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भारत में कपास उत्पादन में गिरावट, टेक्सटाइल उद्योग के हित में सरकार ने उठाए कदम

कपास उत्पादन में गिरावट का रुझान, सरकार ने उद्योग हित में उठाए कई कदमभारत में कपास उत्पादन में हाल के वर्षों में गिरावट का रुझान देखा गया है, जिसका मुख्य कारण कुछ किसानों द्वारा अधिक लाभ देने वाली अन्य फसलों की खेती अपनाना है।कपास सीज़न 2020-21 से 2025-26 के दौरान देश में कपास का घरेलू उत्पादन 352.48 लाख गांठों से घटकर 2025-26 में 290.91 लाख गांठ (अनंतिम) रह गया है। उत्पादन में इस बदलाव का प्रमुख कारण कपास की खेती के क्षेत्रफल में परिवर्तन है, क्योंकि कुछ किसानों ने अधिक लाभ देने वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाया है। हालांकि, इस अवधि के दौरान कपास की उत्पादकता लगभग स्थिर रही और यह 428-451 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के दायरे में बनी रही।कपास की कीमतों पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों का प्रभाव रहा है। हाल के समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास की कीमतों में लगभग 19 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि घरेलू बाजार में S-6 किस्म के कपास की कीमतों में लगभग 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। घरेलू स्तर पर कपड़ा उद्योग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यकता के अनुसार कच्चे कपास और सूती धागे का आयात किया जाता है।आयात सहित देश में कपास की कुल उपलब्धता घरेलू कपड़ा उद्योग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। अनुमानित उत्पादन, कैरी-ओवर स्टॉक और आयात मिलकर अनुमानित खपत की जरूरतों को पूरा करते हैं। कपास की उपलब्धता और बाजार स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जाती है ताकि आवश्यकतानुसार समय पर कदम उठाए जा सकें।कपड़ा उद्योग को समर्थन देने के लिए सरकार ने कई उपाय किए हैं। इनमें प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कच्चे कपास की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 01.06.2026 से 31.10.2026 तक कपास के आयात पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क से छूट देना शामिल है। इसके अतिरिक्त, कपड़ा उद्योग के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले कपास की उपलब्धता आसान बनाने के उद्देश्य से 20.02.2024 से प्रभावी एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास (ITC HS कोड 52010025) पर आयात शुल्क छूट जारी रखी गई है।इसके अलावा, सरकार ने कपास की उत्पादकता बढ़ाने और गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से 5,659.22 करोड़ रुपये के बजट के साथ वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पाँच वर्षीय कपास उत्पादकता मिशन (कपास क्रांति) को मंजूरी दी है।और पढ़ें :- FY27 में कॉटन यार्न उद्योग की मजबूत रिकवरी की उम्मीद, राजस्व 9-11% बढ़ने का अनुमान

FY27 में कॉटन यार्न उद्योग की मजबूत रिकवरी की उम्मीद, राजस्व 9-11% बढ़ने का अनुमान

कॉटन यार्न इंडस्ट्री में FY27 में मजबूत रिकवरी की उम्मीद, रेवेन्यू 9-11% बढ़ने का अनुमानभारत की कॉटन यार्न इंडस्ट्री में वित्त वर्ष 2027 में मजबूत रिकवरी की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2026 में लगभग स्थिर रहने के बाद इंडस्ट्री का रेवेन्यू 9-11% बढ़ने का अनुमान है। इस वृद्धि को 6-8% बेहतर यार्न रियलाइजेशन और 2-4% वॉल्यूम ग्रोथ से समर्थन मिलेगा। एक्सपोर्ट में सुधार और रेडीमेड गारमेंट्स व होम टेक्सटाइल्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड डाउनस्ट्रीम सेगमेंट्स में मांग बढ़ने से इंडस्ट्री को मजबूती मिलने की संभावना है।क्रिसिल रेटिंग्स के अनुसार, रेवेन्यू में सुधार के साथ कॉटन यार्न निर्माताओं की लाभप्रदता में भी सुधार होने की उम्मीद है। ऑपरेटिंग मार्जिन में 150-250 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी का अनुमान है, जिसे बेहतर कॉटन-यार्न स्प्रेड्स का समर्थन मिलेगा। क्रिसिल रेटिंग्स के पोर्टफोलियो में शामिल करीब 70 कॉटन स्पिनिंग कंपनियों के विश्लेषण से पता चलता है कि बेहतर कमाई से कैश फ्लो मजबूत होगा और कंपनियों की क्रेडिट प्रोफाइल में सुधार आएगा।क्रिसिल रेटिंग्स लिमिटेड के डायरेक्टर अंकुश त्यागी ने कहा कि वित्त वर्ष 2027 में एक्सपोर्ट कॉटन यार्न निर्माताओं के लिए ग्रोथ का प्रमुख आधार रहेगा। एक्सपोर्ट रेवेन्यू में 12-14% की वृद्धि का अनुमान है, जिससे इंडस्ट्री के कुल रेवेन्यू में एक्सपोर्ट की हिस्सेदारी बढ़कर 30-31% हो सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह करीब 28% थी।चीन और बांग्लादेश जैसे प्रमुख बाजारों से बढ़ती मांग एक्सपोर्ट ग्रोथ को समर्थन दे सकती है। चीन में घरेलू कॉटन उत्पादन क्षेत्र में कमी से आयात की जरूरत बढ़ने की संभावना है। वहीं, बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता में सुधार से वहां की रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री में रिकवरी आने की उम्मीद है।घरेलू बाजार, जो इंडस्ट्री के कुल रेवेन्यू का करीब 70% हिस्सा है, में भी वित्त वर्ष 2027 में 7-9% की वृद्धि का अनुमान है। US टैरिफ व्यवस्था में सामान्यीकरण और एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड डाउनस्ट्रीम सेगमेंट्स में बेहतर ऑफटेक से घरेलू मांग को समर्थन मिल सकता है।कॉटन की कीमतों में 10-15% की बढ़ोतरी के बावजूद, मजबूत मांग के चलते कॉटन-यार्न स्प्रेड वित्त वर्ष 2027 में ₹108-110 प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकता है। इससे ऑपरेटिंग मार्जिन 11-12% तक मजबूत होने की उम्मीद है।क्रिसिल रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर प्रणव शांडिल के अनुसार, बेहतर ऑपरेटिंग प्रॉफिट से कैश संचय मजबूत होगा, जिससे कंपनियों को नियमित कैपेक्स और बैलेंस शीट को मजबूत करने में मदद मिलेगी। गियरिंग लगभग 0.55-0.60 गुना और इंटरेस्ट कवरेज 4.25-4.50 गुना रहने का अनुमान है।हालांकि, एल नीनो के कारण कॉटन उत्पादन पर संभावित असर, घरेलू और वैश्विक कॉटन कीमतों में बड़ा अंतर और भविष्य में किसी भी टैरिफ बदलाव जैसे जोखिमों पर नजर रखनी होगी।और पढ़ें :- कमजोर मानसून से कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के किसानों पर संकट, फसल नुकसान से पलायन बढ़ा

कमजोर मानसून से कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के किसानों पर संकट, फसल नुकसान से पलायन बढ़ा

कमजोर मॉनसून से कर्नाटक-आंध्र  प्रदेश में किसान संकटकलबुर्गी/जोगुलम्बा गडवाल: कमजोर मॉनसून और बारिश की कमी ने कर्नाटक के कल्याण कर्नाटक क्षेत्र तथा आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बारिश नहीं होने से सोयाबीन, दालें, कपास और अन्य वर्षा आधारित फसलें सूख रही हैं। खेती से रोजगार के अवसर घटने के कारण किसान और खेतिहर मजदूर बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।कल्याण कर्नाटक के कलबुर्गी, बल्लारी, यादगीर और रायचूर जिलों में किसान अब भी अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। कई इलाकों में खेतों की मिट्टी सूख चुकी है और फसलें खराब हो रही हैं। कई जगह बीज अंकुरित नहीं हुए, जबकि जहां पौधे उगे भी, वे मिट्टी में नमी की कमी के कारण कमजोर होकर सूखने लगे हैं।तालाबों और जलाशयों में पानी की कमी ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होने से कई किसानों के सामने दोबारा बुवाई का संकट खड़ा हो गया है।किसान संगठनों के अनुसार, इस बार पलायन केवल खेतिहर मजदूरों तक सीमित नहीं है। छोटे और मध्यम किसान भी खेती में हो रहे नुकसान के कारण गांव छोड़कर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जा रहे हैं। कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था कर दूसरे शहरों में बसने लगे हैं।कर्नाटक राज्य रैथा संघ–हसिरू सेना के अध्यक्ष माधव रेड्डी ने कहा कि बारिश की कमी से किसान और खेतिहर मजदूर दोनों प्रभावित हुए हैं। उन्होंने सरकार से प्रभावित क्षेत्रों को सूखाग्रस्त घोषित कर किसानों को राहत देने की मांग की।कर्नाटक प्रांत रैथा संघ के कलबुर्गी जिला अध्यक्ष शरणबसप्पा मामाशेट्टी ने कहा कि कई इलाकों में किसानों की फसलें पूरी तरह खराब हो चुकी हैं। उन्होंने सरकार से किसानों को मुफ्त बीज और उर्वरक उपलब्ध कराने की मांग की, क्योंकि भारी नुकसान के बाद कई किसान दोबारा बुवाई करने की स्थिति में नहीं हैं।वहीं, आंध्र प्रदेश के जोगुलम्बा गडवाल जिले के उंडावल्ली गांव में किसान रजाक ने बारिश की कमी से खराब हुई 10 एकड़ कपास की फसल को ट्रैक्टर चलाकर हटा दिया। उन्होंने एक महीने पहले पट्टे पर जमीन लेकर कपास की बुवाई की थी, लेकिन बारिश नहीं होने से पौधों का विकास रुक गया। किसान के अनुसार, उन्हें लगभग 1.50 लाख रुपये का नुकसान हुआ है।कमजोर मॉनसून ने दोनों राज्यों में किसानों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। किसान संगठन सरकार से सूखा राहत, बीज-उर्वरक सहायता और प्रभावित किसानों के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 16 पैसे मजबूत होकर 95.75 पर खुला.

गुजरात में कपास बुवाई पिछले साल के करीब

गुजरात में कपास की बुआई लगभग पिछले साल के बराबर; अंतर घटकर सिर्फ़ 0.8% रह गयागुजरात में कपास की बुआई की रफ़्तार लगभग पिछले साल जितनी हो गई है, जिससे सीज़न की शुरुआत में देर से बुआई को लेकर बनी चिंताएं कम हो गई हैं। गुजरात कृषि विभाग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 27 जुलाई 2026 तक 20.01 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 20.17 लाख हेक्टेयर था—यानी सिर्फ़ 16,116 हेक्टेयर (0.8%) की मामूली कमी आई है।कुल बुआई क्षेत्र में सबसे बड़ी कमी सौराष्ट्र में देखी गई है, जहाँ कपास की बुआई 13.58 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले साल 14.75 लाख हेक्टेयर थी। सुरेंद्रनगर, राजकोट, जामनगर, मोरबी और बोटाद जैसे कपास उगाने वाले प्रमुख ज़िलों में कम बुआई क्षेत्र के कारण यह क्षेत्र पिछले साल की रफ़्तार से पीछे रहा है।हालाँकि, अन्य क्षेत्रों में हुई अच्छी बढ़त ने इस कमी की काफी हद तक भरपाई कर दी है। मध्य गुजरात में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई, जहाँ बुआई पिछले साल के 1.78 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2.41 लाख हेक्टेयर हो गई। उत्तर गुजरात और दक्षिण गुजरात में भी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि वडोदरा, छोटा उदयपुर, साबरकांठा, अहमदाबाद, भावनगर और अमरेली जैसे ज़िलों में एक साल पहले की तुलना में बेहतर बुआई हुई।अब जब कपास की बुआई लगभग पिछले साल के स्तर पर पहुँच गई है, तो ध्यान फ़सल के विकास और मॉनसून के प्रदर्शन पर केंद्रित होगा, जो 2026-27 सीज़न के लिए गुजरात में कपास उत्पादन की संभावनाओं को तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।और पढ़ें :- रुपया 23 पैसे मजबूत होकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.91 पर बंद हुआ

आयात शुल्क में छूट और मिशन कपास क्रांति से बदलाव के दौर में भारत का कपास क्षेत्र

इंपोर्ट ड्यूटी में छूट और ‘मिशन कपास क्रांति’ के बीच भारत का कॉटन सेक्टर बदलाव के दौर मेंनई दिल्ली: इंपोर्ट ड्यूटी में छूट और ‘मिशन कपास क्रांति’ की शुरुआत के बीच भारत का कॉटन सेक्टर उत्पादन में गिरावट और नीतिगत बदलावों के दौर से गुजर रहा है। सरकार का जोर एक ओर टेक्सटाइल उद्योग के लिए कच्चे कॉटन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने पर है, वहीं दूसरी ओर उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक योजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है।आंकड़ों के अनुसार, देश में कॉटन का उत्पादन 2020-21 में 352.48 लाख गांठ से घटकर 2025-26 में 290.91 लाख गांठ (अनंतिम) रह गया है। उत्पादन में इस गिरावट का प्रमुख कारण कॉटन की खेती के रकबे में बदलाव माना जा रहा है। बेहतर रिटर्न की उम्मीद में कुछ किसानों ने कॉटन की जगह अन्य अधिक लाभदायक फसलों की ओर रुख किया है। हालांकि, इस अवधि के दौरान कॉटन की उत्पादकता में बड़ा बदलाव नहीं आया और यह लगभग 428 से 451 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के दायरे में बनी रही।कॉटन की कीमतों में भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप बदलाव देखने को मिला है। हाल की अवधि में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉटन की कीमतों में लगभग 19% की वृद्धि हुई, जबकि घरेलू बाजार में S-6 कॉटन की कीमतों में करीब 18% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। घरेलू उपलब्धता को बढ़ाने और टेक्सटाइल उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर कच्चे कॉटन और कॉटन यार्न का आयात किया जाता है।सरकार के अनुसार, घरेलू उत्पादन, कैरी-ओवर स्टॉक और आयात को मिलाकर देश में कॉटन की कुल उपलब्धता घरेलू टेक्सटाइल उद्योग की अनुमानित खपत को पूरा करने में सक्षम है। कॉटन की उपलब्धता, खपत और बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।टेक्सटाइल उद्योग को राहत देने के लिए सरकार ने 1 जून 2026 से 31 अक्टूबर 2026 तक कॉटन के आयात पर लागू 11% इंपोर्ट ड्यूटी से छूट दी है। इसके अलावा, अच्छी गुणवत्ता वाले कॉटन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कॉटन (ITC HS कोड 52010025) पर इंपोर्ट ड्यूटी में छूट भी जारी है। यह छूट 20 फरवरी 2024 से प्रभावी है।इसके साथ ही, सरकार ने कॉटन की उत्पादकता बढ़ाने और गुणवत्ता में सुधार के लिए 5,659.22 करोड़ रुपये के बजट के साथ पांच वर्षीय ‘मिशन कपास क्रांति’ को मंजूरी दी है। यह मिशन 2026-27 से 2030-31 तक लागू रहेगा। इसका उद्देश्य कॉटन की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार के साथ भारतीय कॉटन क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ बनाना है।और पढ़ें :- गुजरात का टेक्सटाइल उद्योग कपास संकट में, बढ़ती लागत और अमेरिकी टैरिफ का दबाव बढ़ा

गुजरात का टेक्सटाइल उद्योग कपास संकट में, बढ़ती लागत और अमेरिकी टैरिफ का दबाव बढ़ा

कपास संकट: खेतों से बंदरगाह तक दबाव, गुजरात का टेक्सटाइल उद्योग कई मोर्चों पर घिरागुजरात का प्रमुख टेक्सटाइल उद्योग इस समय कई स्तरों पर बढ़ते मार्जिन दबाव का सामना कर रहा है। देश के स्पिनिंग उत्पादन में लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी रखने वाला और कच्चे कपास के उत्पादन में करीब एक-तिहाई योगदान देने वाला राज्य घटती कपास उपलब्धता, कमजोर पैदावार, बढ़ती ऊर्जा लागत और बदलती अमेरिकी व्यापार नीति के दबाव में है।इन चुनौतियों का असर सौराष्ट्र से लेकर सूरत तक के जिनिंग, स्पिनिंग, बुनाई और टेक्सटाइल प्रोसेसिंग क्लस्टरों पर दिखाई दे रहा है। समस्या केवल कच्चे माल की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि बढ़ती उत्पादन लागत और कमजोर मांग ने भी उद्योग के मार्जिन पर दबाव बढ़ा दिया है।गुजरात में कपास की खेती का रकबा पिछले सीजन के 26.79 लाख हेक्टेयर से घटकर 23.62 लाख हेक्टेयर रह गया है। अनिश्चित मानसून, बढ़ती खेती लागत और कपास से कम रिटर्न के कारण सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के कई किसान मूंगफली और अन्य तिलहनी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसके अलावा, Bt कपास पर गुलाबी सुंडी के बढ़ते प्रकोप ने किसानों की लागत और जोखिम दोनों बढ़ा दिए हैं।कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के अनुमानों के अनुसार, गुजरात में कपास की प्रेसिंग घटकर करीब 76 लाख गांठ रह गई है, जबकि महाराष्ट्र का उत्पादन लगभग 85 लाख गांठ बताया गया है।कच्चे कपास की कीमतें ₹54,000 प्रति कैंडी से बढ़कर ₹66,000 प्रति कैंडी से अधिक हो गई हैं। हालांकि, धागे की कीमतों में वृद्धि के बावजूद तैयार कपड़े की कीमतें उसी गति से नहीं बढ़ीं। इससे उत्पादक बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ खरीदारों पर नहीं डाल सके। सूरत में उद्योग संगठनों के अनुसार, बुनाई और प्रोसेसिंग इकाइयों को ₹2,500 करोड़ से ₹3,000 करोड़ तक का नुकसान हुआ है।कमजोर मांग और बढ़ते स्टॉक के कारण कई इकाइयों ने उत्पादन में कटौती की है। कुछ मिलों ने उत्पादन शिफ्ट में 50% तक कमी की है, जबकि कुछ ने सप्ताह में दो दिन तक काम बंद रखने का फैसला किया है।ऊर्जा लागत ने भी संकट बढ़ाया है। राजकोट, कडी और अहमदाबाद की कुछ मिलों को कम लागत वाली कैप्टिव सोलर और विंड पावर की सीमित उपलब्धता के कारण महंगी ग्रिड बिजली पर निर्भर होना पड़ रहा है।इस बीच, 24 जुलाई 2026 से लागू होने वाले अमेरिकी व्यापार ढांचे के तहत भारतीय टेक्सटाइल उत्पादों पर अतिरिक्त 10% टैरिफ का दबाव बना हुआ है। हालांकि, भारत को कुछ प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में लगभग 2.5 प्रतिशत अंक का लाभ मिला है, लेकिन MFN ड्यूटी जोड़ने के बाद प्रभावी टैरिफ करीब 15.5% से 16% तक पहुंच सकता है।उद्योग संगठनों ने सरकार से CCI के माध्यम से कच्चे कपास की स्थिर आपूर्ति, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में टैरिफ राहत, औद्योगिक बिजली दरों में अस्थायी राहत और ब्याज सब्सिडी बढ़ाने की मांग की है।और पढ़ें :- क्या मध्य प्रदेश बनेगा भारत का अगला टेक्सटाइल ग्रोथ इंजन? इंदौर-धार में नया हब उभर रहा

क्या मध्य प्रदेश बनेगा भारत का अगला टेक्सटाइल ग्रोथ इंजन? इंदौर-धार में नया हब उभर रहा

क्या मध्य प्रदेश भारत का अगला टेक्सटाइल ग्रोथ इंजन बन सकता है?इंदौर-धार क्षेत्र तेजी से उभर रहा है टेक्सटाइल और परिधान उद्योग के नए केंद्र के रूप मेंमध्य प्रदेश का इंदौर-धार क्षेत्र देश के टेक्सटाइल और परिधान उद्योग के लिए तेजी से एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है। पारंपरिक रूप से कृषि और सामान्य मैन्युफैक्चरिंग के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में अब एक व्यापक टेक्सटाइल इकोसिस्टम विकसित हो रहा है। इस बदलाव में बड़नगर के पास भैंसोला में विकसित किया जा रहा PM MITRA पार्क अहम भूमिका निभा रहा है।लगभग 2,156 एकड़ में फैले इस इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल पार्क को करीब ₹2,063 करोड़ के अनुमानित निवेश से विकसित किया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना के लिए ₹20,000 करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। शुरुआती चरण में कंपनियों को 1,100 एकड़ से अधिक भूमि आवंटित की जा चुकी है। निवेशकों की बढ़ती रुचि को देखते हुए मध्य प्रदेश इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MPIDC) भूमि आवंटन के अगले चरण की तैयारी कर रहा है।पूरी तरह विकसित होने के बाद इस पार्क से 46,000 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। इसका उद्देश्य फाइबर, यार्न, फैब्रिक, प्रोसेसिंग और गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग जैसी टेक्सटाइल वैल्यू चेन की विभिन्न गतिविधियों को एक ही इकोसिस्टम में लाना है।पार्क में आंतरिक सड़कें, जल आपूर्ति और ड्रेनेज जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, कॉमन फैसिलिटी सेंटर, टेस्टिंग सुविधाएं, इनक्यूबेशन सपोर्ट और प्लग-एंड-प्ले मैन्युफैक्चरिंग स्पेस विकसित किए जा रहे हैं। इससे कंपनियों को उत्पादन शुरू करने में लगने वाला समय और शुरुआती लागत कम करने में मदद मिल सकती है।इस परियोजना से आसपास के क्षेत्र में सहायक उद्योगों और सप्लाई चेन के विकास को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अरविंद ग्रुप, OFB टेक और झिल जैसी कंपनियों की क्षेत्र में मौजूदगी से टेक्सटाइल क्लस्टर को मजबूती मिल सकती है।बेहतर सड़क और लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी के कारण क्षेत्र को राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के जरिए प्रमुख बाजारों और निर्यात केंद्रों तक बेहतर पहुंच मिल सकती है। ताइवान के एक औद्योगिक प्रतिनिधिमंडल की यात्रा विदेशी निवेशकों की बढ़ती रुचि का संकेत देती है।हालांकि, परियोजना की दीर्घकालिक सफलता प्रभावी क्रियान्वयन, कुशल श्रमबल के विकास, मजबूत सप्लाई चेन और निर्यात केंद्रित कंपनियों को आकर्षित करने पर निर्भर करेगी। यदि ये चुनौतियां प्रभावी ढंग से दूर की जाती हैं, तो इंदौर-धार क्षेत्र मध्य प्रदेश को भारत के अगले बड़े टेक्सटाइल ग्रोथ इंजन में बदल सकता है।और पढ़ें :- ब्राजील में 2024/25 में रिकॉर्ड कपास उत्पादन 3.92 मिलियन टन पहुंचा

ब्राजील में 2024/25 में रिकॉर्ड कपास उत्पादन 3.92 मिलियन टन पहुंचा

ब्राज़ील में कपास का रिकॉर्ड उत्पादन2024/25 सीज़न में रिकॉर्ड-तोड़ फसल हासिल करने के बाद, ब्राज़ील ने दुनिया के सबसे बड़े कपास निर्यातक के तौर पर अपनी स्थिति और मज़बूत कर ली है। ब्राज़ीलियन कॉटन ग्रोअर्स एसोसिएशन (Abrapa) के अनुसार, देश ने लगभग 3.92 मिलियन टन कपास का उत्पादन किया, जो इसके इतिहास में सबसे ज़्यादा है। ऐसा खेती का दायरा बढ़ने और उत्पादकता में सुधार के कारण संभव हुआ।खेती का कुल रकबा लगभग 2.12 मिलियन हेक्टेयर तक पहुँच गया, जो पिछले सीज़न की तुलना में 6% से ज़्यादा है। अनुकूल मौसम, खेती की आधुनिक तकनीकों और अच्छी पैदावार की वजह से ब्राज़ील बहुत ज़्यादा कपास की फसल ले पाया, साथ ही उसने उस बेहतरीन फाइबर क्वालिटी को भी बनाए रखा जिसके लिए वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाता है।ज़बरदस्त उत्पादन का नतीजा रिकॉर्ड निर्यात के रूप में सामने आया। CNN ब्राज़ील के अनुसार, 2024/25 सीज़न के दौरान ब्राज़ील से लगभग 2.8 मिलियन टन कपास का निर्यात होने की उम्मीद थी, जिससे दुनिया के सबसे बड़े कपास निर्यातक के तौर पर उसकी स्थिति बनी रही। हालाँकि फसल का ज़्यादातर हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भेजा गया, लेकिन एक बड़ा हिस्सा घरेलू टेक्सटाइल उद्योग की ज़रूरतों को भी पूरा करता रहा।उत्पादन और निर्यात के बीच अंतर समझना ज़रूरी है। उत्पादन का मतलब है कुल काटी गई कपास, जबकि निर्यात का मतलब है विदेशों में भेजी गई मात्रा। यह अंतर उस फाइबर को दर्शाता है जिसका इस्तेमाल ब्राज़ील के भीतर ही मैन्युफैक्चरर्स और टेक्सटाइल कंपनियाँ करती हैं।रिकॉर्ड फसल ब्राज़ीलियाई कृषि की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को दिखाती है। बड़े पैमाने पर उत्पादन, लगातार अच्छी क्वालिटी और कुशल लॉजिस्टिक्स के साथ, ब्राज़ील ने वैश्विक कपास बाज़ार में अपनी भूमिका मज़बूत की है। यह सेक्टर खेती, प्रोसेसिंग और ट्रांसपोर्टेशन जैसे क्षेत्रों में हज़ारों लोगों को रोज़गार देता है, साथ ही अर्थव्यवस्था में अरबों का योगदान करता है और देश के व्यापार संतुलन को मज़बूत बनाता है। 2024/25 सीज़न वैश्विक कपास पावरहाउस के तौर पर ब्राज़ील के बढ़ते प्रभाव की पुष्टि करता है।और पढ़ें :- जाब में कपास की खेती घटकर 80,000 हेक्टेयर हुई; छह साल में देश का उत्पादन भी गिरा

जाब में कपास की खेती घटकर 80,000 हेक्टेयर हुई; छह साल में देश का उत्पादन भी गिरा

पंजाब में कपास की खेती 80,000 हेक्टेयर तक सिमटी, छह साल में देशभर में उत्पादन में गिरावटबठिंडा: पंजाब में कपास की खेती लगातार घट रही है और वर्ष 2026-27 के सीजन में इसका रकबा घटकर लगभग 80,000 हेक्टेयर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। राज्यसभा में सांसद प्रमोद तिवारी के सवाल के जवाब में केंद्रीय कपड़ा राज्य मंत्री पवित्र मार्गेरिटा द्वारा पेश किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि देशभर में भी पिछले छह वर्षों के दौरान कपास के रकबे और उत्पादन में लगातार गिरावट आई है।कपास उत्पादन और खपत पर गठित समिति की अप्रैल 2026 की बैठक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कपास की खेती का कुल क्षेत्रफल 2020-21 में 132.85 लाख हेक्टेयर था, जो 2025-26 में घटकर 114.82 लाख हेक्टेयर रह गया। इसी अवधि में कपास उत्पादन 352.48 लाख गांठों से कम होकर 290.91 लाख गांठों तक पहुंच गया। एक गांठ का वजन 170 किलोग्राम होता है।राष्ट्रीय स्तर पर कपास की उत्पादकता में भी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2020-21 में प्रति हेक्टेयर 451 किलोग्राम कपास उत्पादन होता था, जो 2025-26 में घटकर 431 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गया। हालांकि, 2022-23 में उत्पादकता 443 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के स्तर तक पहुंची थी।पंजाब में गिरावट ज्यादा तेज रही है। वर्ष 2025-26 में राज्य में कपास का रकबा 1.19 लाख हेक्टेयर था, जो 2026-27 में घटकर केवल 80,000 हेक्टेयर रह गया। राज्य सरकार ने कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए 1.25 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य तय किया था, लेकिन किसान इस लक्ष्य का करीब 64 प्रतिशत ही हासिल कर सके। विशेषज्ञों के अनुसार, बेहतर आमदनी देने वाली अन्य फसलों की ओर किसानों का रुख बढ़ने से कपास का क्षेत्र लगातार कम हो रहा है।कपास उत्पादन में कमी का असर कपड़ा उद्योग पर भी पड़ा है। घरेलू उद्योग की मांग पूरी करने के लिए कच्चे कपास के आयात में भारी वृद्धि हुई है। 2024-25 में जहां 5,62,224 टन कच्चे कपास का आयात हुआ था, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 10,13,455 टन हो गया।केंद्रीय मंत्री ने उत्पादन में गिरावट का मुख्य कारण भूमि उपयोग में बदलाव और किसानों का वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ना बताया। उन्होंने कहा कि सरकार कपड़ा उद्योग को समर्थन देने के लिए कई कदम उठा रही है। इनमें कच्चे कपास के आयात पर 1 जून से 31 अक्टूबर तक 11 प्रतिशत आयात शुल्क में छूट और बेहतर गुणवत्ता वाले एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल कॉटन के आयात पर शुल्क छूट जारी रखना शामिल है।और पढ़ें :- महाराष्ट्र में खरीफ बुवाई 2026 का 74% क्षेत्र पूरा, सोयाबीन और कपास किसानों की पहली पसंद

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