ICAC: भारत और चीन बनेंगे ग्लोबल कॉटन ट्रेड के प्रमुख ग्रोथ ड्राइवर
इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) के अनुसार, 2026/27 सीज़न में भारत और चीन की मजबूत आयात मांग वैश्विक कॉटन व्यापार को नई गति दे सकती है। दोनों देशों की बढ़ती खरीदारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में व्यापारिक गतिविधियों को मजबूती देने वाली प्रमुख ताकत के रूप में उभर रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत वैश्विक कॉटन मांग को बढ़ाने वाले सबसे अहम देशों में शामिल हो गया है। 2025/26 सीज़न में देश का कॉटन लिंट आयात लगभग 10 लाख टन (1 मिलियन टन) रहने का अनुमान है, जो पिछले सीज़न की तुलना में 42% अधिक है। यह भारत के इतिहास का अब तक का सबसे ऊंचा आयात स्तर होगा।
इस बढ़ोतरी के पीछे आयात शुल्क में अस्थायी कटौती और एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल (ELS) कॉटन पर दी गई छूट जैसे नीतिगत कदमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन उपायों से आयातित फाइबर की उपलब्धता बढ़ी है और घरेलू स्पिनिंग तथा टेक्सटाइल उद्योग की मांग को समर्थन मिला है।
चीन के कॉटन आयात में भी उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद जताई गई है। पिछले सीज़न में आयात आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर रहने के बाद, 2025/26 में चीन के कॉटन लिंट आयात में करीब 42% की वृद्धि का अनुमान है।
ICAC का अनुमान है कि 2026/27 सीज़न में चीन एक बार फिर दुनिया का सबसे बड़ा कॉटन आयातक बन जाएगा और वैश्विक कॉटन आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 19% होगी। अतिरिक्त आयात कोटा, घरेलू बाजार में मजबूत कीमतें और कपड़ा मिलों की निरंतर मांग इस बढ़ोतरी के प्रमुख कारण बताए गए हैं।
चीन के प्रमुख सप्लायरों में ब्राज़ील सबसे आगे है। वर्तमान में चीन के कुल कॉटन आयात में ब्राज़ील की हिस्सेदारी करीब 52% है, जिससे वह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कॉटन ट्रेड कॉरिडोर का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया चीन के दूसरे सबसे बड़े सप्लायर के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों में जारी बदलाव वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कॉटन व्यापार के प्रवाह को प्रभावित कर रहे हैं।
उत्पादन और खपत के मोर्चे पर, 2025/26 सीज़न में वैश्विक कॉटन उत्पादन 26.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3% अधिक है। वहीं, वैश्विक खपत 25.3 मिलियन टन रहने की संभावना है, जो साल-दर-साल 1.6% की वृद्धि दर्शाती है।
2026/27 सीज़न में वैश्विक कॉटन उत्पादन 2% घटकर 25.9 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि खपत लगभग 1% बढ़कर 25.5 मिलियन टन तक पहुंच सकती है। ICAC का मानना है कि मजबूत मांग के चलते भारत और चीन आने वाले वर्षों में वैश्विक कॉटन व्यापार की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।