छोटा लेकिन ताकतवर: ऑस्ट्रेलियाई कॉटन कैसे हासिल कर रहा है नए ‘गोल’
ऑस्ट्रेलिया भले ही दुनिया के कुल कॉटन उत्पादन का एक छोटा हिस्सा पैदा करता हो, लेकिन गुणवत्ता के मामले में उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा बेहद मजबूत है।
ऐसे मौसम में, जहां खेती के लिए इनोवेशन और रणनीतिक सोच जरूरी है, ऑस्ट्रेलिया दुनिया के बेहतरीन कॉटन का उत्पादन करता है। बेहतर किस्मों, अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियों, किसानों की विशेषज्ञता और ऑस्ट्रेलियाई कॉटन की मजबूत मांग ने इसकी सफलता में अहम भूमिका निभाई है।
न्यूट्रियन के ग्राहक और गुनेडा के कॉटन किसान जेम्स बार्लो पिछले 10 वर्षों से कॉटन उगा रहे हैं। उनके अनुसार, कॉटन उनकी सिंचाई व्यवस्था में अच्छी तरह फिट बैठता है। इसका रिटर्न मार्जिन अच्छा है और फसल से मिलने वाला खरपतवार नियंत्रण भी उपयोगी है। डबल क्रॉपिंग के कारण वे एक ही साल में कॉटन के साथ सर्दियों की फसल भी उगा सकते हैं।
2026 में गर्म और शुष्क शरद ऋतु ने कॉटन की पिकिंग के लिए लगभग आदर्श परिस्थितियां तैयार कीं। ऑस्ट्रेलियन कॉटन शिपर्स एसोसिएशन के अनुसार, औसत पैदावार लगभग 12-14 गांठ प्रति हेक्टेयर रही और सभी क्षेत्रों में गुणवत्ता मजबूत बनी हुई है। फाइबर की लंबाई और मजबूती भी अच्छी रही।
ऑस्ट्रेलियाई कॉटन की पहचान केवल गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। उद्योग लंबे समय से सस्टेनेबिलिटी और पानी के बेहतर इस्तेमाल पर काम कर रहा है। 1991 में यह ऑस्ट्रेलियाई कृषि का पहला ऐसा सेक्टर बना, जिसने अपने पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र आकलन कराया।
आज हर कॉटन गांठ के साथ एक यूनिक बारकोड होता है, जिससे उसकी उत्पत्ति और उत्पादन क्षेत्र की ट्रेसेबिलिटी संभव है।
वैश्विक सप्लाई में संभावित कमी, सिंथेटिक फाइबर की बढ़ती कीमतों और टिकाऊ उत्पादों की बढ़ती मांग से ऑस्ट्रेलियाई कॉटन के लिए नए अवसर बन रहे हैं।
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