हरियाणा में कपास पर गुलाबी सुंडी का खतरा, सिरसा में 40–50% हरे टिंडे प्रभावित होने की रिपोर्ट

By yash chouhan 2026-10-27 11:47:21
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हरियाणा के हिसार-सिरसा में कपास पर गुलाबी सुंडी का खतरा, सिरसा में 40–50% हरे डोडे प्रभावित होने का दावा

सिरसा, हरियाणा, 27 अक्टूबर 2026: हरियाणा के हिसार और सिरसा जिलों में कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी और अन्य कीटों की स्थिति को लेकर चिंता जताई गई है। 27 अक्टूबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (CICR), नागपुर की 15 से 21 अक्टूबर की साप्ताहिक एडवाइजरी में सिरसा में लगभग 40–50% हरे डोडों के प्रभावित होने का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इस आंकड़े की मूल आधिकारिक एडवाइजरी से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

गुलाबी सुंडी डोडों के भीतर प्रवेश कर कपास के बीज और रेशे को नुकसान पहुंचाती है। इससे उपज और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। ICAR-CICR के मार्गदर्शन के अनुसार, डोडे बनने की अवस्था में अलग-अलग पौधों से 20 हरे डोडे लेकर उनकी नियमित जाँच करनी चाहिए। कीट नियंत्रण का निर्णय संबंधित आधिकारिक सलाह, फसल की अवस्था और खेत में दर्ज प्रकोप के आधार पर लेना चाहिए।

राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी निगरानी

रिपोर्ट में राजस्थान के श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ और बांसवाड़ा क्षेत्रों में भी कीटों की निगरानी का उल्लेख है। बांसवाड़ा में सफेद मक्खी, जैसिड और थ्रिप्स जैसे रस चूसने वाले कीटों की समस्या बताई गई है। मध्य प्रदेश के खंडवा क्षेत्र में निगरानी के दौरान गुलाबी सुंडी की सूचना नहीं मिलने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। इन क्षेत्रवार विवरणों की मूल एडवाइजरी से पुष्टि की जानी चाहिए।

किसानों के लिए जरूरी सावधानियाँ

किसानों को खेतों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए और गुलाबी सुंडी की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करना चाहिए। हरे डोडों की जाँच से कीट के प्रकोप का समय पर पता लगाने में मदद मिल सकती है। नियंत्रण उपाय अपनाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।

कीटनाशकों का उपयोग केवल कपास और संबंधित कीट के लिए स्वीकृत उत्पाद के लेबल निर्देशों के अनुसार करें। दवा की मात्रा, दोबारा छिड़काव का अंतराल और कटाई से पहले की प्रतीक्षा अवधि की पुष्टि किए बिना रासायनिक उपचार न करें। पुराने कपास के ठूंठ और गिरे हुए संक्रमित डोडों को हटाने तथा स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेने से भी मदद मिल सकती है।

समय पर निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन से फसल को होने वाले नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

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