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भारत-न्यूजीलैंड FTA से कपड़ा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

भारत-न्यूजीलैंड एफटीए से कपड़ा निर्यात को मिलेगा बढ़ावा, 2030 तक 350 अरब डॉलर लक्ष्य को मिलेगी रफ्तारभारतीय कपड़ा उद्योग परिसंघ (सीआईटीआई) के अनुसार, भारत और न्यूजीलैंड के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) भारतीय कपड़ा निर्यात को नई गति दे सकता है और 2030 तक इस क्षेत्र को 350 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य को मजबूती देगा।सीआईटीआई का मानना है कि यह एफटीए भारतीय निर्यातकों को चुनिंदा बाजारों पर निर्भरता कम करने और वैल्यू चेन में आगे बढ़ने में मदद करेगा। समझौते के तहत भारतीय वस्त्रों को न्यूजीलैंड के बाजार में शुल्क-मुक्त पहुंच मिलने की संभावना है, जिससे प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।न्यूजीलैंड के विदेश मामलों और व्यापार मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से सीआईटीआई ने बताया कि दिसंबर 2025 को समाप्त वर्ष में “बना हुआ कपड़ा लेख” न्यूजीलैंड में भारत से आयात की चौथी सबसे बड़ी श्रेणी रही। इस दौरान भारतीय कपड़ा उत्पादों का आयात लगभग 80.22 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर रहा।सीआईटीआई के चेयरमैन अश्विन चंद्रन ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह एफटीए भारतीय निर्यातकों के लिए सकारात्मक अवसर लेकर आया है। उनके अनुसार, उच्च आय और गुणवत्ता-संवेदनशील बाजार होने के कारण न्यूजीलैंड, भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता और मूल्य निर्धारण की वैश्विक पहचान को मजबूत कर सकता है।सीआईटीआई ने यह भी रेखांकित किया कि टिकाऊ वस्त्र, होम टेक्सटाइल और तकनीकी कपड़ा जैसे क्षेत्रों में न्यूजीलैंड में विशेष वृद्धि की संभावना है। साथ ही, उच्च गुणवत्ता वाले ऊन के प्रमुख निर्यातक के रूप में न्यूजीलैंड की स्थिति भारतीय कंपनियों को बेहतर कच्चा माल उपलब्ध कराने और उच्च गुणवत्ता वाले परिधान बनाने में सहायक हो सकती है।भारत का कपड़ा और परिधान क्षेत्र देश का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है और जीडीपी व निर्यात में अहम योगदान देता है। उद्योग का लक्ष्य 2030 तक कुल 350 अरब डॉलर के आकार तक पहुंचना है, जिसमें से 100 अरब डॉलर निर्यात से हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है।और पढ़ें :- रुपया डॉलर के मुकाबले 6 पैसे की बढ़त के साथ 94.19 पर बंद हुआ।

अगेती बुवाई से कपास की पैदावार बढ़ेगी: विशेषज्ञ सलाह

अगेती बिजाई से कपास में बढ़ेगी पैदावार, किसानों को विशेषज्ञ की सलाहचरखी दादरी। जिले में कपास की खेती करने वाले किसानों के लिए इस बार समय पर बुवाई बेहद अहम मानी जा रही है। कृषि विभाग के वरिष्ठ विषय विशेषज्ञ डॉ. चंद्रभान श्योराण ने किसानों को सलाह दी है कि कपास की अगेती बिजाई से अधिक और बेहतर गुणवत्ता वाली पैदावार हासिल की जा सकती है।उन्होंने बताया कि किसी भी फसल की सफलता में समय पर बुवाई की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, विशेष रूप से कपास जैसी नगदी फसल में। पिछले कुछ वर्षों में कपास, चरखी दादरी जिले में खरीफ सीजन की प्रमुख फसल बनकर उभरी है, जो किसानों की आय बढ़ाने के साथ रबी फसलों के लिए आर्थिक आधार भी तैयार करती है।डॉ. श्योराण के अनुसार जिले की अधिकांश भूमि रेतीली और अर्ध-रेतीली है, जो कपास की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। दक्षिण हरियाणा के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी ही परिस्थितियां हैं, जहां अगेती बिजाई किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित होती है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे अप्रैल माह में ही कपास की बुवाई शुरू करें। यदि किसी कारण देरी हो जाए, तो 10 मई तक हर हाल में बिजाई पूरी कर लें, ताकि फसल को अनुकूल मौसम का पूरा लाभ मिल सके।उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में बीटी कपास की खेती व्यापक रूप से की जा रही है और सरकार द्वारा अनुमोदित कई किस्में इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं। इनमें अजीत 133-2, अजीत 33-2, अंकुर 3244, अंकुर 3228, नुजिविडु 9002, नुजिविडु 9024, रासी 773, रासी 776, रासी 791, रासी 605 और रासी 650 प्रमुख हैं।और पढ़ें :- रुपया 94.25 पर स्थिर खुला हुआ।

बीटी कपास बीजों के लिए अधिकतम कीमत तय

बीटी कपास बीजों के लिए अधिकतम बिक्री मूल्य घोषितकेंद्र सरकार ने 2026-27 सीज़न के लिए बीटी कपास बीजों की अधिकतम बिक्री कीमत तय कर दी है। यह फैसला एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है।बीजों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और कपास बीज मूल्य (नियंत्रण) आदेश, 2015 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग किया है।यह मूल्य निर्धारण 475 ग्राम के मानक बीज पैकेट पर लागू होगा, जिसमें 5-10% तक गैर-बीटी बीज (रिफ्यूजिया) शामिल होते हैं। रिफ्यूजिया का उद्देश्य कीटों में प्रतिरोधक क्षमता के विकास को धीमा करना और फसलों की प्रभावशीलता को लंबे समय तक बनाए रखना है।इस कदम के जरिए सरकार बीजों की कीमतों को संतुलित रखने, किसानों की पहुंच सुनिश्चित करने और जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग पर निगरानी बनाए रखने का प्रयास कर रही है।और पढ़ें :- महाराष्ट्र में 27 अप्रैल को एग्री-इनपुट डीलर्स की हड़ताल

महाराष्ट्र में 27 अप्रैल को एग्री-इनपुट डीलर्स की हड़ताल

महाराष्ट्र में एग्री-इनपुट डीलर्स ने 27 अप्रैल को हड़ताल का ऐलान किया है।महाराष्ट्र फर्टिलाइजर्स, पेस्टिसाइड्स एंड सीड्स डीलर्स एसोसिएशन (MAFDA) और ऑल इंडिया डीलर एसोसिएशन (AIDA) ने राज्यभर में एक दिन के बंद की घोषणा की है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर भी जा सकते हैं।डीलर्स और मैन्युफैक्चरर्स का कहना है कि सरकार द्वारा बढ़ाई जा रही निगरानी और नियमों से कारोबार करना कठिन हो सकता है। एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी विनीत कासलीवाल के मुताबिक, एक नए सरकारी प्रस्ताव (GR) के तहत 23 अलग-अलग स्तर के अधिकारियों को क्वालिटी कंट्रोल इंस्पेक्टर नियुक्त किया गया है, जो एग्री-इनपुट यूनिट्स का निरीक्षण करेंगे।(sis)इंडस्ट्री से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि इंस्पेक्टरों की संख्या बढ़ने से कंपनी और डीलर स्तर पर बार-बार सैंपलिंग होगी, जिससे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ प्रभावित हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि फिजिकल इंस्पेक्शन बढ़ाने के बजाय लैब टेस्टिंग, डिजिटल ट्रेसबिलिटी और ऑडिट सिस्टम को मजबूत किया जाए।ऑर्गेनिक एग्रो मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (OAMA) के अध्यक्ष विजय ठाकुर ने इसे एग्री-उद्यमियों के सम्मान की रक्षा के लिए सामूहिक कदम बताया।बताया जा रहा है कि राज्य में करीब 85,000 एग्री-इनपुट दुकानों ने इस हड़ताल का समर्थन किया है।(sis)एग्री-इनपुट इंडस्ट्री के प्रतिनिधि डॉ. सुहास बुद्धे ने कहा कि किसानों के हितों और उद्योग की स्थिरता दोनों को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित, पारदर्शी और निष्पक्ष नियामक व्यवस्था की जरूरत है।और पढ़ें :- ओडिशा ने ₹124 करोड़ की कॉटन-टू-यार्न यूनिट को मंजूरी दी

ओडिशा ने ₹124 करोड़ की कॉटन-टू-यार्न यूनिट को मंजूरी दी

ओडिशा ने कॉटन-टू-यार्न इंटीग्रेशन को मज़बूत करने के लिए 124 करोड़ रुपये की यूनिट को दी मंज़ूरीओडिशा सरकार ने राज्य में टेक्सटाइल वैल्यू चेन को मज़बूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए बलांगीर ज़िले में यार्न मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की स्थापना के लिए 124 करोड़ रुपये (लगभग 13.17 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के निवेश को मंज़ूरी दी है। इस परियोजना को 27 साल पुरानी टेक्सटाइल कंपनी श्री अंबिका कॉटस्पिन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित किया जाएगा।विशेषज्ञों के अनुसार, यह नई यूनिट राज्य में कॉटन जिनिंग से लेकर यार्न उत्पादन तक की प्रोसेस को बेहतर तरीके से जोड़ने में मदद करेगी। फिलहाल, कई ज़िलों में कपास उत्पादन बढ़ने के बावजूद पर्याप्त डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के चलते कच्चे कॉटन का बड़ा हिस्सा राज्य के बाहर भेजा जाता है।(sis)ओडिशा की मुख्य सचिव अनु गर्ग ने कहा कि यह प्रोजेक्ट राज्य की ‘फार्म-टू-फैब्रिक’ रणनीति को मज़बूती देगा और यह सुनिश्चित करेगा कि स्थानीय स्तर पर उत्पादित कॉटन से बनने वाली वैल्यू राज्य की अर्थव्यवस्था में ही बनी रहे।राज्य के टेक्सटाइल सेक्टर में निवेश का रुझान लगातार तेज़ हो रहा है। कई बड़ी कंपनियां अलग-अलग जिलों में अपने प्रोजेक्ट स्थापित कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर, खुर्दा में एपिक ग्रुप ने 220 करोड़ रुपये (23.37 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का निवेश कर सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने की योजना बनाई है, जबकि MAS होल्डिंग्स भुइनपुर में लगभग 140 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश कर रही है।(sis)इसके अलावा, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज ने क्योंझर में 100 करोड़ रुपये (10.62 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की यूनिट लगाने की घोषणा की है। वहीं, सोनासेलेक्शन इंडिया लिमिटेड भी खुर्दा में 130 करोड़ रुपये (13.81 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का निवेश कर गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित कर रही है, जो खोरधा अल्फाटेक्स प्राइवेट लिमिटेड की 180 करोड़ रुपये (19.12 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की टेक्निकल टेक्सटाइल परियोजना के साथ जुड़ी होगी।(sis)इन परियोजनाओं के अलावा, पेज इंडस्ट्रीज, केपीआर मिल्स, टेक्नोस्पोर्ट, फर्स्ट स्टेप बेबी वियर, स्पोर्टकिंग, आदर्श निटवियर, अनुभव अपैरल्स और ट्राइमेट्रो गारमेंट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड समेत 33 से अधिक टेक्सटाइल और अपैरल कंपनियों ने ओडिशा में निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है।और पढ़ें :- युद्ध के बीच भारतीय कॉटन यार्न एक्सपोर्ट में तेजी

युद्ध के बीच भारतीय कॉटन यार्न एक्सपोर्ट में तेजी

युद्ध के दौर में भारतीय कॉटन यार्न निर्यात में उछालराजकोट/अहमदाबाद: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चेन और फ्यूल सप्लाई को प्रभावित किया है, जिससे भारत की कई फैक्ट्रियों पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, कॉटन यार्न उद्योग के लिए यह स्थिति अवसर में बदलती दिख रही है, क्योंकि चीन से मांग तेजी से बढ़ी है।भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कॉटन उत्पादक, चीन के लिए एक अहम सप्लायर बनकर उभरा है। युद्ध के चलते ट्रेड रूट्स बाधित हुए हैं और अमेरिका व ब्राज़ील से कॉटन शिपमेंट में देरी हुई है, जिससे चीन को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़े। ऐसे में भारत से यार्न आयात बढ़ा है। साथ ही, युआन के मुकाबले रुपया लगभग 7% कमजोर होने से भारतीय उत्पाद चीनी खरीदारों के लिए सस्ते हो गए हैं।(sis)गुजरात की स्पिनिंग मिल फियोटेक्स कॉटस्पिन के मैनेजिंग डायरेक्टर रिपल पटेल के अनुसार, कंपनी की एक्सपोर्ट ऑर्डर बुक में 40% की वृद्धि हुई है और उत्पादन अब 100% क्षमता पर पहुंच गया है। जून तक के ऑर्डर पहले ही बुक हो चुके हैं।उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, नवंबर से भारत से चीन को हर महीने करीब 1,500 कंटेनर कॉटन यार्न भेजे जा रहे हैं, जो पहले 300 कंटेनर थे—यानी पांच गुना वृद्धि। पॉलिएस्टर सप्लाई पर असर से कॉटन की मांग और बढ़ी है।(sis)हालांकि, गुजरात की मिलों को भौगोलिक लाभ मिल रहा है, जबकि तमिलनाडु की इकाइयों को अधिक ट्रांसपोर्ट लागत के कारण प्रतिस्पर्धा में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।और पढ़ें :- कम उत्पादन के अनुमान के बीच अप्रैल में कपास की कीमतों में 8.5% से ज़्यादा की बढ़ोतरी

कम उत्पादन के अनुमान के बीच अप्रैल में कपास की कीमतों में 8.5% से ज़्यादा की बढ़ोतरी

अप्रैल में कपास महंगी, कीमतों में 8.5% उछालअप्रैल में कपास की कीमतों में 8.5% से ज़्यादा की तेज़ी आई है। इसकी वजह कम उत्पादन की चिंता और टेक्सटाइल मिलों से बढ़ती मांग है। गुजरात में मुख्य रूप से उगाई जाने वाली शंकर-6 किस्म की कपास की कीमत ₹60,500 प्रति कैंडी तक पहुँच गई है, जो पिछले महीने के मुकाबले काफ़ी ज़्यादा है।(sis)कपास उत्पादन और खपत पर बनी समिति के अनुसार, 30 सितंबर को खत्म हो रहे मौजूदा मार्केटिंग सीज़न के लिए भारत का कपास उत्पादन लगभग 291 लाख गांठ रहने का अनुमान है—जो 2024–25 सीज़न के मुकाबले लगभग 0.42% कम है।साथ ही, घरेलू खपत भी बढ़ रही है। अनुमान है कि इस सीज़न में टेक्सटाइल मिलें 312 लाख गांठ कपास का इस्तेमाल करेंगी, जो पिछले साल के 306 लाख गांठ से ज़्यादा है। इससे आपूर्ति की स्थिति और भी तंग हो गई है।उद्योग जगत के नेताओं ने आपूर्ति में कमी को लेकर चिंता जताई है। सदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन के चेयरमैन दुराई पलानीसामी ने कपास पर आयात शुल्क की समीक्षा करने की तत्काल ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि कपास की कमी से टेक्सटाइल सेक्टर पर असर पड़ रहा है, जो इस फ़ाइबर का देश में सबसे बड़ा उपभोक्ता है।(sis)तेज़ी के इस माहौल को और बढ़ावा देते हुए, वैश्विक स्तर पर भी कपास की कीमतें बढ़ रही हैं। इंडियन कॉटन फ़ेडरेशन के सेक्रेटरी निशांत आशेर ने बताया कि जुलाई के लिए कपास के वायदा भाव में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है—दिसंबर 2025–जनवरी 2026 में लगभग 64.5 सेंट प्रति पाउंड से बढ़कर यह लगभग 79.8 सेंट तक पहुँच गया है। पिछले तीन सालों में 64–70 सेंट की रेंज के मुकाबले यह एक बड़ी बढ़ोतरी है।वैश्विक स्तर पर, पहले के अनुमानों के मुकाबले उत्पादन में 1.5 से 2.5 मिलियन गांठ की कमी होने की उम्मीद है। अमेरिका और ब्राज़ील जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में कम बारिश का असर उत्पादन पर पड़ने की संभावना है, हालाँकि ये अनुमान अभी पक्के नहीं हैं।इसके अलावा, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी फ़ाइबर के बाज़ार को प्रभावित कर रही हैं। भू-राजनीतिक तनाव के चलते पेट्रोकेमिकल्स से बनने वाला पॉलिएस्टर महँगा हो गया है, जिससे मांग कपास की ओर मुड़ गई है। मांग में मामूली बदलाव भी कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव डाल रहे हैं।कुल मिलाकर, कम उत्पादन, वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी और टेक्सटाइल की बढ़ती मांग—इन सभी कारणों के मेल से कपास की कीमतों में मौजूदा तेज़ी को समर्थन मिल रहा है।और पढ़ें :- कपड़ा उद्योग ने कीमतों में उछाल के बीच ड्यूटी-फ्री कपास आयात की मांग की 

कपास कीमतों में तेजी, टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने ड्यूटी-फ्री आयात की मांग की

कपड़ा उद्योग ने कीमतों में उछाल के बीच ड्यूटी-फ्री कपास आयात की मांग कीभारत के कपड़ा उद्योग ने सरकार से कपास पर लगने वाली 11% आयात शुल्क हटाने का आग्रह किया है, क्योंकि वैश्विक रुझानों के अनुरूप घरेलू कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि निर्यात में अपनी प्रतिस्पर्धी क्षमता बनाए रखने और कपड़ा मूल्य श्रृंखला को स्थिर करने के लिए ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति देना बेहद ज़रूरी है।हाल के हफ़्तों में कपास की कीमतों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है, जिससे कताई मिलों से लेकर कपड़ों के निर्यातकों तक, पूरे इकोसिस्टम पर दबाव पड़ रहा है। निर्यातक, विशेष रूप से वे जो लंबी अवधि के अनुबंधों के तहत काम कर रहे हैं, उन्हें अपने मुनाफ़े में कमी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उनके पास बढ़ती इनपुट लागत को ग्राहकों पर डालने की सीमित क्षमता है।(sis)सदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (SIMA) के महासचिव के. सेल्वाराजू ने कहा कि कपास की कीमतों में भारी बढ़ोतरी सभी क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है, जिसमें कपड़ों के निर्माता सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि वे कपड़े के इनपुट पर निर्भर रहते हैं।कमज़ोर वैश्विक मांग, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण स्थिति और भी जटिल हो गई है। जहाँ एक ओर सूत का निर्यात अपेक्षाकृत स्थिर रहा है, वहीं व्यापक कपड़ा निर्यात क्षेत्र को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।भारत में कपास का उत्पादन लगभग 290 लाख गांठ होने का अनुमान है, जो लगभग 330 लाख गांठ की घरेलू मांग से कम है। इस कमी को पूरा करने के लिए, उद्योग ने मई से अक्टूबर तक ड्यूटी-फ्री आयात का प्रस्ताव दिया है, जो आपूर्ति की कमी वाले समय को कवर करेगा।(sis)उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इस कदम से किसानों को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि कपास का अधिकांश स्टॉक मार्च तक बिक जाता है। आपूर्ति में बाधाओं और कीमतों में बढ़ती अस्थिरता को देखते हुए, उद्योग आगे किसी भी तरह की रुकावट को रोकने के लिए सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रहा है।और पढ़ें :- रुपया 10 पैसे की गिरावट के साथ 94.21 पर खुला.

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