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कर्नाटक में कमजोर मानसून से खरीफ फसलों और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ा संकट

कर्नाटक की खेती को मानसून की अनिश्चितता से बचाने की चुनौतीमानसून में आई भारी कमी ने कर्नाटक के किसानों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिसका असर राष्ट्रीय स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है। जुलाई के पहले सप्ताह तक खरीफ़ फसलों की बुआई निर्धारित लक्ष्य के केवल एक-तिहाई हिस्से तक ही पहुंच पाई थी। जून से अक्टूबर तक चलने वाले इस कृषि मौसम में किसान आमतौर पर धान, मक्का, रागी, ज्वार और बाजरा जैसे अनाज; अरहर और अन्य दालें; मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन और नाइजर बीज जैसे तिलहन; तथा कपास, गन्ना, तंबाकू और लाल मिर्च जैसी नकदी फसलें उगाते हैं।इन फसलों का उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। राजस्थान के बाद कर्नाटक में देश का सबसे बड़ा शुष्क कृषि क्षेत्र है और राज्य की लगभग 84.79 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बारिश पर आधारित है। इस कारण वर्षा में किसी भी तरह की कमी सीधे कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है। इस वर्ष अल-नीनो प्रभाव के कारण वर्षा में भारी कमी दर्ज की गई है। मलनाड क्षेत्र, तटीय कर्नाटक, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक और दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में वर्षा की कमी क्रमशः 34 प्रतिशत, 30 प्रतिशत, 24 प्रतिशत और 18 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।इस संकट का प्रभाव केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य देश में मोटे अनाज के प्रमुख उत्पादकों में शामिल है और अरहर दाल की खेती के लिए सबसे अधिक क्षेत्रफल भी यहीं है। इसलिए कर्नाटक के कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट का असर देशभर में खाद्यान्न आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।इस प्राकृतिक संकट के साथ मानवीय चुनौती भी बढ़ रही है। कर्नाटक की लगभग 1.37 करोड़ आबादी, यानी राज्य के हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति की आजीविका कृषि पर निर्भर है। ऐसे हालात में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्थिति का आकलन करने और राहत उपायों के लिए केंद्रीय टीम भेजने का आग्रह किया है।केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता आवश्यक है, लेकिन कर्नाटक को इस संकट से एक दीर्घकालिक सबक भी लेना होगा। राज्य की खेती लंबे समय से मानसून की अनिश्चितता पर निर्भर रही है। अब आवश्यकता है कि सरकार केवल शहरी विकास, विशेषकर बड़े शहरों की परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय कृषि क्षेत्र की जल सुरक्षा को प्राथमिकता दे।इसके लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, जल संरक्षण उपायों को मजबूत करना, सूखा-सहने वाली फसलों को बढ़ावा देना, नहर नेटवर्क का विस्तार, भूजल पुनर्भरण में सुधार और आधुनिक सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल जरूरी है। लक्ष्य केवल मौजूदा संकट से निपटना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए जो किसानों को मानसून की अनिश्चितताओं से दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान कर सके।कृषि को प्राकृतिक अनिश्चितताओं का शिकार बनने से रोकना केवल कर्नाटक की जरूरत नहीं है, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।और पढ़ें :- गुजरात और महाराष्ट्र में धीमी बुआई से भारत में कपास का रकबा लगभग 15% घटा

गुजरात और महाराष्ट्र में धीमी बुआई से भारत में कपास का रकबा लगभग 15% घटा

गुजरात और महाराष्ट्र में धीमी बुआई से भारत में कपास का रकबा करीब 15% घटाभारत में 2026 खरीफ सीजन के शुरुआती चरण में कपास की बुआई पिछले साल की तुलना में काफी पीछे चल रही है। मॉनसून में देरी और क्षेत्रीय मौसम परिस्थितियों के कारण प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में बुआई की गति प्रभावित हुई है। 10 जुलाई 2026 तक देश में 79.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुआई दर्ज की गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 93.95 लाख हेक्टेयर था। इस तरह कपास का रकबा 14.41 लाख हेक्टेयर या करीब 15.3% कम रहा है।बुआई में सबसे बड़ी गिरावट गुजरात और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में देखी गई है। महाराष्ट्र में इस सीजन अब तक 30.07 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुआई हुई है, जो पिछले वर्ष के 35.46 लाख हेक्टेयर से 5.39 लाख हेक्टेयर कम है। विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे प्रमुख कपास क्षेत्रों में देर से हुई बारिश के कारण किसानों की बुआई गतिविधियां प्रभावित हुई हैं।गुजरात में गिरावट और अधिक रही। राज्य में कपास का रकबा पिछले साल के 17.11 लाख हेक्टेयर से घटकर 9.32 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 7.79 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। गुजरात और महाराष्ट्र मिलकर देश में कपास के कुल रकबे में आई लगभग 13.2 लाख हेक्टेयर की कमी के लिए जिम्मेदार हैं।इसके विपरीत, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कपास की बुआई में सुधार देखने को मिला है। तेलंगाना में कपास का रकबा पिछले साल की तुलना में 1.96 लाख हेक्टेयर बढ़कर 15.96 लाख हेक्टेयर हो गया है। अच्छी बारिश और समय पर कृषि कार्य शुरू होने से राज्य में बुआई को गति मिली है। आंध्र प्रदेश में भी कपास का रकबा 0.78 लाख हेक्टेयर बढ़कर 2.40 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है।अन्य प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में बुआई पिछले साल के स्तर से नीचे बनी हुई है। राजस्थान में 1.28 लाख हेक्टेयर, हरियाणा में 0.90 लाख हेक्टेयर, ओडिशा में 0.66 लाख हेक्टेयर, कर्नाटक में 0.59 लाख हेक्टेयर और पंजाब में 0.43 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। मध्य प्रदेश में कपास का रकबा लगभग स्थिर रहा, जबकि तमिलनाडु में भी पिछले वर्ष के मुकाबले कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।2026 खरीफ सीजन के लिए कपास का राष्ट्रीय लक्ष्य 116.12 लाख हेक्टेयर रखा गया है, लेकिन 10 जुलाई तक केवल 79.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुआई हो पाई है। हालांकि कपास की बुआई जुलाई और अगस्त की शुरुआत तक जारी रहती है, इसलिए आने वाले हफ्तों में बेहतर मॉनसून से रकबे में सुधार की संभावना बनी हुई है।यदि बुआई में कमी बनी रहती है, तो आगामी विपणन सीजन में कच्चे कपास की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका असर घरेलू टेक्सटाइल उद्योग, कपास निर्यात और फाइबर कीमतों पर पड़ सकता है। वैश्विक कपास बाजार भी मौसम संबंधी आपूर्ति जोखिमों को लेकर संवेदनशील बने हुए हैं, ऐसे में भारत की उत्पादन स्थिति पर बाजार की नजर बनी रहेगी।और पढ़ें :- गुजरात–महाराष्ट्र में बारिश की देरी से कपास की फसल पर संकट, किसानों को दोबारा बुवाई का डर

गुजरात–महाराष्ट्र में बारिश की देरी से कपास की फसल पर संकट, किसानों को दोबारा बुवाई का डर

गुजरात–महाराष्ट्र: बारिश में देरी से कपास की फसल पर संकट, किसानों पर दोबारा बुवाई का खतरागुजरात के छोटाउदेपुर जिले के बोदेली तालुका के सेगवा-सिमली गांव और महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शेवगांव तालुका में समय पर बारिश नहीं होने से कपास उत्पादक किसानों की चिंता बढ़ गई है। शुरुआती बारिश के बाद किसानों ने कपास की बुवाई पूरी कर ली थी और खेतों में पौधे निकल आए थे। लेकिन पिछले कई दिनों से बारिश नहीं होने के कारण मिट्टी की नमी कम होने लगी है, जिससे फसल की बढ़वार प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।दोनों क्षेत्रों में कपास प्रमुख खरीफ फसल है और बड़ी संख्या में किसान इस पर निर्भर हैं। किसानों ने बीज, उर्वरक, मजदूरी और खेत की तैयारी पर हजारों रुपये खर्च किए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि मानसून समय पर आगे बढ़ेगा, लेकिन बारिश रुकने से उनकी चिंता बढ़ गई है। लगातार सूखे मौसम के कारण कई खेतों में कपास के पौधों की वृद्धि धीमी पड़ रही है। कुछ स्थानों पर पौधों के मुरझाने और सूखने की स्थिति भी देखने को मिल रही है।महाराष्ट्र के शेवगांव तालुका में पिछले 15 दिनों से बारिश नहीं होने के कारण किसानों को दोबारा बुवाई का डर सताने लगा है। किसान यलप्पा कुसलकर ने बताया कि उन्होंने तीन एकड़ में कपास की खेती पर काफी खर्च किया है, लेकिन बारिश के अभाव में फसल प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो किसानों को दोबारा बीज और अन्य कृषि सामग्री खरीदने पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा।गुजरात के सेगवा-सिमली और आसपास के क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि कपास के शुरुआती विकास के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी जरूरी है। बारिश में और देरी होने पर पौधों की वृद्धि रुक सकती है और कुछ खेतों में दोबारा बुवाई की स्थिति बन सकती है। इससे किसानों की लागत बढ़ने के साथ उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों की नियमित निगरानी करें और मौसम की स्थिति के अनुसार कृषि प्रबंधन अपनाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश हो जाती है, तो कपास की फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। लेकिन बारिश में अधिक देरी होने पर उत्पादन में कमी और आर्थिक नुकसान की संभावना बढ़ सकती है।फिलहाल गुजरात और महाराष्ट्र के कपास उत्पादक किसान अच्छी मानसूनी बारिश का इंतजार कर रहे हैं, ताकि फसल को आवश्यक नमी मिल सके और उनकी मेहनत सफल हो सके।और पढ़ें :- महाराष्ट्र के दिग्रस स्पिनिंग मिल से चीन को पहली कॉटन यार्न खेप रवाना, विदर्भ को वैश्विक पहचान

महाराष्ट्र के दिग्रस स्पिनिंग मिल से चीन को पहली कॉटन यार्न खेप रवाना, विदर्भ को वैश्विक पहचान

महाराष्ट्र: डिग्रस स्पिनिंग मिल ने चीन को भेजा पहला कॉटन यार्न, विदर्भ की कपास उद्योग को मिली वैश्विक पहचानमहाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की 'रामदास अठावले बैकवर्ड क्लास कॉटन ग्रोअर्स कोऑपरेटिव स्पिनिंग मिल' ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश करते हुए चीन को कॉटन यार्न का पहला निर्यात किया है। डिग्रस स्थित इस सहकारी स्पिनिंग मिल में तैयार उच्च गुणवत्ता वाले यार्न को चीनी बाजार में स्वीकृति मिलने के बाद पहला कंटेनर समुद्री मार्ग से रवाना किया गया। इसे विदर्भ की कपास प्रसंस्करण उद्योग और स्थानीय किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।वर्ष 2019 में पंजीकृत इस सहकारी स्पिनिंग मिल ने 2025 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। कम समय में ही इसने उच्च गुणवत्ता वाले यार्न के उत्पादन के दम पर राज्य की प्रमुख सहकारी स्पिनिंग मिलों में अपनी पहचान बना ली है। संस्था का दावा है कि पिछले एक दशक में पंजीकृत सहकारी स्पिनिंग मिलों में यह ऐसी पहली इकाई है जिसने सफलतापूर्वक उत्पादन शुरू कर बाजार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।निर्यात से पहले चीन के विशेषज्ञों की एक टीम ने मिल में तैयार यार्न की गुणवत्ता का विस्तृत तकनीकी परीक्षण किया। सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के बाद ही चीन के बाजार में इसके निर्यात को मंजूरी मिली। मिल के संस्थापक-अध्यक्ष मिलिंद मानकर ने बताया कि डिग्रस में तैयार यार्न को अब अन्य देशों से भी मांग मिलने लगी है, जिससे भविष्य में निर्यात बढ़ने की संभावना है।मिल के अध्यक्ष महेंद्र मानकर के अनुसार, आधुनिक स्वचालित मशीनरी, अनुभवी तकनीकी टीम, कुशल प्रबंधन और कर्मचारियों की मेहनत के कारण अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता का यार्न तैयार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि कोविड-19 महामारी जैसी चुनौतियों के बावजूद परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा किया गया और उत्पादन शुरू किया गया।मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले और संरक्षक मंत्री संजय राठौड़ के सहयोग से यह परियोजना शुरू हो सकी। पहले निर्यात कंटेनर को रवाना करने से पहले मिल परिसर में विधिवत पूजा-अर्चना की गई, जिसमें निदेशक मंडल, अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।मिल ने पिछले 18 महीनों में लगभग 5,500 टन कॉटन यार्न का उत्पादन किया है। इसकी स्वीकृत क्षमता 25,000 स्पिंडल की है, जिनमें से वर्तमान में 16,500 स्पिंडल संचालित हैं। मिल में प्रतिदिन 10 से 12 टन यार्न तैयार किया जा रहा है। प्रबंधन का मानना है कि चीन को पहला निर्यात भविष्य में नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए रास्ता खोलेगा और इससे विदर्भ के कपास उत्पादक किसानों के साथ-साथ क्षेत्र के वस्त्र उद्योग को भी दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।और पढ़ें :- CCI ने कॉटन कैंडी के दाम ₹800 बढ़ाए, साप्ताहिक नीलामी 3.18 लाख गांठ पर पहुंची

CCI ने कॉटन कैंडी के दाम ₹800 बढ़ाए, साप्ताहिक नीलामी 3.18 लाख गांठ पर पहुंची

CCI ने कॉटन कैंडी की कीमतें ₹800 बढ़ाईं; साप्ताहिक नीलामी 3.18 लाख गांठों तक पहुंचीकॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (CCI) ने 17 जुलाई, 2026 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान अपनी कपास की बिक्री कीमतों में ₹800 प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। नीलामी में टेक्सटाइल मिलों और कपास व्यापारियों की ज़बरदस्त भागीदारी देखी गई, जिसके परिणामस्वरूप 2025–26 फसल सीज़न से कुल साप्ताहिक बिक्री लगभग 3,18,000 गांठों की रही।साप्ताहिक बिक्री रिपोर्ट13 जुलाई, 2026 (सोमवार):सप्ताह की शुरुआत ज़बरदस्त रही, जिसमें नीलामी में सबसे ज़्यादा 1,31,100 गांठों की बिक्री हुई। मिलों ने 48,500 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 82,600 गांठें उठाईं।14 जुलाई, 2026 (मंगलवार):CCI की नीलामी बिक्री 1,13,600 गांठों की रही। मिलों ने 44,200 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 69,400 गांठें उठाईं।15 जुलाई, 2026 (बुधवार):नीलामी की गतिविधि धीमी रही, जिसमें कुल बिक्री 29,100 गांठों की हुई। मिलों ने 15,600 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 13,500 गांठें खरीदीं।16 जुलाई, 2026 (गुरुवार):CCI ने दिन के दौरान कुल 40,700 गांठों की बिक्री दर्ज की। मिलों ने 6,100 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 34,600 गांठें उठाईं।17 जुलाई, 2026 (शुक्रवार):सप्ताह का समापन 3,500 गांठों की बिक्री के साथ हुआ। मिलों ने 1,500 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 2,000 गांठें खरीदीं।कुल बिक्री का अपडेटताज़ा नीलामी के साथ, 2025–26 सीज़न के लिए CCI की कुल कपास बिक्री 85,04,800 गांठों तक पहुँच गई है।और पढ़ें :- वैश्विक कपास रैली पर ब्राज़ील के बढ़ते उत्पादन की चुनौती, 2027 पर टिकी नजर

वैश्विक कपास रैली पर ब्राज़ील के बढ़ते उत्पादन की चुनौती, 2027 पर टिकी नजर

ग्लोबल कॉटन रैली के सामने ब्राज़ील की चुनौती: ज़्यादा कीमतों से बढ़ सकता है उत्पादनदो साल तक कम रिटर्न मिलने के बाद अब ग्लोबल कॉटन की कीमतों में सुधार हो रहा है। इसकी वजह है प्रमुख एक्सपोर्ट करने वाले देशों में उत्पादन में एक साथ कमी आना, जिससे सप्लाई कम हुई है और इम्पोर्ट की बेहतर मांग से मार्केट का सेंटीमेंट भी सुधरा है। हालांकि 2026 की दूसरी छमाही के लिए आउटलुक अच्छा बना हुआ है, लेकिन एनालिस्ट का कहना है कि अगला सप्लाई साइकिल—खासकर ब्राज़ील में—यह तय कर सकता है कि यह तेज़ी बनी रहेगी या नहीं।स्टोनएक्स ब्राज़ील के मार्केट इंटेलिजेंस एनालिस्ट राफेल बुलास्कोशी ने कहा कि मौजूदा मार्केट को प्रमुख एक्सपोर्टर्स के यहां उत्पादन घटने से फायदा हो रहा है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि अब ध्यान 2027 के फसल चक्र की ओर जा रहा है। उन्होंने कहा, "2026 की दूसरी छमाही के लिए स्थिति अच्छी है," साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ज़्यादा कीमतों के लंबे समय तक बने रहने को लेकर सवाल अभी भी हैं।दुनिया के सबसे बड़े कॉटन एक्सपोर्टर, ब्राज़ील की भविष्य की सप्लाई तय करने में अहम भूमिका होने की उम्मीद है। बुलास्कोशी के अनुसार, बेहतर मुनाफे के कारण कॉटन, दूसरी फसल वाली मक्का (कॉर्न) की तुलना में ज़्यादा आकर्षक विकल्प बन गया है। अगर मौजूदा कीमतों से मिलने वाला प्रोत्साहन जारी रहता है, तो किसान कॉटन की खेती का दायरा बढ़ा सकते हैं। ब्राज़ील में ज़्यादा उत्पादन से धीरे-धीरे मौजूदा कम ग्लोबल सप्लाई की भरपाई हो सकती है और मार्केट की स्थिति बदल सकती है।जैसे-जैसे ट्रेडर्स मौजूदा इन्वेंट्री के बजाय दक्षिणी गोलार्ध में बुवाई के फैसलों पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं, ब्राज़ील का उत्पादन ग्लोबल कॉटन मार्केट के लिए एक अहम फैक्टर बनकर उभर रहा है। खेती के रकबे में बड़ी बढ़ोतरी से 2027 में सप्लाई से जुड़ी चिंताएं कम हो सकती हैं, जबकि सीमित बढ़ोतरी से मार्केट को लंबे समय तक सहारा मिल सकता है।और पढ़ें :- रुपया 01 पैसे मजबूत होकर US डॉलर के मुकाबले 96.28 पर बंद हुआ

ICAR-SBI 2030 तक पिंक बॉलवर्म-रोधी नए जीन वाली कपास के बीज करेगा व्यावसायिक

पिंक बॉलवर्म से लड़ने वाले नए जीन को व्यावसायिक रूप देने की तैयारी में ICAR-SBIकोयंबटूर स्थित ICAR-शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट (ICAR-SBI) ने पिंक बॉलवर्म के खिलाफ प्रभावी नए क्रिस्टल टॉक्सिन जीन की खोज के बाद इसे व्यावसायिक रूप देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। संस्थान पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत वर्ष 2030 तक ट्रांसजेनिक कॉटन हाइब्रिड विकसित कर किसानों के लिए व्यावसायिक बीज उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रहा है।पिंक बॉलवर्म भारत में बोलगार्ड II (Bollgard II) कपास की खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है। इसे देखते हुए, कपास उत्पादन बढ़ाने और खेती के रकबे में गिरावट रोकने के उद्देश्य से ICAR-SBI के वैज्ञानिकों ने 15 वर्षों से अधिक के शोध के बाद बैसिलस थुरिंगिएंसिस (Bacillus thuringiensis) के नए क्रिस्टल टॉक्सिन जीन को सफलतापूर्वक अलग किया है।संस्थान के निदेशक पी. गोविंदराज ने बताया कि खोजे गए नए जीनों में से एक पिंक बॉलवर्म की उन आबादियों के खिलाफ भी प्रभावी पाया गया है, जिन्होंने बोलगार्ड II तकनीक के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। उनका कहना है कि यह खोज भविष्य में अधिक टिकाऊ और कीट-प्रतिरोधी कपास किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक बी. सिंगरावेलु ने कहा कि इस हाई-वैल्यू तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी की जाएगी, ताकि शोध को तेजी से किसानों तक पहुंचाया जा सके।इसी दिशा में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में नई दिल्ली में ICAR-SBI और रासी सीड्स के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) का आदान-प्रदान किया गया। इस साझेदारी का उद्देश्य नई तकनीक पर आधारित ट्रांसजेनिक कपास हाइब्रिड विकसित कर उसे व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध कराना है।और पढ़ें :- 2026 में अमेरिका से कपास का बड़ा खरीदार बन सकता है भारत, USDA का अनुमान

2026 में अमेरिका से कपास का बड़ा खरीदार बन सकता है भारत, USDA का अनुमान

इस साल भारत, अमेरिकी कपास का अहम खरीदार बन सकता हैअमेरिका को उम्मीद है कि 2026 में भारत उसकी कपास का एक प्रमुख आयातक बनकर उभरेगा। नेशनल कॉटन काउंसिल ऑफ अमेरिका के प्रेसिडेंट और CEO गैरी एडम्स ने कहा कि भारत इस समय अमेरिकी कपास के लिए चौथे सबसे बड़े बाज़ार की दौड़ में है। उनका मानना है कि भारत में कपास की खेती का रकबा घटने और मानसून को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण आयात की मांग और बढ़ सकती है।अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट Cotton: World Markets and Trade में भारत के 2025-26 सीज़न के कपास आयात का अनुमान बढ़ाकर 56.9 लाख गांठ कर दिया है, जो पहले 53.18 लाख गांठ था। वहीं, कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) ने 60–65 लाख गांठ आयात का अनुमान जताया है। सरकार द्वारा लॉन्ग स्टेपल कॉटन पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क अस्थायी रूप से हटाने से भी आयात को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।एडम्स ने बताया कि पिछले वर्ष अमेरिकी कपास का सबसे बड़ा खरीदार वियतनाम रहा, जबकि बांग्लादेश का टेक्सटाइल उद्योग भी मजबूत मांग बनाए हुए है। इसके विपरीत, अमेरिका-चीन व्यापारिक तनाव के कारण चीन में अमेरिकी कपास की मांग कमजोर रही है।USDA का अनुमान है कि 2026-27 सीज़न में वैश्विक कपास की खपत 1.5 से 2 प्रतिशत बढ़ सकती है। हालांकि, ऊर्जा और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें उद्योग के लिए चिंता का विषय हैं। ऊंचे तेल दामों से सिंथेटिक फाइबर महंगे हुए हैं, जिससे प्राकृतिक रेशों, विशेषकर कपास, की मांग को समर्थन मिला है।एडम्स ने कहा कि अमेरिका में पिछले दो से तीन वर्षों में उर्वरक, ईंधन, रसायन और श्रम की बढ़ती लागत के कारण कपास उत्पादन की लागत करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई है। साथ ही, अमेरिकी कॉटन बेल्ट में सूखे की स्थिति भी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।उन्होंने कहा कि माइक्रोप्लास्टिक को लेकर बढ़ती जागरूकता के कारण उपभोक्ता प्राकृतिक रेशों की ओर लौट रहे हैं। अमेरिका और भारत के बीच कपास एवं टेक्सटाइल क्षेत्र में सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं और दोनों देशों के बीच व्यापार आने वाले वर्षों में और मजबूत होने की उम्मीद है।और पढ़ें :- रुपया 6 पैसे की बढ़त के साथ 96.29 पर खुला

भारत टेक्स 2026 में आंध्र प्रदेश को ₹4,100 करोड़ के टेक्सटाइल निवेश प्रस्ताव मिले

आंध्र प्रदेश ने 'भारत टेक्स 2026' में टेक्सटाइल सेक्टर के लिए ₹4,100 करोड़ के निवेश का वादा हासिल कियानई दिल्ली: आंध्र प्रदेश ने 'भारत टेक्स 2026' में टेक्सटाइल प्रोजेक्ट्स के लिए ₹4,100 करोड़ तक के निवेश का वादा हासिल किया है। नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इस इवेंट के दूसरे दिन दो समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए।ये समझौते आंध्र प्रदेश के हथकरघा और टेक्सटाइल कमिश्नर जी. रेखा रानी की देखरेख में किए गए। यह राज्य सरकार की निवेश आकर्षित करने और टेक्सटाइल व कपड़ों के उद्योग को मजबूत करने की कोशिशों का हिस्सा है।इनमें से एक समझौते के तहत विशाखापत्तनम में ₹4,000 करोड़ तक के निवेश से एक सस्टेनेबल टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग सुविधा स्थापित करने का प्रस्ताव है। दूसरे समझौते में ₹100 करोड़ के निवेश से गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की बात है। इस यूनिट से लगभग 3,000 लोगों को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलने की उम्मीद है।इस बीच, केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्री गिरिराज सिंह ने 'लेपाक्षी हैंडीक्राफ्ट्स' स्टाल का उद्घाटन किया। इस स्टाल में आंध्र प्रदेश की समृद्ध हथकरघा विरासत, हस्तशिल्प, टेक्सटाइल क्षमता और निवेश की संभावनाओं को दिखाया गया है। केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्रालय द्वारा आयोजित 'भारत टेक्स 2026' इवेंट 17 जुलाई तक चलेगा।राज्यसभा सदस्य वी. विजयेन्द्र प्रसाद ने आंध्र प्रदेश पवेलियन का दौरा किया और कहा कि राज्य के हथकरघा सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में काफी संभावनाएं हैं। उन्होंने वर्चुअल रियलिटी (VR) जैसी नई तकनीकों को अपनाने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि कुशल बुनकर सीधे ग्लोबल खरीदारों से जुड़ सकें।उन्होंने विदेशों में रहने वाले भारतीयों और विदेशी ग्राहकों, खासकर अमेरिका में, असली हाथ से बने और सांस्कृतिक रूप से जुड़े उत्पादों की बढ़ती मांग का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश हथकरघा और टेक्सटाइल उत्पादों के लिए एक प्रमुख ग्लोबल सोर्सिंग हब बनने की अच्छी स्थिति में है।लेपाक्षी हैंडीक्राफ्ट्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन पसुपुलेटी हरि प्रसाद ने आंध्र प्रदेश की पारंपरिक हथकरघा विरासत को उसके आधुनिक टेक्सटाइल और कपड़ों के उद्योग के साथ पेश करने के लिए हथकरघा और टेक्सटाइल विभाग की तारीफ की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में राज्य सरकार निवेश-अनुकूल नीतियों और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के जरिए सेक्टर की ग्रोथ को तेज करने के लिए प्रतिबद्ध है। हॉल नंबर 9 में आंध्र प्रदेश पवेलियन में हैंडलूम, टेक्सटाइल, कपड़े और गारमेंट के प्रोडक्ट दिखाए गए हैं। साथ ही, गुंटूर टेक्सटाइल पार्क, तारकेश्वर टेक्सटाइल पार्क, हरीश फैशन्स, APCO और मैजिक वीव्स जैसे संगठनों और टेक्सटाइल पार्कों से GI-टैग वाले और 'एक ज़िला एक उत्पाद' (ODOP) वाले आइटम भी शामिल हैं।अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के प्रतिनिधियों ने भी टेक्सटाइल MSME के लिए एक्सपोर्ट के बारे में जागरूकता और क्षमता-निर्माण कार्यक्रमों में सहयोग करने में दिलचस्पी दिखाई।अधिकारियों ने कहा कि 'भारत टेक्स 2026' में राज्य की भागीदारी से नया निवेश आने, एक्सपोर्ट के संबंध मजबूत होने और ग्लोबल मार्केट तक पहुंच बढ़ने की उम्मीद है। आंध्र प्रदेश में 15,000 से ज़्यादा टेक्सटाइल MSME, 140 से ज़्यादा बड़ी टेक्सटाइल यूनिट और लगभग 35,000 पावर लूम हैं, और टेक्सटाइल एक्सपोर्ट की वैल्यू लगभग 444 मिलियन अमेरिकी डॉलर है।और पढ़ें :- भारत-यूके व्यापार समझौता लागू, निर्यात को बढ़ावा और आयात होगा सस्ता

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कर्नाटक में कमजोर मानसून से खरीफ फसलों और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ा संकट 18-07-2026 13:49:56 view
गुजरात और महाराष्ट्र में धीमी बुआई से भारत में कपास का रकबा लगभग 15% घटा 18-07-2026 12:59:23 view
गुजरात–महाराष्ट्र में बारिश की देरी से कपास की फसल पर संकट, किसानों को दोबारा बुवाई का डर 18-07-2026 12:40:02 view
महाराष्ट्र के दिग्रस स्पिनिंग मिल से चीन को पहली कॉटन यार्न खेप रवाना, विदर्भ को वैश्विक पहचान 18-07-2026 12:29:23 view
CCI ने कॉटन कैंडी के दाम ₹800 बढ़ाए, साप्ताहिक नीलामी 3.18 लाख गांठ पर पहुंची 18-07-2026 11:30:22 view
वैश्विक कपास रैली पर ब्राज़ील के बढ़ते उत्पादन की चुनौती, 2027 पर टिकी नजर 17-07-2026 17:25:47 view
रुपया 01 पैसे मजबूत होकर US डॉलर के मुकाबले 96.28 पर बंद हुआ 17-07-2026 15:51:24 view
ICAR-SBI 2030 तक पिंक बॉलवर्म-रोधी नए जीन वाली कपास के बीज करेगा व्यावसायिक 17-07-2026 13:06:10 view
2026 में अमेरिका से कपास का बड़ा खरीदार बन सकता है भारत, USDA का अनुमान 17-07-2026 12:43:59 view
रुपया 6 पैसे की बढ़त के साथ 96.29 पर खुला 17-07-2026 11:08:08 view
भारत टेक्स 2026 में आंध्र प्रदेश को ₹4,100 करोड़ के टेक्सटाइल निवेश प्रस्ताव मिले 16-07-2026 18:00:41 view
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