मध्य प्रदेश के कपास उत्पादक क्षेत्रों में श्रमिक अधिकार मजबूत करने पर जोर
मध्य प्रदेश में कपास उत्पादन से जुड़े संगठनों और अन्य हितधारकों ने कपास उत्पादक समुदायों में श्रमिकों के बुनियादी अधिकारों और बेहतर कार्य परिस्थितियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) के ‘RISE for Impact’ प्रोजेक्ट से जुड़े साझेदारों ने परियोजना के तहत किए गए काम को आगे भी जारी रखने के लिए बेहतर समन्वय, स्थानीय स्तर पर जागरूकता और किसानों को सरकारी सेवाओं से जोड़ने की जरूरत पर सहमति जताई।
ILO के अनुसार, ट्रेड यूनियनों, कपास उद्योग, नागरिक समाज संगठनों और कपास उत्पादक समुदायों के प्रतिनिधियों ने अगस्त में इंदौर में बैठक की। इसमें परियोजना की प्रगति, चुनौतियों और अब तक मिली सीख की समीक्षा की गई। प्रतिभागियों ने स्थानीय नेताओं, ट्रेड यूनियनों, सामुदायिक संगठनों और सरकारी संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई। मौसमी पलायन और बाल श्रम के मूल कारणों पर भी अधिक ध्यान देने की बात कही गई।
इंदौर कार्यक्रम में ILO और डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी ऑफ सोशल साइंसेज की संयुक्त रिपोर्ट ‘मध्य प्रदेश में कपास उगाने वाले समुदाय का सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन’ भी जारी की गई। रिपोर्ट में बहुत कम जमीन वाले किसानों की स्थिति पर ध्यान दिया गया है, जो खेती के लिए अपनी और परिवार की मेहनत पर काफी हद तक निर्भर रहते हैं।
रतलाम में कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) और उसकी सहयोगी संस्था कॉटन डेवलपमेंट एंड रिसर्च एसोसिएशन (CITI-CDRA) की ओर से आयोजित कार्यशाला में 100 से अधिक किसानों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला में मजदूरों की कमी, खेती में युवाओं की घटती रुचि और महिला किसानों पर भुगतान वाले तथा बिना भुगतान वाले काम के दोहरे बोझ जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
कार्यशाला में किसानों को श्रम कानून, शिकायत निवारण व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और ग्रामीण वित्त की जानकारी दी गई। केयर कोऑपरेटिव्स यानी देखभाल सहकारी समितियों की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। ILO की विशेषज्ञ भारती बिरला ने सस्ती और अच्छी गुणवत्ता वाली देखभाल सेवाओं की जरूरत पर जोर दिया। वहीं, ILO के इंसाफ निजाम ने ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों के अधिकार मजबूत करने के लिए सभी संबंधित पक्षों के प्रभावी सहयोग को जरूरी बताया।
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