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कमजोर रुपये से टेक्सटाइल निर्यातकों को राहत, चुनौतियां बरकरार

2026-06-18 15:30:07
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FY26 में रुपये की कमजोरी से टेक्सटाइल निर्यातकों को राहत, लेकिन चुनौतियां बरकरार


अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में पिछले एक दशक के दौरान करीब 46% की गिरावट दर्ज की गई है। आमतौर पर कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए लाभकारी माना जाता है क्योंकि इससे भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं। हालांकि, इस अवधि में भारत के टेक्सटाइल और परिधान (गारमेंट) निर्यात में केवल सीमित बढ़ोतरी हुई है, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा, कमजोर मांग और बाजार की अनिश्चितताओं को उजागर करती है।


वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 में जब रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 65 रुपये पर था, तब भारत का टेक्सटाइल और परिधान निर्यात करीब 29.47 अरब डॉलर था। इसके बाद रुपये में लगातार कमजोरी आई और 31 मार्च 2026 को यह 94.83 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। इसके बावजूद, वित्त वर्ष 2025-26 में टेक्सटाइल और परिधान निर्यात घटकर 35.80 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले वित्त वर्ष के 36.61 अरब डॉलर की तुलना में 2% कम है।


विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की कमजोरी का लाभ निर्यातकों को मिला, लेकिन यह वैश्विक मांग में सुस्ती और प्रतिस्पर्धी देशों की बढ़ती मौजूदगी की भरपाई नहीं कर सका। खासकर परिधान निर्यात पिछले कुछ वर्षों से दबाव में बना हुआ है। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि निर्यात मूल्य में मामूली बढ़ोतरी के बावजूद निर्यात मात्रा (वॉल्यूम) के स्तर पर गिरावट आई है। कुछ अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 और 2025-26 के बीच शिपमेंट में लगभग एक-तिहाई तक कमी आई हो सकती है।


कॉटन टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के कार्यकारी निदेशक सिद्धार्थ राजगोपाल ने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका से ऑर्डर घटने के बावजूद चीन, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे बाजारों से मांग में सुधार हुआ, जिससे निर्यात को कुछ सहारा मिला। वहीं, पावरलूम डेवलपमेंट एंड एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन के. शक्तिवेल ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष में अफ्रीकी देशों को निर्यात में कुछ समय के लिए तेजी आई, लेकिन कुल मिलाकर यह उद्योग के लिए बेहद अनिश्चित दौर रहा।


उद्योग का मानना है कि आने वाले वर्षों में निर्यात वृद्धि केवल रुपये की कमजोरी पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, नए बाजारों में पहुंच बनाने और वैश्विक मांग में सुधार पर भी निर्भर करेगी।


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