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भारत-यूके व्यापार समझौता लागू, निर्यात को बढ़ावा और आयात होगा सस्ता

भारत-UK ट्रेड पैक्ट शुरू: सस्ता इंपोर्ट, एक्सपोर्ट के बड़े मौकेभारत और यूनाइटेड किंगडम ने आधिकारिक तौर पर अपने 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट' (CETA) को लागू कर दिया है, जो दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों में एक बड़ी उपलब्धि है। बुधवार से लागू हुए इस समझौते के तहत हज़ारों प्रोडक्ट्स पर टैरिफ (आयात शुल्क) खत्म या कम कर दिए गए हैं, जिससे कई सामान सस्ते हो गए हैं और दोनों देशों में बिज़नेस और प्रोफेशनल्स के लिए नए मौके खुले हैं।इस समझौते के तहत, UK ने लगभग सभी भारतीय एक्सपोर्ट पर ड्यूटी हटा दी है, जिससे टेक्सटाइल, लेदर, फुटवियर, समुद्री उत्पाद, रत्न और आभूषण, इंजीनियरिंग सामान, केमिकल और प्रोसेस्ड फूड जैसे सेक्टर को ब्रिटिश बाज़ार में ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिल गया है। उम्मीद है कि UK में भारतीय मसाले, फल और सब्ज़ियां भी ज़्यादा कॉम्पिटिटिव (प्रतिस्पर्धी) हो जाएंगी।भारतीय ग्राहकों के लिए, व्हिस्की, चॉकलेट, कॉस्मेटिक्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, लैंब (भेड़ का मांस), प्रीमियम गाड़ियां, मेडिकल डिवाइस और ऑप्टिकल इक्विपमेंट जैसे इंपोर्टेड ब्रिटिश प्रोडक्ट्स सस्ते हो जाएंगे क्योंकि टैरिफ को चरणों में कम किया जा रहा है।यह समझौता IT, फाइनेंशियल सर्विसेज़, हेल्थकेयर, एजुकेशन, इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी जैसे क्षेत्रों में मौकों को बढ़ाकर सर्विस सेक्टर में भी व्यापार को मज़बूत करता है। UK में कुछ समय के लिए काम करने वाले भारतीय प्रोफेशनल्स को पांच साल तक 'नेशनल इंश्योरेंस कंट्रीब्यूशन' देने से छूट मिलेगी।UK सरकार के अनुसार, भारत 90% टैरिफ लाइनों पर टैरिफ कम या खत्म करेगा, जबकि ब्रिटेन ने 96.8% टैरिफ लाइनों पर ड्यूटी हटा दी है, जो मौजूदा व्यापार का 97.7% हिस्सा हैं। हालांकि, पोल्ट्री, अंडे, चीनी और डेयरी जैसे संवेदनशील सेक्टर इस समझौते के दायरे से बाहर रखे गए हैं।उम्मीद है कि भारत-UK ट्रेड पैक्ट निवेश को बढ़ाएगा, बाज़ार तक पहुंच का विस्तार करेगा और आर्थिक सहयोग को मज़बूत करेगा, जिससे यह हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में से एक बन जाएगा।और पढ़ें :-अमेरिकी टैरिफ वार्ता और बढ़ती शिपिंग लागत से भारतीय टेक्सटाइल निर्यातकों पर दबाव

अमेरिकी टैरिफ वार्ता और बढ़ती शिपिंग लागत से भारतीय टेक्सटाइल निर्यातकों पर दबाव

US टैरिफ वार्ता और बढ़ती शिपिंग लागत से भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स के सामने चुनौतीभारतीय टेक्सटाइल और परिधान निर्यातक इस समय अमेरिका के साथ टैरिफ वार्ता और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। हालांकि मांग अभी स्थिर बनी हुई है, लेकिन व्यापार नीति को लेकर स्पष्टता आने तक वैश्विक खरीदार बड़े और लंबे समय के ऑर्डर देने से बच रहे हैं। इसके बजाय वे जोखिम कम करने के लिए छोटे और बार-बार ऑर्डर दे रहे हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों की परिचालन लागत और जटिलता बढ़ सकती है।अमेरिका के संभावित टैरिफ ढांचे पर इस महीने के अंत में होने वाली बातचीत को उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जब तक व्यापार नीति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक निवेशकों को खासतौर पर उन कंपनियों पर नजर रखनी होगी, जिनका अमेरिकी बाजार में कारोबार का बड़ा हिस्सा है।कपास की कीमतों में तेजी से मार्जिन पर दबावटेक्सटाइल उद्योग की लाभप्रदता में कच्चे माल की लागत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कुछ समय तक स्थिर रहने के बाद कपास की कीमतों में फिर तेजी देखी गई है। 14 जुलाई 2026 तक गुजरात में बेंचमार्क 29 मिमी कपास की स्पॉट कीमत करीब ₹65,000 प्रति कैंडी और 28 मिमी कपास की कीमत ₹64,200 प्रति कैंडी रही।अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (ICE) पर कपास वायदा कीमतों में तेजी आई है। जुलाई के दूसरे सप्ताह में कीमतों में 6% से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। कच्चे माल की कीमतों में लगातार वृद्धि और ग्राहकों पर बढ़ी लागत का बोझ डालने में असमर्थता से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।टेक्सटाइल सेक्टर के अलग-अलग सेगमेंट में कच्चे माल की निर्भरता भी अलग है। होम टेक्सटाइल कंपनियां मुख्य रूप से कपास पर निर्भर रहती हैं, जबकि परिधान निर्माता पॉलिएस्टर जैसे सिंथेटिक फाइबर पर अधिक निर्भर होते हैं। इसलिए कपास और पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कंपनियों पर अलग-अलग पड़ सकता है।भू-राजनीतिक तनाव से लॉजिस्टिक्स जोखिम बढ़ापश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव शिपिंग लागत और सप्लाई चेन को लेकर चिंता बढ़ा रहा है। क्षेत्रीय अस्थिरता से माल ढुलाई महंगी हो सकती है और डिलीवरी में देरी का जोखिम बढ़ सकता है। कुछ कंपनियां फ्री-ऑन-बोर्ड (FOB) शर्तों के जरिए लॉजिस्टिक्स लागत का एक हिस्सा खरीदारों पर डालती हैं, लेकिन पैकेजिंग और सिंथेटिक सामग्री की बढ़ती लागत का असर पूरे उद्योग पर पड़ सकता है।अमेरिका भारतीय टेक्सटाइल उत्पादों के लिए प्रमुख निर्यात बाजारों में से एक है और दोनों देशों के बीच टेक्सटाइल व्यापार करीब 10.5 अरब डॉलर का है। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिकी बाजार पर भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों की कुल निर्भरता सीमित है और यह कुल राजस्व का लगभग 8-10% है।UK और EU ट्रेड डील से उम्मीदआगे चलकर भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की नजर UK और EU के साथ संभावित व्यापार समझौतों पर है। इन समझौतों से भारतीय कंपनियों की बाजार पहुंच और लागत प्रतिस्पर्धा में सुधार हो सकता है। हालांकि, उद्योग प्रबंधन का मानना है कि इन पहलों का पूरा लाभ FY27 की चौथी तिमाही तक दिखाई दे सकता है।निवेशकों को आने वाले समय में निर्यात मात्रा, अमेरिकी टैरिफ वार्ता, कच्चे माल की कीमतों और लॉजिस्टिक्स लागत के साथ कंपनियों की प्रॉफिट मार्जिन बनाए रखने की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए।और पढ़ें :- अनियमित बारिश से पाचोरा में कपास, मक्का और सोयाबीन की फसल संकट में, किसान चिंतित

अनियमित बारिश से पाचोरा में कपास, मक्का और सोयाबीन की फसल संकट में, किसान चिंतित

पाचोरा में कपास, मक्का और सोयाबीन की फसलें संकट में, बारिश की अनिश्चितता से किसान परेशानपाचोरा (महाराष्ट्र), 16 जुलाई: महाराष्ट्र के जलगांव जिले के पाचोरा तालुका में बारिश की अनिश्चितता से कपास, मक्का और सोयाबीन की फसलें प्रभावित हो रही हैं। मृग नक्षत्र की शुरुआत में हुई बारिश के बाद लंबे समय तक बारिश नहीं होने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसानों को फसलों की वृद्धि रुकने और उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका है।पाचोरा तालुका में कपास प्रमुख नकदी फसल है। कई किसानों ने मई के मध्य से जून की शुरुआत के बीच उम्मीद के साथ कपास की बुआई की थी। हालांकि, शुरुआती बारिश के बाद बारिश का लंबा अंतराल पड़ने से फसलों की वृद्धि प्रभावित हुई है। कपास के अलावा मक्का और सोयाबीन की फसलें भी बारिश की कमी से प्रभावित हो रही हैं।तालुका में सालाना औसत बारिश 743.47 मिलीमीटर है। पिछले साल यहां सामान्य से करीब 125% बारिश दर्ज की गई थी। इसके विपरीत, इस साल जुलाई की शुरुआत तक केवल 161.6 मिलीमीटर बारिश हुई है। कम बारिश के कारण तालुका की नदियों और नहरों में अभी तक पर्याप्त पानी नहीं आया है।जलस्रोतों में पानी की कमी का सीधा असर सिंचाई पर पड़ा है। कई कुएं सूख गए हैं। खेतों में ड्रिप इरिगेशन की सुविधा होने के बावजूद, कुओं में पानी नहीं होने के कारण किसान कपास की फसल को पर्याप्त सिंचाई नहीं दे पा रहे हैं। बारिश की कमी से खेतों की मेड़ों पर उगने वाली घास भी सूखने लगी है और कई फसलें मुरझाने की स्थिति में पहुंच गई हैं।हालांकि, कुछ क्षेत्रों में हुई बारिश से किसानों को थोड़ी राहत मिली है और कृषि गतिविधियों में तेजी आई है। किसान निराई-गुड़ाई, रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल और कीटनाशकों के छिड़काव जैसे कामों में व्यस्त हैं।इन गतिविधियों से ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहर मजदूरों को भी रोजगार मिल रहा है। फिलहाल, महिला मजदूरों को सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक काम के लिए करीब 300 रुपये, जबकि पुरुष मजदूरों को लगभग 500 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिल रही है।किसानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त और नियमित बारिश नहीं हुई, तो कपास, मक्का और सोयाबीन की फसलों पर गंभीर असर पड़ सकता है।और पढ़ें :- महाराष्ट्र में खरीफ बुवाई सामान्य क्षेत्र के 60% तक पहुंची, पिछले साल से काफी पीछे

महाराष्ट्र में खरीफ बुवाई सामान्य क्षेत्र के 60% तक पहुंची, पिछले साल से काफी पीछे

महाराष्ट्र में खरीफ बुआई सामान्य रकबे के 60% तक पहुंची, पिछले साल से काफी पीछेमुंबई, 15 जुलाई: महाराष्ट्र में खरीफ फसलों की बुआई 13 जुलाई तक 86.92 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, यह गन्ने को छोड़कर सामान्य खरीफ बुआई क्षेत्र का करीब 60% है। हालांकि, बुआई की रफ्तार पिछले साल की समान अवधि की तुलना में काफी धीमी है।पिछले साल 13 जुलाई तक राज्य में 120.65 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी थी, जो सामान्य क्षेत्र का लगभग 84% था। इस साल अब तक बुआई रकबे में बड़ी कमी दर्ज की गई है।भारी बारिश से फसलों को नुकसानमहाराष्ट्र सरकार के शुरुआती आकलन के अनुसार, जुलाई में भारी बारिश, तेज हवाओं और ओलावृष्टि के कारण राज्य में 6,673 हेक्टेयर कृषि और बागवानी फसलों को नुकसान पहुंचा है।हालांकि, सरकार के मुताबिक कई जिलों में अब बुआई की गतिविधियां तेज हो रही हैं। भारी बारिश से प्रभावित इलाकों में किसानों ने धान की दोबारा रोपाई शुरू कर दी है। वहीं, पहले बोई जा चुकी फसलें फिलहाल अंकुरण और शुरुआती विकास के चरण में हैं।देशभर में भी खरीफ बुआई धीमीकमजोर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के कारण देशभर में खरीफ फसलों की बुआई पिछले साल की तुलना में पीछे चल रही है। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 10 जुलाई तक देश में 531.25 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुआई हुई थी, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 632.69 लाख हेक्टेयर था। इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर बुआई रकबे में करीब 16% की गिरावट आई।धान का रकबा पिछले साल के 125.53 लाख हेक्टेयर से घटकर 114.69 लाख हेक्टेयर रह गया। तिलहन का रकबा भी 149.18 लाख हेक्टेयर से घटकर 117.83 लाख हेक्टेयर रहा। इनमें सोयाबीन का रकबा 107.72 लाख हेक्टेयर से घटकर 90.51 लाख हेक्टेयर रह गया।इसके विपरीत, गन्ने का रकबा 56.72 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 57.58 लाख हेक्टेयर और जूट-मेस्टा का रकबा 6.16 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.28 लाख हेक्टेयर हो गया।कपास की बुआई भी पिछले साल से पीछे रही। 10 जुलाई तक देश में कपास का रकबा 79.54 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 93.95 लाख हेक्टेयर था।और पढ़ें :- रुपया 10 पैसे गिरकर 96.35 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।

कृषि मंत्री ने जताई उम्मीद, 15 अगस्त तक पूरी हो सकती है खरीफ बुवाई की कमी

खरीफ बुआई में कमी 15 अगस्त तक पूरी होने की उम्मीद: कृषि मंत्रीनई दिल्ली, : कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को कहा कि खरीफ फसलों की बुआई के रकबे में आई कमी की भरपाई की जा सकती है, क्योंकि बुआई का मौसम 15 अगस्त तक जारी रहता है। उन्होंने कहा कि सरकार मॉनसून और बुआई की प्रगति पर लगातार नजर रख रही है।इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) द्वारा आयोजित एक सम्मेलन से इतर पत्रकारों से बातचीत में चौहान ने कहा कि खरीफ फसलों की बुआई के लिए अभी पर्याप्त समय है। उन्होंने कहा, “खरीफ फसलों की बुआई 15 अगस्त तक होती है। जून में बारिश कम हुई थी, लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में अच्छी बारिश हुई है। 20 जुलाई के बाद भी अच्छी बारिश की संभावना है।”उन्होंने कहा कि मौजूदा खरीफ सीजन में 10 जुलाई तक फसलों के तहत कुल बुआई रकबा पिछले साल की समान अवधि की तुलना में कम है। हालांकि, उन्होंने आने वाले दिनों में बुआई में तेजी आने और रकबे की कमी की भरपाई होने की उम्मीद जताई।चौहान ने कहा कि केंद्र सरकार स्थिति पर लगातार नजर रख रही है और किसानों को बीज, उर्वरक तथा अन्य आवश्यक कृषि इनपुट समय पर उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या बुआई में सुधार से रकबे की कमी पूरी हो सकती है, तो उन्होंने कहा, “इसकी संभावना है। मुझे बहुत उम्मीद है।”कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 10 जुलाई तक खरीफ फसलों का कुल बुआई रकबा पिछले साल की समान अवधि के 631.88 लाख हेक्टेयर से 15.93 प्रतिशत घटकर 531.25 लाख हेक्टेयर रह गया।तिलहन का रकबा 21 प्रतिशत घटकर 117.83 लाख हेक्टेयर रहा। इनमें सोयाबीन का रकबा 16 प्रतिशत घटकर 90.51 लाख हेक्टेयर रह गया।कपास की बुआई भी पिछड़ रही है। 10 जुलाई तक कपास का रकबा पिछले साल की समान अवधि के 93.95 लाख हेक्टेयर से 15.33 प्रतिशत घटकर 79.54 लाख हेक्टेयर रहा।खरीफ फसलों की बुआई आमतौर पर जून में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आगमन के साथ शुरू होती है। हालांकि, इस साल कमजोर मॉनसून के कारण बुआई प्रभावित हुई है। आने वाले दिनों में बारिश में सुधार से बुआई में तेजी आने की उम्मीद है।और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 96.25 पर स्थिर खुला

कम बुवाई और वैश्विक कीमतों में तेजी से कपास के दाम मजबूत

खेती के रकबे में कमी और ग्लोबल कीमतों में बढ़ोतरी से कपास की कीमतें बढ़ींग्लोबल कीमतों में तेज़ी और कम बारिश की वजह से खेती के रकबे में कमी की चिंताओं के बीच भारतीय कपास की कीमतें मज़बूत हुई हैं। कृषि मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के अनुसार, 10 जुलाई तक कपास की खेती का रकबा 15 प्रतिशत घटकर 79.54 लाख हेक्टेयर (lh) रह गया है, जो पहले 93.95 लाख हेक्टेयर था।पिछले दो दिनों में कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (CCI) ने अपनी कीमतें ₹800 प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) बढ़ाई हैं, जबकि मिलों और ट्रेडर्स दोनों की तरफ़ से मांग मज़बूत बनी हुई है।रायचूर में सोर्सिंग एजेंट रामानुज दास बूब ने कहा, "बाज़ार में सप्लाई कम है और न्यूयॉर्क में भी कीमतें बढ़ी हैं; ICE पर फ़्यूचर्स की कीमतें लगभग 75-76 सेंट प्रति पाउंड से बढ़कर 81-82 सेंट के आसपास पहुँच गई हैं।" उन्होंने कहा, "मानसून में देरी के कारण आने वाली फ़सल को लेकर अनिश्चितता बाज़ार को प्रभावित कर रही है।" उन्होंने आगे कहा कि CCI को अच्छी मांग मिल रही है; सोमवार को 1.2 लाख गांठों और मंगलवार को 1.5 लाख गांठों की बिक्री हुई।दास बूब ने बताया कि मल्टीनेशनल कंपनियाँ भी अपना स्टॉक बेच रही हैं और उनकी कीमतें CCI की कीमतों से लगभग ₹1,000 प्रति कैंडी ज़्यादा हैं।'अल नीनो का कोई असर नहीं'उन्होंने आगे कहा कि जिन कपास के बीजों से पौधे निकल चुके हैं, उन्हें बारिश की ज़रूरत है। उन्होंने कहा, "कर्नाटक और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में बारिश नहीं हो रही है, जहाँ कपास की बुआई पहले ही हो चुकी है। अगर अब बारिश नहीं हुई, तो मुश्किल हो सकती है।"कॉटन एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (CAI) की क्रॉप कमिटी के चेयरमैन अतुल गनात्रा, जो कपास व्यापार की मुख्य संस्था है, कम बारिश की चिंताओं के बावजूद कपास की संभावनाओं को लेकर सकारात्मक हैं। उन्होंने कहा, "अल नीनो का कपास की फ़सल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। असल में, इससे कपास की बुआई का रकबा बढ़ाने में मदद मिलेगी। कम बारिश से बेहतर पैदावार, क्वालिटी और मात्रा मिलेगी।"गनात्रा ने कहा, "पिछले साल इसी समय 86 लाख हेक्टेयर की तुलना में अब तक लगभग 80 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई पूरी हो चुकी है। 25 जुलाई तक बुआई 100 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा हो जाएगी क्योंकि लगभग सभी कपास उत्पादक क्षेत्रों में अच्छी बारिश हुई है। बारिश में अभी आए ठहराव के कारण किसान तेज़ी से कपास की बुआई कर रहे हैं।" दक्षिण भारत में इस साल कपास का रकबा पिछले साल के मुकाबले 20 प्रतिशत ज़्यादा है। गनात्रा ने कहा, "देर से हुई बारिश की वजह से किसानों के पास अब कपास की बुआई का ही विकल्प बचा है। देर से हुई बारिश के कारण कुल कपास की बुआई 125-130 लाख हेक्टेयर में होगी, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 10-15 प्रतिशत ज़्यादा है।"आसानी से उपलब्धतागनात्रा ने कहा कि बड़ी मिलें ₹64,000 के भाव पर कपास खरीद रही हैं, जबकि उनके पास मिलों में 3-4 महीने का स्टॉक पहले से मौजूद है। उन्होंने कहा, "चूंकि उन्होंने सस्ते भाव पर खरीदारी की थी, इसलिए वे औसत लागत (एवरेजिंग) के लिए मौजूदा कीमतों पर भी खरीद कर रही हैं।" भारत की सभी बड़ी मिलों के पास नवंबर तक का कपास स्टॉक है और कुछ मिलों के पास 31 दिसंबर तक का स्टॉक है।राजकोट के ब्रोकर आनंद पोपट ने अपने साप्ताहिक न्यूज़लेटर में कहा कि भारत में कुल मिलाकर कपास की उपलब्धता अच्छी-खासी बनी हुई है। हालांकि, प्रीमियम क्वालिटी का कपास अपेक्षाकृत कम है और उपलब्ध स्टॉक का एक बड़ा हिस्सा CCI और मल्टीनेशनल ट्रेडिंग कंपनियों के पास है। पोपट ने कहा, "इससे सीज़न के बाकी महीनों में कपास की कीमतें अच्छी बनी रह सकती हैं।"रोज़ाना कपास की आवक घटकर लगभग 7,000-8,000 गांठ (बेल्स) रह गई है। उन्होंने कहा कि स्पिनिंग मिलों से मांग स्थिर बनी हुई है, जबकि घरेलू और एक्सपोर्ट मार्केट में धागे (यार्न) की मांग में धीरे-धीरे सुधार देखा गया है।और पढ़ें :- बारिश से मुकलावा में नरमा फसल को नई जान, किसानों को अच्छी पैदावार की उम्मीद

बारिश से मुकलावा में नरमा फसल को नई जान, किसानों को अच्छी पैदावार की उम्मीद

मुकलावा इलाके में बारिश से नरमा की फसल को नई जान मिली; किसानों को अच्छी पैदावार की उम्मीदहाल ही में हुई अच्छी बारिश से मुकलावा इलाके में नरमा (कपास) की फसल को बहुत फ़ायदा हुआ है। खेतों में फसल की बढ़त तेज़ी से हो रही है और पौधे हरे-भरे दिख रहे हैं। पर्याप्त नमी से नई पत्तियाँ आ रही हैं, जिससे किसानों को बेहतर फ़सल की उम्मीद जगी है।किसानों का कहना है कि समय पर हुई बारिश फसल के लिए जीवनदान साबित हुई है। पहले तेज़ गर्मी और नमी की कमी से पौधों की बढ़त रुक रही थी, लेकिन बारिश के बाद खेतों के हालात में काफ़ी सुधार हुआ है। कई खेतों में नरमा के पौधों पर फूल भी आने लगे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, संतुलित और समय पर होने वाली बारिश नरमा की फसल के लिए फ़ायदेमंद होती है; इससे पौधों की बढ़त अच्छी होती है और पैदावार की क्षमता बढ़ती है। हालाँकि, उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि अगर खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहे, तो उसे तुरंत निकाल दें ताकि जड़ों को नुकसान न पहुँचे और फसल स्वस्थ बनी रहे।किसानों ने बताया कि वे लगातार फसल की निगरानी कर रहे हैं और कीटों व बीमारियों से बचाने के लिए ज़रूरी खेती-बाड़ी के उपाय करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि अगर आने वाले दिनों में मौसम अनुकूल रहा, तो इस साल नरमा की अच्छी पैदावार होने की पूरी संभावना है। और पढ़ें :- यवतमाल में बारिश की कमी से कपास और सोयाबीन किसानों की बढ़ी चिंता

यवतमाल में बारिश की कमी से कपास और सोयाबीन किसानों की बढ़ी चिंता

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के महान क्षेत्र में बारिश थमने से कपास और सोयाबीन किसानों की बढ़ी चिंतामहान, यवतमाल (महाराष्ट्र): जुलाई की शुरुआत में हुई लगातार बारिश के बाद अब एक सप्ताह से वर्षा नहीं होने के कारण महान और आसपास के क्षेत्रों के किसान चिंता में हैं। 7 जुलाई से शुरू हुई बारिश के दौरान कपास किसानों ने मजदूरों की मदद से निराई-गुड़ाई का कार्य तेजी से पूरा कर लिया, लेकिन अब बारिश रुकने से सोयाबीन सहित अन्य खरीफ फसलों पर संकट गहराने लगा है।1 से 7 जुलाई के बीच लगातार बारिश होने से खेतों में कपास की निराई-गुड़ाई, रासायनिक खाद का छिड़काव और अन्य कृषि कार्य प्रभावित हुए थे। हालांकि, 7 जुलाई की शाम से लेकर 14 जुलाई तक मौसम अनुकूल रहने से किसानों ने रुके हुए अधिकांश कृषि कार्य पूरे कर लिए। अब खेतों में आवश्यक कार्य लगभग समाप्त हो चुके हैं, लेकिन फसलों की अच्छी बढ़वार के लिए समय पर बारिश होना बेहद जरूरी है।पिछले आठ दिनों से बारिश नहीं होने के कारण कपास, सोयाबीन, अरहर, ज्वार, उड़द और मूंग जैसी खरीफ फसलें नमी की कमी झेल रही हैं। विशेष रूप से जुलाई के पहले सप्ताह में बोई गई सोयाबीन की फसल को इस समय पानी की सबसे अधिक आवश्यकता है। बढ़ते तापमान और मिट्टी में नमी की कमी के कारण सोयाबीन के पौधे मुरझाने लगे हैं, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही अच्छी बारिश नहीं हुई तो सोयाबीन सहित खरीफ की प्रमुख फसलों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और उत्पादन पर भी इसका असर पड़ सकता है। ऐसे में यवतमाल जिले के महान और आसपास के क्षेत्र के किसान अब आसमान की ओर टकटकी लगाए अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।और पढ़ें :- गुजरात: अमरेली में भारी बारिश से कपास की फसल खराब, किसानों ने शुरू की दोबारा बुवाई

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