उत्तरी महाराष्ट्र में कपास पर ‘लालिया’ का संकट, उत्पादन घटने की आशंका से किसान चिंतित
जलगांव: उत्तरी महाराष्ट्र में इस वर्ष कपास किसानों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। देरी से हुई बारिश और उसके बाद हुई भारी बारिश के कारण राज्य में कपास की खेती का रकबा औसत से करीब 4.5 लाख हेक्टेयर कम हुआ है। जलगांव जिले में भी कपास का रकबा लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर घटा है। जुलाई के अंत में हुई भारी बारिश से करीब 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की फसल प्रभावित हुई थी। अब बची हुई फसल पर बारिश की कमी और रोग-कीटों के बढ़ते प्रकोप ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
वर्तमान में कपास की फसल पत्ती निकलने से लेकर फली बनने की अवस्था में है। पानी की कमी और मौसम में उतार-चढ़ाव के कारण पत्ती धब्बा, अचानक पौधों का सूखना, दहिया, करपा और रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका है। यदि मौसम की स्थिति प्रतिकूल बनी रही, तो इसका असर कपास उत्पादन पर पड़ सकता है।
‘लालिया’ बीमारी नहीं, बल्कि विकार
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कपास में दिखाई देने वाला ‘लालिया’ कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक शारीरिक विकार है। इसमें पत्तियों के किनारे या पूरी पत्ती लाल, बैंगनी अथवा गहरे लाल रंग की हो जाती है। साथ ही पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं और पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक पानी की कमी के बाद अचानक पानी मिलना, तापमान में बदलाव, रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप तथा मिट्टी में नाइट्रोजन और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों की कमी इस समस्या को बढ़ा सकती है।
जलगांव स्थित कपास अनुसंधान केंद्र ने किसानों को संतुलित पोषण और उचित जल प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। लालपन दिखाई देने पर तुरंत फफूंदनाशक का छिड़काव करने के बजाय पहले मिट्टी की नमी, जड़ों, पोषक तत्वों और कीटों की स्थिति की जांच करना जरूरी है। समय पर उचित प्रबंधन से फसल को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
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