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गुलाबी सुंडी के डर से हनुमानगढ़ में Bt कपास का रकबा 15 हजार हेक्टेयर घटा

हनुमानगढ़ में बीटी कपास का रकबा 15 हजार हेक्टेयर घटा, गुलाबी सुंडी का डर बना प्रमुख कारणहनुमानगढ़ जिले में इस खरीफ सीजन बीटी कपास की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में करीब 15 हजार हेक्टेयर कम हुई है। कृषि विभाग के अनुसार 29 जून तक जिले में 1,32,582 हेक्टेयर क्षेत्र में बीटी कपास की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 1,47,585 हेक्टेयर था।लगातार तीन वर्षों से गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) के बढ़ते प्रकोप और पिछले वर्ष हुए नुकसान के चलते इस बार किसानों ने कपास का रकबा घटाया है। इसके विपरीत मूंग, धान, ग्वार तथा अन्य खरीफ फसलों का क्षेत्र बढ़ने की संभावना है। इन फसलों की बुवाई अभी जारी है और अंतिम आंकड़े जल्द जारी होंगे।हनुमानगढ़ में सामान्यतः हर वर्ष करीब 1.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बीटी कपास की खेती होती है। इस बार रकबा कम होने के बावजूद कृषि विभाग किसानों को बेहतर फसल प्रबंधन और गुलाबी सुंडी से बचाव के लिए लगातार जागरूक कर रहा है। विभाग ने कार्यशालाओं और एडवाइजरी के माध्यम से किसानों को अगेती बुवाई नहीं करने की सलाह दी थी। किसानों से कहा गया था कि मई माह से बुवाई शुरू करें ताकि अधिकांश खेतों में फसल की फ्लावरिंग एक साथ हो और जुलाई तक गुलाबी सुंडी का जीवन चक्र प्रभावित हो सके। हालांकि कुछ किसानों ने ट्यूबवेल से सिंचाई कर मई से पहले ही बुवाई कर दी, जिससे इन खेतों में सुंडी के प्रकोप की आशंका बनी हुई है।कृषि विभाग की सलाहखेतों का नियमित निरीक्षण करें और गुलाबी सुंडी के शुरुआती लक्षणों पर नजर रखें।पौधों की अत्यधिक बढ़वार रोकने के लिए सिंचाई के साथ यूरिया (नाइट्रोजन) का सीमित उपयोग करें।प्रति हेक्टेयर पांच फेरोमोन ट्रैप लगाकर कीट की निगरानी करें।फूलों और गुड्डियों का नियमित निरीक्षण करें तथा रोसेट फूल दिखाई देने पर उन्हें तुरंत नष्ट कर दें।टिंडे बनने की अवस्था में प्रति एकड़ 20 हरे टिंडों की जांच करें। यदि 20 में से दो या अधिक टिंडों में सफेद या गुलाबी लार्वा मिले अथवा 10 प्रतिशत रोसेट फूल दिखाई दें, तो तुरंत नियंत्रण उपाय अपनाएं।सहायक निदेशक कृषि (विस्तार) डॉ. संजीव भादू ने बताया कि इस वर्ष बीटी कपास का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में कम है, जबकि अन्य खरीफ फसलों का क्षेत्र बढ़ने की संभावना है। उन्होंने किसानों से नियमित निगरानी, फेरोमोन ट्रैप का उपयोग तथा विभाग की वैज्ञानिक सलाह का पालन करने की अपील की, ताकि गुलाबी सुंडी से होने वाले नुकसान को कम कर बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।और पढ़ें :- कर्नाटक में खरीफ बुवाई धीमी, कमजोर मानसून के बीच कपास की बुवाई में तेजी

कर्नाटक में खरीफ बुवाई धीमी, कमजोर मानसून के बीच कपास की बुवाई में तेजी

कर्नाटक में खरीफ़ बुवाई सुस्त, लेकिन कपास की बुवाई ने पकड़ी रफ्तारकर्नाटक में खरीफ़ सीजन की बुवाई इस वर्ष अपेक्षा से धीमी बनी हुई है। कृषि विभाग के 3 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 84.1 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 36.5 लाख हेक्टेयर में ही बुवाई हुई है, जो कुल लक्ष्य का लगभग 43% है। यह पिछले वर्ष के इसी समय की तुलना में करीब 28% कम है, हालांकि पांच साल के औसत का लगभग 94% है।बुवाई में देरी की मुख्य वजह राज्य के कई हिस्सों में मॉनसून का देर से पहुंचना और सामान्य से कम बारिश रहना है। इसका सबसे अधिक असर अनाज और दलहन फसलों पर पड़ा है, जबकि सिंचित क्षेत्रों में कपास और अन्य नकदी फसलों की बुवाई तेज़ी से बढ़ी है।जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, चिक्कबल्लापुर में सामान्य बुवाई क्षेत्र का केवल 9% हिस्सा ही कवर हो पाया है। इसके बाद बेंगलुरु ग्रामीण (24%) और कोलार जैसे जिलों में भी बुवाई काफी पीछे है। दूसरी ओर, उत्तरी कर्नाटक के सिंचित क्षेत्रों में स्थिति बेहतर है। रायचूर सामान्य क्षेत्रफल के 157% के साथ सबसे आगे है, जबकि यादगीर, हावेरी, धारवाड़ और गदग में भी बुवाई सामान्य से अधिक दर्ज की गई है।फसलवार स्थिति देखें तो अनाज की बुवाई लक्ष्य का केवल 27% और दलहन की 44% ही पूरी हुई है। मक्का की बुवाई अपेक्षाकृत बेहतर रही है और यह सामान्य स्तर के 86% तक पहुंच चुकी है। तिलहनों में सूरजमुखी की बुवाई पांच साल के औसत के 130% पर है, जबकि मूंगफली अभी भी सामान्य से पीछे चल रही है।सबसे बेहतर प्रदर्शन वाणिज्यिक फसलों का रहा है। इनकी बुवाई सामान्य स्तर के 121% तक पहुंच चुकी है, जबकि कपास की बुवाई पांच वर्षीय औसत के 141% पर दर्ज की गई है। इससे संकेत मिलता है कि बारिश की अनिश्चितता के बीच किसान सिंचाई उपलब्ध होने पर नकदी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई में भी सामान्य से कम बारिश होती है, तो राज्य में खरीफ़ फसलों पर दबाव बढ़ सकता है और कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका रहेगी।और पढ़ें :- रुपया डॉलर के मुकाबले 95.23 पर कमजोर खुला.

CCI की साप्ताहिक बिक्री 55,400 गांठ पार

CCI ने कॉटन की कीमतें स्थिर रखीं; साप्ताहिक नीलामी में बिक्री 55,400 गांठों के पारकॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (CCI) ने 3 जुलाई 2026 को समाप्त हुए सप्ताह के लिए अपनी कॉटन कैंडी की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया। नीलामी में टेक्सटाइल मिलों और कॉटन व्यापारियों की ज़बरदस्त भागीदारी देखी गई, जिसके परिणामस्वरूप 2025–26 फसल सीज़न से कुल साप्ताहिक बिक्री लगभग 55,400 गांठों की रही।साप्ताहिक बिक्री रिपोर्ट 29 जून 2026 (सोमवार):CCI ने दिन के दौरान कुल 4,800 गांठों की बिक्री दर्ज की। मिलों ने 3,100 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 1,700 गांठें उठाईं।30 जून 2026 (मंगलवार):कुल बिक्री बढ़कर 14,000 गांठें हो गई। मिलों ने 5,000 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 9,000 गांठें खरीदीं।1 जुलाई 2026 (बुधवार):सप्ताह की सबसे ज़्यादा बिक्री बुधवार को दर्ज की गई, जो 14,300 गांठें थीं। व्यापारियों ने 10,100 गांठें खरीदकर खरीदारी में बढ़त बनाए रखी, जबकि मिलों ने 4,200 गांठें खरीदीं।2 जुलाई 2026 (गुरुवार):CCI ने दिन के दौरान 13,200 गांठें बेचीं। मिलों ने 7,500 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 5,700 गांठें उठाईं।3 जुलाई 2026 (शुक्रवार):सप्ताह का समापन कुल 9,100 गांठों की बिक्री के साथ हुआ। मिलों ने 5,100 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारी 4,000 गांठों की खरीद के साथ सक्रिय रहे।कुल बिक्री का अपडेटनवीनतम नीलामियों के साथ, 2025–26 सीज़न के लिए CCI की कुल कॉटन बिक्री 80,12,900 गांठों तक पहुँच गई है।और पढ़ें:- भारत-चीन बढ़ाएंगे वैश्विक कपास व्यापार

भारत-चीन बढ़ाएंगे वैश्विक कपास व्यापार

ICAC: भारत और चीन बनेंगे ग्लोबल कॉटन ट्रेड के प्रमुख ग्रोथ ड्राइवरइंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) के अनुसार, 2026/27 सीज़न में भारत और चीन की मजबूत आयात मांग वैश्विक कॉटन व्यापार को नई गति दे सकती है। दोनों देशों की बढ़ती खरीदारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में व्यापारिक गतिविधियों को मजबूती देने वाली प्रमुख ताकत के रूप में उभर रही है।रिपोर्ट के मुताबिक, भारत वैश्विक कॉटन मांग को बढ़ाने वाले सबसे अहम देशों में शामिल हो गया है। 2025/26 सीज़न में देश का कॉटन लिंट आयात लगभग 10 लाख टन (1 मिलियन टन) रहने का अनुमान है, जो पिछले सीज़न की तुलना में 42% अधिक है। यह भारत के इतिहास का अब तक का सबसे ऊंचा आयात स्तर होगा।इस बढ़ोतरी के पीछे आयात शुल्क में अस्थायी कटौती और एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल (ELS) कॉटन पर दी गई छूट जैसे नीतिगत कदमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन उपायों से आयातित फाइबर की उपलब्धता बढ़ी है और घरेलू स्पिनिंग तथा टेक्सटाइल उद्योग की मांग को समर्थन मिला है।चीन के कॉटन आयात में भी उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद जताई गई है। पिछले सीज़न में आयात आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर रहने के बाद, 2025/26 में चीन के कॉटन लिंट आयात में करीब 42% की वृद्धि का अनुमान है।ICAC का अनुमान है कि 2026/27 सीज़न में चीन एक बार फिर दुनिया का सबसे बड़ा कॉटन आयातक बन जाएगा और वैश्विक कॉटन आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 19% होगी। अतिरिक्त आयात कोटा, घरेलू बाजार में मजबूत कीमतें और कपड़ा मिलों की निरंतर मांग इस बढ़ोतरी के प्रमुख कारण बताए गए हैं।चीन के प्रमुख सप्लायरों में ब्राज़ील सबसे आगे है। वर्तमान में चीन के कुल कॉटन आयात में ब्राज़ील की हिस्सेदारी करीब 52% है, जिससे वह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कॉटन ट्रेड कॉरिडोर का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया चीन के दूसरे सबसे बड़े सप्लायर के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों में जारी बदलाव वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कॉटन व्यापार के प्रवाह को प्रभावित कर रहे हैं।उत्पादन और खपत के मोर्चे पर, 2025/26 सीज़न में वैश्विक कॉटन उत्पादन 26.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3% अधिक है। वहीं, वैश्विक खपत 25.3 मिलियन टन रहने की संभावना है, जो साल-दर-साल 1.6% की वृद्धि दर्शाती है।2026/27 सीज़न में वैश्विक कॉटन उत्पादन 2% घटकर 25.9 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि खपत लगभग 1% बढ़कर 25.5 मिलियन टन तक पहुंच सकती है। ICAC का मानना है कि मजबूत मांग के चलते भारत और चीन आने वाले वर्षों में वैश्विक कॉटन व्यापार की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।और पढ़ें:- भारतीय कपास उद्योग का परिदृश्य

भारतीय कपास उद्योग का परिदृश्य

भारतीय कॉटन सेक्टर पर नज़रभारत में उच्च गुणवत्ता वाले इम्पोर्टेड कॉटन की मांग लगातार बढ़ रही है। यद्यपि देश का कुल कॉटन उत्पादन घरेलू खपत के लिए पर्याप्त है, फिर भी फाइन काउंट यार्न, होम टेक्सटाइल और निर्यात-उन्मुख उत्पादों के निर्माण के लिए प्रीमियम गुणवत्ता वाले फाइबर की आवश्यकता आयात को बढ़ावा दे रही है। वर्तमान में भारत अपनी कुल कॉटन खपत का लगभग 9% आयात करता है, जबकि चीन की आयात निर्भरता 16–17% है। इससे अमेरिका, ब्राज़ील और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख निर्यातक देशों के लिए भारतीय बाजार में अवसर बढ़ रहे हैं।तमिलनाडु की जयलक्ष्मी टेक्सटाइल्स जैसी स्पिनिंग मिलें अपनी आवश्यकता का लगभग 20% इम्पोर्टेड कॉटन उपयोग करती हैं। कंपनी के अनुसार, अमेरिकी कॉटन में कम ट्रैश कंटेंट और बेहतर गुणवत्ता फाइन काउंट स्पिनिंग के लिए उपयुक्त है, यदि यह प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध हो।हाल के महीनों में वैश्विक टेक्सटाइल मांग में वृद्धि और चीन द्वारा भारतीय कॉटन यार्न की खरीद बढ़ने से घरेलू बाजार में कीमतों और उपलब्धता पर दबाव देखा गया। अब बाजार की दिशा काफी हद तक मॉनसून की प्रगति पर निर्भर करेगी। हालांकि शुरुआती चरण में वर्षा सामान्य से कम रही, विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव कपास पर चावल और गन्ने जैसी अधिक पानी वाली फसलों की तुलना में सीमित रहेगा। यदि किसान कम पानी वाली फसल के रूप में कपास का रकबा बढ़ाते हैं, तो उत्पादन में सुधार संभव है।कमोडिटी विश्लेषकों का अनुमान है कि कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में बेहतर वर्षा रहने पर 2026–27 सीजन में भारत का कॉटन उत्पादन 320 लाख गांठों से अधिक हो सकता है। इसके साथ ही भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की संभावनाएं भी उद्योग के लिए सकारात्मक मानी जा रही हैं। चूंकि कपास खाद्य फसल नहीं है और भारत में अधिकांश उत्पादन GMO आधारित है, इसलिए व्यापार समझौते में इसे शामिल करना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। भारतीय स्पिनिंग उद्योग भी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए ड्यूटी-फ्री कॉटन आयात की मांग कर रहा है।बढ़ती गुणवत्ता मांग, संभावित व्यापार समझौते और वैश्विक टेक्सटाइल बाजार में भारत की मजबूत स्थिति को देखते हुए भारतीय कॉटन सेक्टर आने वाले वर्षों में विकास और निवेश के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान कर सकता है।और पढ़ें:- ट्रेड डील से टेक्सटाइल शेयरों में तेजी

ट्रेड डील से टेक्सटाइल शेयरों में तेजी

ट्रेड डील्स से भारतीय टेक्सटाइल स्टॉक्स में तेज़ी, एक्सपोर्ट बढ़ने की उम्मीदभारत के टेक्सटाइल सेक्टर में इस साल मजबूत तेजी देखने को मिल रही है। इसकी प्रमुख वजह ब्रिटेन (UK) के साथ इस महीने लागू होने जा रहा मुक्त व्यापार समझौता (FTA), यूरोपीय संघ (EU) के साथ अंतिम चरण में पहुंची बातचीत और अमेरिका (US) के साथ संभावित ट्रेड डील है। इन समझौतों से भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा मजबूत होने की उम्मीद है।टी-शर्ट, बेड लिनन और टॉवल जैसे उत्पाद वॉलमार्ट, टेस्को और अन्य वैश्विक रिटेलर्स को सप्लाई करने वाली भारतीय कंपनियां शेयर बाजार की सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों में शामिल हैं। ब्लूमबर्ग के आठ प्रमुख टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स के इक्वल-वेट इंडेक्स में इस साल 30% से अधिक की बढ़त दर्ज की गई है, जबकि इसी अवधि में NSE निफ्टी 50 इंडेक्स में करीब 8% की गिरावट आई है।इक्विट्री कैपिटल एडवाइजर्स के को-फाउंडर और मुख्य निवेश अधिकारी पवन भरडिया का मानना है कि भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों के लिए वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने का बड़ा अवसर है। उनके अनुसार, बेहतर टैरिफ व्यवस्था और नए निर्यात अवसरों के कारण इस सेक्टर की वैल्यूएशन में सुधार होना चाहिए। उनके पोर्टफोलियो में शामिल SP Apparels के शेयर इस साल करीब 60% चढ़ चुके हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और कुछ अन्य एशियाई देशों से सोर्सिंग कम करने की वैश्विक रणनीति का भी लाभ भारत को मिल सकता है। इसी उम्मीद के चलते SBI Funds Management और Quant Mutual Fund जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों ने हाल के महीनों में कई टेक्सटाइल कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है।अरविंद लिमिटेड के शेयर इस साल लगभग 74% और इंडो काउंट इंडस्ट्रीज के शेयर करीब 54% चढ़े हैं। मोतीलाल ओसवाल के विश्लेषकों का मानना है कि बड़े भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स बेहतर ऑर्डर विजिबिलिटी और वैश्विक ब्रांड्स की बढ़ती मांग का लाभ उठाकर आने वाले वर्षों में अपना मार्केट शेयर बढ़ा सकते हैं।हालांकि वैश्विक टेक्सटाइल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी अभी लगभग 4% है, लेकिन सरकार 2030 तक इस उद्योग का आकार 350 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह लक्ष्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नए निवेश आकर्षित करने और निर्यात ऑर्डर में लगातार वृद्धि पर निर्भर करेगा।और पढ़ें:- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95.21 पर बिना किसी बदलाव के बंद हुआ।

अकोला में खरीफ बुवाई तेज, कपास बढ़ेगा

महाराष्ट्र: अच्छी बारिश से खरीफ बुवाई ने पकड़ी रफ्तार, 1.20 लाख हेक्टेयर में बुवाई पूरी; कपास के रकबे में बढ़ोतरी के आसारमहाराष्ट्र के अकोला जिले में जुलाई की शुरुआत में हुई अच्छी बारिश से खरीफ सीजन की बुवाई ने रफ्तार पकड़ ली है। कृषि विभाग के अनुसार, जिले के कुल 4,32,010 हेक्टेयर खेती योग्य क्षेत्र में से अब तक करीब 1,20,000 हेक्टेयर में बुवाई पूरी हो चुकी है। पिछले वर्ष जिले में कुल 4,31,884 हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई थी।इस वर्ष किसानों का रुझान कपास की खेती की ओर तेजी से बढ़ा है। कृषि अधिकारियों के मुताबिक, मूंग और उड़द की बुवाई का उपयुक्त समय समाप्त हो चुका है। ऐसे में अब इन फसलों की बुवाई करने पर उत्पादन प्रभावित होने और फसल खराब होने की आशंका है। इसी कारण अधिकांश किसानों ने कपास की खेती को प्राथमिकता दी है। अब तक जिले में कपास की लगभग 30 प्रतिशत बुवाई पूरी हो चुकी है और इस वर्ष इसके कुल रकबे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।जिले में अब तक हुई वर्षा के आंकड़ों के अनुसार, तेलहारा तालुका में सबसे अधिक 191.7 मिमी बारिश दर्ज की गई है। इसके बाद अकोट में 161.3 मिमी, पातुर में 141.9 मिमी, मूर्तिजापुर में 132.9 मिमी, बरशीटाकली में 124.9 मिमी, बालापुर में 111.9 मिमी तथा अकोला तालुका में 95 मिमी वर्षा हुई है। जिले का औसत वर्षापात 132.2 मिमी दर्ज किया गया है।कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि अब मूंग और उड़द की बुवाई से बचें, क्योंकि इन फसलों का अनुकूल समय निकल चुका है। विभाग का कहना है कि इस समय बुवाई करने पर अपेक्षित उत्पादन मिलने की संभावना काफी कम रहती है। विशेष रूप से तेलहारा और पातुर क्षेत्र में शुरुआती बारिश और बुवाई में हुई देरी के कारण कई किसानों को अपनी मूल फसल योजना बदलकर कपास की खेती अपनानी पड़ रही है।हालांकि जिले में कुल मिलाकर बुवाई का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन अकोट, तेलहारा और पातुर तालुका के कुछ हिस्सों में लगातार हो रही भारी बारिश से बुवाई प्रभावित हुई है। पातुर के निचले इलाकों में जलभराव और मिट्टी में अत्यधिक नमी के कारण कई स्थानों पर बुवाई का कार्य फिलहाल रुका हुआ है।और पढ़ें :- कपास भाव MSP से ऊपर पहुंचे

कपास भाव MSP से ऊपर पहुंचे

कॉटन मार्केट: कपास की कीमतों में एक हफ्ते में 5.24% की बढ़ोतरी, किसानों को मिल रहे MSP से अधिक भावदेश के कपास बाज़ार में एक बार फिर मजबूती देखने को मिल रही है। मंडियों में कपास की आवक लगातार घटने से कीमतों में अच्छी तेजी दर्ज की गई है। 28 जून को समाप्त सप्ताह के दौरान देश में कपास का औसत बाज़ार भाव बढ़कर ₹8,902 प्रति क्विंटल पहुंच गया, जो पिछले सप्ताह की तुलना में 5.24% अधिक है। नए कपास सीज़न की शुरुआत से पहले आई यह तेजी कपास उत्पादक किसानों के लिए राहतभरी खबर मानी जा रही है।बाज़ार विशेषज्ञों के अनुसार, कीमतों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह मंडियों में कपास की आवक में आई भारी गिरावट है। पिछले सप्ताह के मुकाबले देशभर की कृषि उपज मंडी समितियों (APMC) में कपास की कुल आवक 23.54% कम रही। महाराष्ट्र में इसका असर सबसे अधिक देखने को मिला, जहां मंडियों में कपास की आवक में 54.75% की गिरावट दर्ज की गई। सीमित स्टॉक के कारण व्यापारियों के बीच खरीद की प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे बाज़ार भाव मजबूत हुए।केंद्र सरकार ने 2025-26 सीज़न के लिए मीडियम-स्टेपल कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹7,410 प्रति क्विंटल तय किया था, जबकि 2026-27 सीज़न के लिए इसे बढ़ाकर ₹8,267 प्रति क्विंटल कर दिया गया है। वर्तमान में खुले बाज़ार में मिल रहा औसत भाव नए MSP से भी अधिक है। ऐसे में किसान सरकारी खरीद केंद्रों के बजाय खुले बाज़ार में बिक्री कर बेहतर दाम प्राप्त कर रहे हैं।प्रमुख मंडियों की बात करें तो अमरावती में कपास का औसत भाव ₹8,955 प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जो सबसे अधिक रहा। इसके अलावा राजकोट में ₹8,902, परभणी में ₹8,304 और बुलढाणा में ₹8,200 प्रति क्विंटल का औसत भाव दर्ज हुआ।आने वाले दिनों में कपास की कीमतों का रुख नए सीज़न की बुवाई, मॉनसून की प्रगति, घरेलू मांग और वैश्विक बाज़ार की स्थिति पर निर्भर करेगा। हालांकि, जब तक पुराने सीज़न का स्टॉक सीमित रहेगा, तब तक कीमतों को समर्थन मिलने की संभावना बनी रह सकती है। इसलिए जिन किसानों के पास अभी भी कपास का स्टॉक है, वे बाज़ार की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए उचित समय पर बिक्री का फैसला कर सकते हैं।और पढ़ें :- रुपया 18 पैसे मजबूत होकर 95.21 प्रति डॉलर पर खुला.

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