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CCI ने कपास कीमत में ₹700 प्रति कैंडी की कटौती की

CCI ने कॉटन की कीमतें ₹700 प्रति कैंडी कम कीं; सीज़न की बिक्री 70.4 लाख बेल्स के पारकॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (CCI) ने 1 जून से 5 जून, 2026 के सप्ताह के दौरान अपनी कॉटन कैंडी की कीमतों में ₹700 प्रति कैंडी की कटौती की। कीमतें कम होने के बावजूद, नीलामी में गतिविधि सामान्य रही, जिसमें मिलों और व्यापारियों दोनों ने हिस्सा लिया। इस सप्ताह के दौरान 2025–26 कॉटन सीज़न से कुल बिक्री लगभग 5,900 बेल्स रही।*साप्ताहिक बिक्री रिपोर्ट* 1 जून, 2026 (सोमवार)सप्ताह की शुरुआत 700 गठानों की बिक्री के साथ हुई, जिन्हें पूरी तरह से टेक्सटाइल मिलों ने खरीदा।2 जून, 2026 (मंगलवार)CCI ने 300 गठानों की बिक्री दर्ज की, जिसमें खरीद में मिलों का दबदबा बना रहा।4 जून, 2026 (गुरुवार)सप्ताह की सबसे ज़्यादा गतिविधि गुरुवार को देखी गई, जब 4,900 गठाने बेचीं गई । पूरी मात्रा कॉटन व्यापारियों द्वारा खरीदी गई।3 जून और 5 जून, 2026बुधवार या शुक्रवार को कपास गठानों की कोई बिक्री नहीं हुई।*कुल बिक्री का अपडेट*CCI की कुल बिक्री इस स्तर पर पहुँच गई है:2025–26 सीज़न: 70,40,400 गठानें

मक्का से कपास और सोयाबीन की ओर बढ़ सकता है किसानों का रुझान

मक्का से कपास और सोयाबीन की ओर बढ़ सकता है किसानों का रुझानसंभावित अल-नीनो प्रभाव और सामान्य से कम मानसून के पूर्वानुमान के बीच खरीफ सीजन में किसानों की फसल चयन रणनीति में बदलाव देखने को मिल सकता है। क्रिसिल की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न राज्यों में किसान मौसम, लाभप्रदता और बाजार की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसलों का चयन कर सकते हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में मक्का उत्पादक किसानों का रुझान सोयाबीन की ओर बढ़ सकता है। वहीं, देश के सबसे बड़े सोयाबीन उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश में मक्का और सोयाबीन के कुछ रकबे के कपास की ओर स्थानांतरित होने की संभावना जताई गई है, जिससे राज्य में कपास का रकबा बढ़ सकता है।रिपोर्ट के मुख्य लेखक पुशन शर्मा के अनुसार, मक्का के कुल रकबे में कमी आने की संभावना है, लेकिन फसल परिवर्तन का स्वरूप राज्यों के अनुसार अलग-अलग रहेगा। किसान केवल वर्षा के पूर्वानुमान पर ही नहीं, बल्कि फसलों की सापेक्ष लाभप्रदता, खरीद सहायता और मौजूदा बाजार परिस्थितियों को भी ध्यान में रखेंगे।रिपोर्ट में कहा गया है कि मौसम के शुरुआती चरण में अधिक तापमान और असमान वर्षा के कारण कपास और सोयाबीन जैसी फसलों में कीट एवं रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है। इससे उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम बना रहेगा।हालांकि, देश के जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से बेहतर बना हुआ है, जिससे प्रमुख कृषि क्षेत्रों में समय पर खेतों की तैयारी और बुवाई कार्य को सहायता मिलने की उम्मीद है। इसके बावजूद खरीफ फसलों की पैदावार काफी हद तक मानसून के वितरण, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा उर्वरकों की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य से कम बारिश की आशंका के बीच किसान जोखिम और संभावित लाभ को ध्यान में रखते हुए फसल चयन करेंगे, जिसके चलते कुछ क्षेत्रों में मक्का के स्थान पर कपास और सोयाबीन का रकबा बढ़ सकता है।

नवीकरणीय ऊर्जा अपनाकर तमिलनाडु का टेक्सटाइल उद्योग सालाना ₹3,250 करोड़ बचा सकता है: रिपोर्ट

रिपोर्ट: रिन्यूएबल एनर्जी अपनाने से तमिलनाडु के टेक्सटाइल उद्योग को सालाना ₹3,250 करोड़ तक की बचत संभवबेंगलुरु स्थित थिंक टैंक Climate Risk Horizons की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु का टेक्सटाइल उद्योग स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण कर हर वर्ष ₹1,560 करोड़ से ₹3,250 करोड़ तक की लागत बचा सकता है। अध्ययन में पिछले एक दशक के ‘एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज़’ (ASI) के आंकड़ों के आधार पर उद्योग के डीकार्बोनाइजेशन की स्थिति और संभावनाओं का आकलन किया गया है।रिपोर्ट के मुताबिक, यदि उद्योग पूरी तरह रिन्यूएबल बिजली का उपयोग करे तो उसे सालाना ₹2,320 करोड़ से ₹3,250 करोड़ तक की बचत हो सकती है। अध्ययन में कहा गया है कि ऊर्जा और ईंधन पर बढ़ता खर्च राज्य में टेक्सटाइल उत्पादन की लागत बढ़ाने वाला प्रमुख कारक बन गया है।रिपोर्ट के सह-लेखक Rakesh Ranjan के अनुसार, बढ़ती ईंधन लागत तमिलनाडु के टेक्सटाइल उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित कर रही है। उन्होंने बताया कि राज्य का टेक्सटाइल निर्यात 2017 से लगभग 7.4 अरब डॉलर के स्तर पर स्थिर बना हुआ है। उनके अनुसार, रिन्यूएबल ऊर्जा अपनाने से उद्योग की लागत घटेगी और उसकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पिछले चार वर्षों में राज्य के टेक्सटाइल क्षेत्र का कुल ऊर्जा व्यय लगभग दोगुना हो गया है। साथ ही, ईंधन लागत और उत्पादन के अनुपात में भी वृद्धि दर्ज की गई है। अध्ययन के अनुसार, प्रमुख निर्यातक देशों की तुलना में भारत के टेक्सटाइल उद्योग का कार्बन फुटप्रिंट सबसे अधिक है, जो प्रति किलोग्राम टेक्सटाइल पर 12.5 किलोग्राम CO₂e से अधिक है।रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि रिन्यूएबल ऊर्जा आधारित इलेक्ट्रिक हीटिंग को अपनाकर उद्योग उत्पादन लागत और कार्बन उत्सर्जन दोनों में कमी ला सकता है। साथ ही, राज्य सरकार और बिजली नियामक संस्थाओं से विशेषकर MSME इकाइयों के लिए रिन्यूएबल ऊर्जा तक पहुंच आसान बनाने की सिफारिश की गई है।और पढ़ें :- हरियाणा में कपास खेती से किसानों का मोहभंग, रकबा 65% घटा

हरियाणा में कपास खेती से किसानों का मोहभंग, रकबा 65% घटा

हरियाणा में कपास खेती का संकट गहराया, सात साल में 65% घटा रकबाहिसार -हरियाणा में कभी किसानों की प्रमुख नकदी फसल मानी जाने वाली कपास अब संकट के दौर से गुजर रही है। लगातार आर्थिक नुकसान, गुलाबी सुंडी के बढ़ते प्रकोप और बारिश से फसल को होने वाले भारी नुकसान के कारण किसान कपास की खेती से दूरी बना रहे हैं। इसका असर प्रदेश में कपास के रकबे पर साफ दिखाई दे रहा है।वर्ष 2019-20 में हरियाणा में कपास की खेती 8.01 लाख एकड़ क्षेत्र में की गई थी, जो 2025-26 में घटकर केवल 2.84 लाख एकड़ रह गई है। यानी सात वर्षों में कपास का रकबा करीब 65 फीसदी कम हो चुका है। पिछले तीन वर्षों में ही इसका क्षेत्रफल लगभग आधा रह गया है। इस बार भी कपास की बिजाई का क्षेत्रफल पिछले आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर दर्ज किया गया है।कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग ने कई प्रयास किए हैं। ‘प्रमोशन फॉर कॉटन कल्टीवेशन इन हरियाणा’ अभियान के तहत प्रमुख कपास उत्पादक जिलों में जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए। किसानों को सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए दो हजार रुपये प्रति एकड़ तथा देसी कपास की खेती पर चार हजार रुपये प्रति एकड़ की सहायता भी दी जा रही है। इसके बावजूद किसान कपास की ओर लौटने को तैयार नहीं हैं।संयुक्त निदेशक (कपास) डॉ. आत्मा राम गोदारा के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों से किसानों को कपास की खेती में लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। अगस्त-सितंबर में होने वाली बारिश फसल को सबसे अधिक प्रभावित करती है, जबकि गुलाबी सुंडी का प्रकोप भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनय महला की रिपोर्ट के अनुसार, कपास की खेती पर किसानों की प्रति एकड़ औसत लागत 40,024 रुपये रही, जबकि बिक्री और उप-उत्पादों से कुल आय केवल 24,882 रुपये हुई। इससे किसानों को औसतन 15,142 रुपये प्रति एकड़ का नुकसान उठाना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बेहतर और कीट-प्रतिरोधी किस्में विकसित नहीं की गईं तो आने वाले वर्षों में प्रदेश में कपास की खेती का दायरा और सिमट सकता है।और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 7 पैसे मजबूत होकर 95.72 पर खुला

पंजाब ने कपास बीज सब्सिडी पंजीकरण की समयसीमा 15 दिन बढ़ाई

पंजाब सरकार ने कपास बीज सब्सिडी के लिए रजिस्ट्रेशन की समय-सीमा बढ़ाईचंडीगढ़। पंजाब सरकार ने कपास उत्पादक किसानों को राहत देते हुए कपास के बीजों पर मिलने वाली 33 प्रतिशत सब्सिडी के लिए रजिस्ट्रेशन की समय-सीमा 15 दिन बढ़ा दी है। कृषि विभाग ने यह निर्णय उन किसानों को ध्यान में रखते हुए लिया है, जो किसी कारणवश निर्धारित समय में ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण नहीं कर सके थे।विभाग के अनुसार, कई किसानों को तकनीकी कारणों और जानकारी की कमी के चलते रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी करने में कठिनाई आई। इसके अलावा, फील्ड स्टाफ के चुनावी ड्यूटी में व्यस्त रहने के कारण भी किसानों तक समय पर सहायता नहीं पहुंच सकी।सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को कृषि विभाग के पोर्टल पर समय रहते रजिस्ट्रेशन कर आवश्यक जानकारी और दस्तावेज जमा करने होंगे।योजना के तहत किसान दो हेक्टेयर तक के लिए बीटी और देसी कपास के बीजों पर 33 प्रतिशत सब्सिडी प्राप्त कर सकते हैं।और पढ़ें :- खरगोन में कपास की बुवाई ने पकड़ी रफ्तार, 1.05 लाख हेक्टेयर में हुई खेती

खरगोन में कपास की बुवाई ने पकड़ी रफ्तार, 1.05 लाख हेक्टेयर में हुई खेती

खरगोन में कपास की बोवनी ने पकड़ी रफ्तार, 1.05 लाख हेक्टेयर में हुई बुवाईखरगोन जिले में प्री-मानसून गतिविधियों और अनुकूल मौसम के चलते कपास की बोवनी तेज़ी से आगे बढ़ रही है। अब तक जिले में 1.05 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हो चुकी है, जो निर्धारित लक्ष्य का लगभग 51 प्रतिशत है। सबसे अधिक बुवाई नर्मदा पट्टी के कसरावद, महेश्वर और बड़वाह क्षेत्रों में दर्ज की गई है।पिछले वर्ष कपास की सरकारी खरीदी बेहतर रहने से किसानों का रुझान इस फसल की ओर बढ़ा है। इसी वजह से इस बार कपास के रकबे में करीब 300 हेक्टेयर की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। वहीं, प्री-मानसून बारिश के बाद तापमान 38 से 39 डिग्री सेल्सियस के बीच बना हुआ है, जिसे कपास की बुवाई के लिए उपयुक्त माना जाता है। कृषि विभाग को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में बुवाई का दायरा और बढ़ेगा।मध्य प्रदेश में सर्वाधिक कपास उत्पादन करने वाले जिले खरगोन के लिए इस वर्ष 2.09 लाख हेक्टेयर में कपास बोने का लक्ष्य तय किया गया है। पिछले वर्ष जिले में लगभग 2.095 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती की गई थी।सहायक संचालक कृषि प्रकाश ठाकुर के अनुसार, लू का प्रभाव कम होने और सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों में पर्याप्त नमी उपलब्ध होने से वर्तमान समय कपास की बुवाई के लिए अनुकूल है। उन्होंने बताया कि विभाग इस वर्ष निर्धारित 2.09 लाख हेक्टेयर लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसानों को लगातार मार्गदर्शन दे रहा है।और पढ़ें :- रुपया डॉलर के मुकाबले 08 पैसे गिरकर 95.79 पर बंद हुआ।

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राज्यवार CCI कपास बिक्री का विवरण 08-06-2026 11:31:16 view
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