कॉटन की घटती आपूर्ति से बढ़ेगी मैन-मेड फाइबर की मांग: नुवामा
नई दिल्ली: भारत में कॉटन का अधिशेष लगातार कम होने से टेक्सटाइल उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले वर्षों में मैन-मेड फाइबर (एमएमएफ) की मांग बढ़ने और इस क्षेत्र में निवेश व क्षमता विस्तार को गति मिलने की संभावना है। नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज़ की एक रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कॉटन बाजार अब अधिशेष स्थिति से निकलकर संतुलित आपूर्ति की ओर बढ़ रहा है। कॉटन उत्पादन कॉटन सीजन (CS) 2021 के 6.31 अरब किलोग्राम से घटकर CS26 में लगभग 4.95 अरब किलोग्राम रहने का अनुमान है। वहीं, इसी अवधि में कॉटन आयात 0.26 अरब किलोग्राम से बढ़कर करीब 0.80 अरब किलोग्राम तक पहुंच गया है।
इसके विपरीत, कॉटन निर्यात में भारी गिरावट दर्ज की गई है। निर्यात CS21 के 1.28 अरब किलोग्राम से घटकर CS26 में लगभग 0.20 अरब किलोग्राम रहने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक, सीमित घरेलू उपलब्धता और वैश्विक मांग में बदलाव के कारण कॉटन बाजार में आपूर्ति का दबाव बढ़ा है।
कॉटन कीमतों में भी इस बदलाव का असर दिखाई दिया है। शंकर-6 कॉटन की कीमतें CS21 में 110 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर CS23 में 221 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थीं। हालांकि बाद में कीमतों में नरमी आई और वे लगभग 155 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गईं, लेकिन भारत का पारंपरिक मूल्य लाभ काफी हद तक कम हो चुका है।
नुवामा ने कहा कि वैश्विक कॉटन व्यापार में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश की स्पिनिंग मिलें भारतीय कच्चे कॉटन की प्रमुख खरीदार बनकर उभरी हैं, जबकि भारत अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से बेहतर गुणवत्ता वाले स्टेपल कॉटन का आयात बढ़ा रहा है, क्योंकि घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्पिनिंग उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता का मार्जिन लगातार कम हो रहा है। कमजोर फसल वाले वर्षों में स्पिनर्स के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, टेक्सटाइल उद्योग के लिए यह बदलाव एमएमएफ आधारित उत्पादन को बढ़ावा दे सकता है और कंपनियों को अपने फाइबर मिश्रण में विविधता लाने की जरूरत होगी।
नुवामा के अनुसार, भारत लंबे समय तक वैश्विक बाजार की तुलना में 8-11 प्रतिशत कम कीमत पर कॉटन उपलब्ध कराने वाला अधिशेष उत्पादक रहा, लेकिन अब यह प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त लगभग समाप्त हो चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026 में घरेलू और वैश्विक कॉटन कीमतों के बीच समानता (पैरिटी) मुख्य रूप से आयात शुल्क में अस्थायी छूट का परिणाम रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, आयात शुल्क में छूट को सीमित अवधि के लिए जारी रखा गया है। नुवामा का मानना है कि यह स्थिति दर्शाती है कि सरकार का प्राथमिक फोकस किसानों की आय को समर्थन देने पर अधिक रहा है, जबकि टेक्सटाइल मिलों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए उद्योग को वैकल्पिक फाइबर स्रोतों की ओर बढ़ना होगा।
और पढ़ें :- कपास बुवाई 103.54 लाख हेक्टेयर