₹1718 करोड़ की MSP मदद: कपास किसानों और टेक्सटाइल उद्योग को बड़ा सहारा : अतुल गणात्रा
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष अतुल गणात्रा ने CNBC आवाज़ को दिए एक विशेष इंटरव्यू में सरकार की 1718.56 करोड़ की फंडिंग और कॉटन सेक्टर की स्थिति पर विस्तार से बात की।
सरकार ने 1718.56 करोड़ रुपये की MSP फंडिंग को मंजूरी दी है। यह फंड वर्ष 2023-24 में कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) को MSP खरीद के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए जारी किया गया है। हालांकि, सरकार इसे नुकसान के रूप में नहीं देखती, बल्कि किसानों को दी गई सहायता या सब्सिडी के रूप में मानती है।
भारत में लगभग 60 लाख किसान कपास की खेती करते हैं और अधिकांश किसानों को MSP का सीधा लाभ मिलता है। MSP व्यवस्था से न केवल किसानों को फायदा होता है, बल्कि CCI द्वारा कम कीमत पर कपास उपलब्ध कराने से टेक्सटाइल उद्योग को भी लाभ मिलता है।
CCI के पास पर्याप्त स्टॉक होने से उद्योग को सुरक्षा मिलती है। इस वर्ष CCI ने लगभग 1.05 करोड़ गांठ कपास MSP पर खरीदी है, जिससे टेक्सटाइल उद्योग को स्थिरता मिली है। कुल आवक में से करीब 1.05 करोड़ गांठ की खरीद के कारण किसानों को पूरे सीजन में MSP के आसपास 8100 रुपये का भाव मिला, जबकि महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में कीमतें MSP से ऊपर 8500-8600 रुपये तक भी पहुंचीं।
MSP खरीद से बाजार में स्थिरता बनी रहती है, जिससे किसानों को लाभ होता है। वहीं, जब CCI कम कीमत पर कपास बेचती है तो उद्योग को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता है, जिससे निर्यात और उत्पादन गतिविधियां बेहतर होती हैं। यह एक सकारात्मक कदम है और सरकार को इसे जारी रखना चाहिए। इसका एक और असर यह दिख रहा है कि किसानों में संतोष बढ़ा है, जिससे अगले साल 15-20% अधिक कपास बुवाई होने की संभावना है।
वर्तमान में मांग मजबूत बनी हुई है। स्पिनिंग मिल्स को यार्न पर 20-25 रुपये प्रति किलो का अच्छा मार्जिन मिल रहा है। चीन से भी अच्छी मात्रा में यार्न की मांग आ रही है, और अप्रैल-मई के लिए अग्रिम ऑर्डर पहले ही बुक हो चुके हैं। इससे मिल्स की स्थिति फिलहाल लाभकारी बनी हुई है।
स्टॉक की बात करें तो देश में पर्याप्त उपलब्धता है। CCI के पास लगभग 1 करोड़ गांठ कपास का स्टॉक है, जबकि जिनर्स और स्पिनिंग मिल्स के पास भी करीब 3 महीने का स्टॉक मौजूद है। एक तरफ कपास की कीमतें अपेक्षाकृत कम हैं और दूसरी ओर यार्न की कीमतें ऊंची हैं, जो स्पिनिंग मिल्स के लिए अनुकूल स्थिति बनाती हैं। साथ ही, मिल्स लगातार कपास की खरीद कर रही हैं।
सुझाव:
CCI को होने वाला यह नुकसान अंततः करदाताओं के पैसे से पूरा किया जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस कपास को प्राथमिकता से भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए सुरक्षित रखा जाए, न कि अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों को बेचा जाए। यदि यह संसाधन घरेलू उद्योग में उपयोग होगा, तो इससे किसानों और उद्योग दोनों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।