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राजस्थान में खरीफ बुवाई 11,011 हजार हेक्टेयर पहुंची, लक्ष्य का 67% हासिल

राजस्थान में खरीफ बुवाई 11,011.443 हजार हेक्टेयर तक पहुंची, लक्ष्य का 67% पूराराजस्थान में खरीफ 2026 की बुवाई तेजी से आगे बढ़ रही है। कृषि विभाग की 17 जुलाई 2026 की संशोधित रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में कुल खरीफ फसलों की बुवाई 11,011.443 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में हो चुकी है। यह निर्धारित 16,539 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य का 67 प्रतिशत है।रिपोर्ट के अनुसार, अनाज फसलों की बुवाई 4,425.537 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो लक्ष्य का 75 प्रतिशत है। इनमें बाजरे की बुवाई 2,882.775 हजार हेक्टेयर में हुई है। इसके अलावा मक्का 862.178 हजार हेक्टेयर, ज्वार 489.301 हजार हेक्टेयर और धान 190.848 हजार हेक्टेयर में बोया गया है।दलहनी फसलों के तहत कुल 2,662.720 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है, जो लक्ष्य का 64 प्रतिशत है। इसमें मूंग की बुवाई 1,822.561 हजार हेक्टेयर, मोठ 473.481 हजार हेक्टेयर, उड़द 308.756 हजार हेक्टेयर, चवला 54.684 हजार हेक्टेयर और अरहर 3.121 हजार हेक्टेयर में हुई है।तिलहनी फसलों की कुल बुवाई 1,948.667 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो लक्ष्य का 71 प्रतिशत है। इसमें मूंगफली की बुवाई 987.465 हजार हेक्टेयर और सोयाबीन की 854.558 हजार हेक्टेयर में हुई है।अन्य फसलों में ग्वार की बुवाई 1,152.661 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो लक्ष्य का 45 प्रतिशत है। वहीं कपास की बुवाई 526.307 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो निर्धारित 720 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य का 73 प्रतिशत है। गन्ने की बुवाई 4.625 हजार हेक्टेयर में हुई है।कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में खरीफ बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में कई प्रमुख फसलों में आगे चल रही है। हालांकि, कुल बुवाई अभी निर्धारित लक्ष्य के 67 प्रतिशत तक पहुंची है और आगामी दिनों में खरीफ फसलों का रकबा और बढ़ने की संभावना है।और पढ़ें :- भारत का ‘सफेद सोना’ कपास: 2031 तक उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य

भारत का ‘सफेद सोना’ कपास: 2031 तक उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य

भारत का ‘सफेद सोना’ कपास: उत्पादन और वैश्विक बाजार में पकड़ मजबूत करने पर जोरनई दिल्ली: भारत वैश्विक कपास उद्योग में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। सोमवार को जारी सरकारी फैक्टशीट के अनुसार, कपास की खेती के क्षेत्रफल के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि कपास के उत्पादन और खपत दोनों में दूसरे स्थान पर है।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में भारत का कपास उत्पादन 290.91 लाख गांठ रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत करीब 328 लाख गांठ रहने की उम्मीद है। भारत वैश्विक फाइबर उत्पादन में लगभग 19 प्रतिशत का योगदान देता है।सरकार ने कहा कि कपास क्षेत्र से जुड़ी हालिया पहल उत्पादकता, गुणवत्ता, बाजार तक पहुंच और मूल्यवर्धन बढ़ाने पर केंद्रित हैं। कीमतों में गिरावट के दौरान किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से मूल्य समर्थन मिलता है। इसके अलावा, ‘मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी’ के तहत वर्ष 2031 तक कपास उत्पादन बढ़ाकर 498 लाख गांठ करने का लक्ष्य रखा गया है।सरकार के अनुसार, तकनीक प्रदर्शन, डिजिटल खरीद और ट्रेसेबिलिटी जैसी पहल कपास की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार कर रही हैं। इनसे वैश्विक कपास बाजार में भारतीय किसानों और उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होने की उम्मीद है।कपास के आर्थिक महत्व के कारण इसे भारत का ‘सफेद सोना’ कहा जाता है। यह फसल करीब 60 लाख किसानों की आजीविका का आधार है। देश में कपास की खेती लगभग 114.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। वहीं, प्रोसेसिंग, व्यापार और टेक्सटाइल वैल्यू चेन से जुड़ी गतिविधियों में करीब 4-5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है।फाइबर, धागे, कपड़े और गारमेंट्स के निर्यात के जरिए कपास विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 2024-25 में भारत ने करीब 18 लाख गांठ कपास का निर्यात किया, जो वैश्विक कपास निर्यात का लगभग 3.37 प्रतिशत था। वित्त वर्ष 2024-25 में कपास निर्यात का मूल्य 11.49 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।भारतीय कॉटन टेक्सटाइल और मेड-अप उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार अमेरिका रहा, जिसकी निर्यात में 26.35 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। इसके बाद बांग्लादेश, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख बाजार रहे।भारत में कपास की खेती मुख्य रूप से नौ राज्यों में होती है। इन्हें उत्तरी, मध्य और दक्षिणी कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है। इसके अलावा, ओडिशा और तमिलनाडु में भी कपास की खेती की जाती है।और पढ़ें :- भारत फिर से वैश्विक कपड़ा व्यापार में नेतृत्व हासिल करने की राह पर

भारत फिर से वैश्विक कपड़ा व्यापार में नेतृत्व हासिल करने की राह पर

कभी टेक्सटाइल व्यापार में भारत का दबदबा था, अब वैश्विक पहचान फिर बनाने की चुनौतीनई दिल्ली: कभी भारत दुनिया के प्रमुख टेक्सटाइल व्यापारिक केंद्रों में शामिल था। आज देश के पास कपास उत्पादन से लेकर कताई, बुनाई, प्रोसेसिंग, परिधान निर्माण और निर्यात तक टेक्सटाइल की पूरी वैल्यू चेन मौजूद है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी रोजगार पैदा करने की क्षमता है। हालांकि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत को मजबूत संस्थानों, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है।बहुत कम उद्योगों ने भारत की सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर टेक्सटाइल उद्योग जितना गहरा प्रभाव डाला है। ग्लोबल वैल्यू चेन की आधुनिक अवधारणा के सामने आने से हजारों वर्ष पहले ही कपड़ा निर्माण भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था।हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में हुई खुदाई से तकली, सुई और कपड़ा निर्माण तथा रंगाई से जुड़ी वस्तुओं के प्रमाण मिले हैं। ये भारत में टेक्सटाइल गतिविधियों के शुरुआती प्रमाणों में शामिल हैं। सिंधु घाटी सभ्यता में विकसित हुई यह परंपरा बाद की सदियों में व्यापार, नवाचार और उत्कृष्ट कारीगरी के माध्यम से आगे बढ़ती रही।लगभग दो हजार वर्षों तक भारतीय कपड़ों की एशिया और यूरोप के बाजारों में मजबूत मांग रही। मुगल काल के दौरान बंगाल सूती टेक्सटाइल उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। ढाका की महीन मलमल अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध थी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी काफी मांग थी। वहीं, मुर्शिदाबाद रेशम और अन्य उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्रों के व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरा।अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 1700 में वैश्विक आर्थिक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई थी। इसके बाद औद्योगिक क्रांति ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल दिया। जेम्स हारग्रीव्स की स्पिनिंग जेनी और बुनाई से जुड़ी अन्य मशीनों ने बड़े पैमाने पर उत्पादन को बढ़ावा दिया। प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त अब केवल कारीगरों के कौशल पर निर्भर नहीं रही, बल्कि तकनीक, उत्पादकता और बड़े पैमाने पर उत्पादन पर आधारित हो गई।इस बदलाव के बाद भारत धीरे-धीरे ब्रिटेन के लंकाशायर क्षेत्र की मिलों के लिए कच्चे कपास का प्रमुख आपूर्तिकर्ता और तैयार कपड़ों के लिए एक बड़ा बाजार बन गया।आज भारत के सामने चुनौती केवल अपने गौरवशाली टेक्सटाइल अतीत को दोहराने की नहीं, बल्कि आधुनिक वैश्विक टेक्सटाइल शक्ति के रूप में अपनी नई पहचान बनाने की है। इसके लिए मजबूत संस्थानों, आधुनिक तकनीक, नवाचार, कुशल कार्यबल और पूरी वैल्यू चेन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता होगी।और पढ़ें :- भारत-यूके व्यापार समझौते से FY31 तक निर्यात लगभग दोगुना होने का अनुमान

भारत-यूके व्यापार समझौते से FY31 तक निर्यात लगभग दोगुना होने का अनुमान

भारत-UK ट्रेड एग्रीमेंट से FY31 तक एक्सपोर्ट लगभग दोगुना हो सकता है; टेक्सटाइल और लेदर सेक्टर को सबसे ज़्यादा फ़ायदाबैंक ऑफ़ बड़ौदा रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत-UK कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) लागू होने के बाद, UK को भारत का एक्सपोर्ट FY26 में $13.5 बिलियन से बढ़कर FY31 तक $24.2 बिलियन होने का अनुमान है।15 जुलाई को लागू हुए इस ट्रेड एग्रीमेंट से UK भेजे जाने वाले लगभग सभी सामानों पर टैरिफ खत्म होने से भारतीय एक्सपोर्ट में ज़बरदस्त बढ़ोतरी की उम्मीद है। रिपोर्ट का अनुमान है कि दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार FY26 में $25.1 बिलियन से बढ़कर FY31 तक $41 बिलियन हो सकता है, जिसमें भारत का एक्सपोर्ट इंपोर्ट से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है, जिससे ट्रेड सरप्लस और बढ़ेगा।टेक्सटाइल और कपड़ों को फ़ायदायह एग्रीमेंट भारतीय टेक्सटाइल और कपड़ों के एक्सपोर्ट पर पहले लगने वाले लगभग 12% टैरिफ को हटाता है, जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे प्रतिस्पर्धियों के बराबर मौका मिलता है।बैंक ऑफ़ बड़ौदा रिसर्च का अनुमान है कि अगले पांच सालों में इस सेक्टर से एक्सपोर्ट $2.1 बिलियन से बढ़कर $3.1 बिलियन हो सकता है। कंपनी की जानकारी के अनुसार, UK में अच्छी मौजूदगी वाली लिस्टेड कंपनियों में गोकलदास एक्सपोर्ट्स, KPR मिल और वेलस्पन लिविंग शामिल हैं।लेदर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी फ़ायदारिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के कुल एक्सपोर्ट का लगभग 99% हिस्सा अब UK में बिना टैरिफ के भेजा जा सकेगा। इससे टेक्सटाइल और लेदर जैसे ज़्यादा लेबर वाले सेक्टर के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग सामान जैसे मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ने की उम्मीद है।इंपोर्ट के मामले में, भारत ने टैरिफ कम करने के लिए चरणबद्ध तरीका अपनाया है, साथ ही डेयरी, कृषि, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे संवेदनशील सेक्टर को सुरक्षा देना जारी रखा है।बैंक ऑफ़ बड़ौदा रिसर्च के अनुसार, इस एग्रीमेंट से भारत की एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धात्मकता मज़बूत होने की उम्मीद है, खासकर MSME और ज़्यादा लेबर वाले उद्योगों के लिए, साथ ही अगले पांच सालों में UK के साथ बड़े ट्रेड सरप्लस को बढ़ावा मिलेगा।और पढ़ें :- कमजोर मानसून से खरीफ फसलों पर संकट, महाराष्ट्र में बुआई धीमी

कमजोर मानसून से खरीफ फसलों पर संकट, महाराष्ट्र में बुआई धीमी

बारिश की कमी से कई राज्यों में खरीफ फसल पर संकट, महाराष्ट्र में बुआई घटी, गुजरात-तेलंगाना के किसान चिंतितदेश के कई राज्यों में मानसून की सुस्त रफ्तार और लंबे ड्राई स्पेल ने खरीफ फसलों पर संकट खड़ा कर दिया है। तेलंगाना, महाराष्ट्र और गुजरात के किसानों को कपास, सोयाबीन, मूंगफली और अन्य खरीफ फसलों के नुकसान की चिंता सताने लगी है। लगातार बारिश नहीं होने से खेतों में नमी तेजी से घट रही है, जिससे फसलों की बढ़वार प्रभावित हो रही है और किसानों की लागत बढ़ने का खतरा भी बढ़ गया है। तेलंगाना के आदिलाबाद जिले में किसानों का कहना है कि मानसून देर से पहुंचने और जुलाई में लंबे समय तक बारिश नहीं होने से कपास, सोयाबीन और लाल चने की फसलों की ग्रोथ रुक गई है। हल्की बूंदाबांदी होने के बावजूद खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बन पाई है। जैनद मंडल के अडा गांव के किसान मोरा किष्टू ने बताया कि जून के आखिर में शुरुआती बारिश के बाद उन्होंने 20 एकड़ में कपास की बुआई की थी, लेकिन अब अच्छी पैदावार के लिए समय पर बारिश बेहद जरूरी है। जिले में इस खरीफ सीजन में करीब 4.25 लाख एकड़ में कपास की खेती हुई है, लेकिन सूखे जैसे हालात से किसानों की चिंता बढ़ गई है।महाराष्ट्र में भी अल नीनो के असर और कमजोर मानसून के कारण खरीफ बुआई की रफ्तार धीमी पड़ गई है। कृषि विभाग के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक राज्य के 144.36 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में केवल 86.92 लाख हेक्टेयर यानी 60 प्रतिशत क्षेत्र में ही बुआई हो सकी है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 84 प्रतिशत था। कई इलाकों में बारिश की कमी से किसानों को दोबारा बुआई करनी पड़ रही है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है। राज्य में सबसे अधिक बुआई सोयाबीन और कपास की हुई है, जबकि मराठवाड़ा, विदर्भ और कोंकण सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। गुजरात के भावनगर जिले के जेसर और आसपास के गांवों में भी पिछले 15 से 20 दिनों से पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। शुरुआती अच्छी बारिश के बाद किसानों ने कपास और मूंगफली की बुआई पूरी कर ली थी, लेकिन अब खेतों में नमी की कमी से पौधे सूखने लगे हैं। जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा नहीं है, वे सबसे अधिक प्रभावित हैं। किसानों का कहना है कि यदि अगले चार-पांच दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो कपास और मूंगफली की फसलों को भारी नुकसान हो सकता है। तीनों राज्यों के किसान अब समय पर अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि आने वाले दिनों की वर्षा ही खरीफ फसलों की स्थिति तय करेगी।और पढ़ें :- अल नीनो का असर: करीमनगर में किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने की सलाह

अल नीनो का असर: करीमनगर में किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने की सलाह

एल नीनो का असर: करीमनगर में किसानों को धान छोड़ कम पानी वाली फसलें अपनाने की सलाहकरीमनगर: तेलंगाना के करीमनगर जिले में कमजोर मानसून और एल नीनो के प्रभाव के कारण कृषि विभाग ने खरीफ सीजन में किसानों को धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों की जगह कम पानी वाली फसलें अपनाने की सलाह दी है। सिंचाई के लिए पानी की कमी को देखते हुए जिला प्रशासन ने कंटिंजेंसी प्लान लागू किया है, ताकि किसानों का नुकसान कम किया जा सके। जिला कृषि अधिकारी जे. भाग्यलक्ष्मी ने बताया कि विभागीय सर्वे में सिंचाई की गंभीर कमी सामने आई है। किसानों से अरहर, मूंग, लोबिया और सूरजमुखी जैसी कम पानी में तैयार होने वाली फसलें बोने की अपील की गई है। सिंचाई विभाग के अनुसार लोअर मनेयर डैम में फिलहाल 5.568 टीएमसीएफटी पानी उपलब्ध है, जबकि इसकी कुल क्षमता 24.034 टीएमसीएफटी है। यह जल भंडार अगले 90 दिनों तक मुख्य रूप से पेयजल जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा जाएगा।करीमनगर में लगभग 1.57 लाख एकड़ कृषि भूमि होने के बावजूद पानी की कमी के चलते 15 जुलाई तक बड़े क्षेत्र में बुआई प्रभावित रही। जिला कलेक्टर चित्रा मिश्रा ने कृषि और सिंचाई विभाग के अधिकारियों को वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने और आपातकालीन कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, राजन्ना-सिरसिला जिले में भी एल नीनो का असर साफ दिखाई दे रहा है। सामान्य 2.45 लाख एकड़ के मुकाबले अब तक केवल 93 हजार एकड़ में ही बुआई हो सकी है, जिससे जिले की कृषि गतिविधियां करीब 40 प्रतिशत प्रभावित हुई हैं।और पढ़ें :- बारिश की कमी से पैठण-पाचोड़ में खरीफ फसलों पर संकट

बारिश की कमी से पैठण-पाचोड़ में खरीफ फसलों पर संकट

बारिश की कमी से पाचोड-पैठण में खरीफ फसलें संकट मेंपाचोड (महाराष्ट्र): पिछले तीन सप्ताह से बारिश नहीं होने के कारण पाचोड और पैठण तालुका में खरीफ की फसलें गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। पर्याप्त वर्षा के अभाव में फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं। छोटे-छोटे पौधे तेज़ धूप और गर्मी के कारण झुलस रहे हैं, जिससे किसानों के सामने दोबारा बुवाई का संकट खड़ा हो गया है।करीब दस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इस वर्ष मानसून लगभग एक महीने की देरी से सक्रिय हुआ, जिसके कारण खेती योग्य भूमि के केवल आधे हिस्से में ही खरीफ की बुवाई हो सकी। किसानों ने उधार लेकर या अपनी सीमित बचत का उपयोग कर बीजों की व्यवस्था की और पैठण तालुका के दस राजस्व मंडलों में लगभग 63,000 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई पूरी की। शुरुआती बारिश के बाद बीजों का अंकुरण अच्छा हुआ और फसलों की बढ़वार भी संतोषजनक रही। हालांकि, जैसे ही किसानों ने निराई-गुड़ाई जैसे कृषि कार्य पूरे किए, बारिश अचानक थम गई।लगातार बारिश नहीं होने से मिट्टी की नमी तेजी से कम हो रही है। इसका असर कपास, बाजरा और मूंग जैसी खरीफ फसलों पर साफ दिखाई दे रहा है। नमी की कमी के कारण फसलों पर कीटों का प्रकोप भी बढ़ गया है और खेतों में पौधे मुरझाने लगे हैं।फसलों को बचाने के लिए किसान हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। कुछ किसान छोटे बर्तनों से पौधों को हाथ से पानी दे रहे हैं, जबकि अन्य किसान अपने कुओं में बचे सीमित पानी का उपयोग ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से कर रहे हैं। यदि जल्द ही अच्छी बारिश नहीं हुई, तो किसानों को दोबारा बुवाई करने की नौबत आ सकती है, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका है।और पढ़ें :- CCI ने 2025-26 सीजन में 85.04 लाख कपास गांठें बेचीं, राज्यवार विवरण

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