम के नजदीक आते ही कृषि विभाग ने यवतमाल जिले के पुसद तालुका के लिए वर्ष 2026–27 की खरीफ फसल योजना तैयार कर ली है। विभाग के अनुमान के अनुसार इस वर्ष तालुका में लगभग 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई होने की संभावना है। इस बार कपास के रकबे में बढ़ोतरी और सोयाबीन के क्षेत्र में हल्की कमी का अनुमान जताया गया है।योजना के अनुसार सबसे अधिक 31,890 हेक्टेयर में कपास की खेती प्रस्तावित है। इसके बाद लगभग 28,910 हेक्टेयर में सोयाबीन की बुवाई का अनुमान है। अन्य फसलों में 8,110 हेक्टेयर में अरहर, 1,890 हेक्टेयर में हल्दी, 610 हेक्टेयर में खरीफ ज्वार, 445 हेक्टेयर में मूंग और 350 हेक्टेयर में उड़द की खेती प्रस्तावित है।तालुका में कुल 39,768 पंजीकृत किसान खाताधारक हैं, जिनमें 16,229 सीमांत किसान, 9,690 छोटे किसान और 13,839 बड़े भूधारक किसान शामिल हैं।कृषि विभाग के अनुसार इस खरीफ सीजन में कपास के लगभग 1,59,450 बीज पैकेटों की आवश्यकता होगी, जबकि सोयाबीन बीज की मांग 8,673 क्विंटल आंकी गई है। हालांकि किसानों के पास पहले से ही लगभग 28,210 क्विंटल सोयाबीन बीज उपलब्ध बताया गया है।उर्वरक की कुल आवश्यकता 22,863 मीट्रिक टन अनुमानित की गई है, जिसमें 9,509 टन मिश्रित उर्वरक, 5,802 टन यूरिया, 2,304 टन डीएपी और 4,266 टन एसएसपी शामिल हैं।कृषि विभाग के अमोल अघाव ने किसानों को सलाह दी है कि वे बिना बीज उपचार के बुवाई न करें, क्योंकि हाल के वर्षों में मिट्टी जनित फफूंद रोगों का प्रकोप बढ़ा है। साथ ही उन्होंने यह भी अपील की है कि किसान कम से कम 100 मिमी वर्षा होने के बाद ही बुवाई करें और जल्दबाजी से बचें।और पढ़ें:- निमाड़ में कपास बुवाई की तैयारी तेज, 20 मई के बाद रफ्तार पकड़ने की उम्मीद

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