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महाराष्ट्र- चोपड़ा तालुका में सूखे से किसान परेशान

महाराष्ट्र (चोपड़ा तालुका) में सूखा संकट: बुवाई के बाद किसान परेशानहालांकि पिछले दो दिनों से चोपड़ा तालुका में आसमान में बादल छाए हुए हैं और बारिश की उम्मीद जगी है, लेकिन असल में बारिश न होने से किसान बहुत चिंतित हैं। जून का तीसरा हफ़्ता खत्म हो रहा है—आज 23 जून है—फिर भी बारिश का कोई नाम-ओ-निशान नहीं है।मानसून की शुरुआत में समय पर बारिश की उम्मीद में, किसानों ने महंगे खाद और बीज खरीदकर अपने खेत तैयार किए और बुवाई पूरी कर ली थी। लेकिन, लंबे समय से बारिश न होने के कारण उन्हें डर सता रहा है कि उनकी मेहनत और निवेश बेकार न चला जाए। चोपड़ा तालुका के किसान—चाहे वे बारिश पर निर्भर ज़मीन पर खेती कर रहे हों या सिंचाई वाली ज़मीन पर—अब बेचैनी से आसमान की ओर देख रहे हैं और 'चातक' पक्षी की तरह बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं। बादल तो आते हैं, लेकिन बारिश नहीं होती, जिससे किसान हर दिन निराश हो रहे हैं। अगर आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो किसानों को लगभग निश्चित रूप से दोबारा फसल की बुवाई करने के संकट का सामना करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति उन पर भारी आर्थिक बोझ डालेगी।सिर्फ़ बारिश पर निर्भर खेतों वाले किसान ही परेशान नहीं हैं; जिनके पास सिंचाई की सुविधा है, वे भी भारी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। पूरे तालुका में भीषण गर्मी के कारण कुओं, बोरवेल और पानी के अन्य स्रोतों का जलस्तर तेज़ी से गिर गया है। खेतों में पानी की कमी से बागवानी की खड़ी फ़सलों को भारी नुकसान होने का खतरा है। मौसम की इस अनिश्चितता ने किसानों की खेती की योजनाओं को बिगाड़ दिया है।और पढ़ें :- रुपया डॉलर के मुकाबले 23 पैसे मजबूत होकर 94.66 पर बंद हुआ।

कमजोर मानसून से खरीफ फसलों पर खतरा

कमज़ोर मॉनसून से खरीफ फसलों पर संकट, 315 जिलों के लिए केंद्र ने बनाई आपात योजनाइस साल कमजोर मॉनसून की आशंका ने खरीफ फसलों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को बताया कि कम बारिश से प्रभावित होने वाले जिलों के लिए कृषि मंत्रालय ने आपातकालीन योजनाएं तैयार कर ली हैं। सरकार ने ऐसे करीब 315 जिलों की पहचान की है, जहां सामान्य से कम बारिश होने पर खेती पर असर पड़ सकता है।राज्यों के कृषि मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों और जिला कलेक्टरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई समीक्षा बैठक में चौहान ने कहा कि इन जिलों में स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। इनमें से 111 जिलों को उच्च प्राथमिकता श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि यहां सिंचाई सुविधा 25 प्रतिशत या उससे कम है। इन क्षेत्रों में कम बारिश का सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ने की संभावना है।इसके अलावा 76 जिलों को मध्यम प्राथमिकता श्रेणी में रखा गया है, जहां 25 से 50 प्रतिशत तक सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। वहीं 128 जिले कम प्राथमिकता वाले हैं, जहां बांधों और अन्य जल स्रोतों के कारण सिंचाई की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। प्रभावित जिलों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे राज्यों के कई क्षेत्र शामिल हैं।कृषि मंत्री ने बताया कि कमजोर मॉनसून की स्थिति के पीछे अल नीनो प्रभाव को एक कारण माना जा रहा है। देश में अब तक सामान्य से करीब 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस मॉनसून सीजन में दीर्घकालिक औसत बारिश का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो यह लंबे समय में कमजोर मॉनसून वर्षों में शामिल हो सकता है।मॉनसून की धीमी रफ्तार का असर खरीफ फसलों की बुआई पर भी पड़ सकता है। इसे देखते हुए दिल्ली में “अल नीनो मॉनिटरिंग सेल” और “क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप” बनाया गया है, जो बारिश, बुआई, फसल की स्थिति, बाजार संकेतों और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता की समीक्षा करेगा।सरकार ने राज्यों को कंट्रोल रूम स्थापित करने और केंद्र के साथ बेहतर तालमेल के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश दिए हैं। वहीं ICAR और ICAR-CRIDA ने जिलों के लिए कृषि आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं, जिनमें वैकल्पिक फसलें, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण और किसानों के जोखिम को कम करने जैसे उपाय शामिल हैं।और पढ़ें :- खरीफ बुआई में तेजी, कपास का रकबा घटा

खरीफ बुआई में तेजी, कपास का रकबा घटा

अल नीनो की चिंता के बीच खरीफ बुवाई में तेजी, धान और ‘श्री अन्न’ ने दिखाई मजबूत बढ़तअल नीनो जैसी मौसम संबंधी चुनौतियों और मॉनसून को लेकर अनिश्चितताओं के बावजूद देश में खरीफ फसलों की बुवाई उत्साहजनक रफ्तार से आगे बढ़ रही है। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 19 जून तक खरीफ फसलों का कुल रकबा 119.90 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष इसी अवधि के 117.95 लाख हेक्टेयर की तुलना में 1.7 प्रतिशत अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि किसानों ने मौसम संबंधी आशंकाओं के बावजूद बुवाई गतिविधियों को जारी रखा है।कपास की बुवाई में बड़ी गिरावटदूसरी ओर, कपास की खेती इस बार कमजोर नजर आ रही है। 19 जून तक कपास का रकबा 17.13 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 22.82 लाख हेक्टेयर था। यानी करीब 5.69 लाख हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी प्रमुख वजह मौसम नहीं बल्कि बाजार और नीति संबंधी कारक हैं। कॉटन पर आयात शुल्क शून्य किए जाने से किसानों को बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद कम हुई है, जिसका असर बुवाई पर पड़ा है।तिलहन फसलों में भी नरमीतिलहन फसलों का कुल रकबा घटकर 7.24 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल 8.11 लाख हेक्टेयर था। सोयाबीन की खेती में 1.20 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है, जबकि तिल के रकबे में भी हल्की गिरावट देखी गई है।आगे की बारिश तय करेगी तस्वीरकुल मिलाकर खरीफ 2026 सीजन की शुरुआत सकारात्मक संकेत दे रही है। अल नीनो और कमजोर मॉनसून की आशंकाओं के बावजूद किसानों ने बुवाई की गति बनाए रखी है। हालांकि आने वाले हफ्तों में होने वाली बारिश ही यह तय करेगी कि यह शुरुआती बढ़त पूरे सीजन में कितनी टिकाऊ साबित होती है।और पढ़ें :- बीकेएस ने Bt कपास हटाने की मांग की, HT Bt पर आंदोलन की चेतावनी

बीकेएस ने Bt कपास हटाने की मांग की, HT Bt पर आंदोलन की चेतावनी

Bt कॉटन बीजों को डी-नोटिफाई करने की मांग, HT Bt कॉटन को मंजूरी देने पर आंदोलन की चेतावनीनई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से संबद्ध भारतीय किसान संघ (BKS) ने केंद्र सरकार से Bt कॉटन बीजों को तत्काल डी-नोटिफाई करने और देश में सभी जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार विवादित हर्बिसाइड-टॉलरेंट (HT) Bt कॉटन को मंजूरी देती है तो वह देशव्यापी आंदोलन शुरू करेगा।BKS के महासचिव मोहिनी मोहन मिश्रा ने मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि Bt कॉटन की किस्में (BG-I और BG-II) किसानों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी हैं। उनका आरोप है कि 2002 में Bt कॉटन को अपनाने के बाद देश में कपास उत्पादन में गिरावट आई है और किसानों की पारंपरिक तथा देसी कपास किस्में धीरे-धीरे समाप्त हो गई हैं।मिश्रा ने कहा कि Bt कॉटन को अधिक उत्पादन देने वाली तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन यह दावा वास्तविकता में साबित नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि यह तकनीक पिंक बॉलवर्म जैसे प्रमुख कीटों को नियंत्रित करने में भी विफल रही है। उनके अनुसार, देश के विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए उपयुक्त देसी कपास किस्मों की उपेक्षा के कारण उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।उन्होंने केंद्र सरकार को लिखे गए एक पत्र का उल्लेख करते हुए कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मामले में हस्तक्षेप की मांग की। BKS ने आरोप लगाया कि GM फसलों के समर्थन में किसानों को भ्रामक जानकारी दी गई है और इसकी जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।संगठन ने यह भी कहा कि विदेशी कंपनियों के प्रभाव के कारण खेती में रासायनिक उत्पादों का अत्यधिक उपयोग बढ़ा है। ग्लाइफोसेट और पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे रसायनों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग करते हुए मिश्रा ने इनके स्वास्थ्य संबंधी संभावित खतरों पर चिंता जताई।इस अवसर पर पद्मश्री सम्मानित किसान नेता श्रीरंग दादा लाड ने कहा कि कपास किसानों को GM बीजों पर निर्भर रहने के बजाय बेहतर देसी बीजों और वैज्ञानिक खेती तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। उन्होंने अपनी विकसित कपास उत्पादन तकनीक को देशभर के किसानों तक पहुंचाने के लिए सरकार से सहयोग की अपील की।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 16 पैसे गिरकर 94.89 पर खुला

अदिलाबाद में जल्दी बोई कपास बनी नुकसान का सौदा

आदिलाबाद में कपास की जल्दी बुआई किसानों पर पड़ी भारी, दोबारा करनी पड़ रही बुवाईआदिलाबाद: पुराने आदिलाबाद जिले में कपास की जल्द बुआई करने वाले किसानों को इस खरीफ सीजन में नुकसान उठाना पड़ रहा है। जून के पहले सप्ताह में बोए गए कई खेतों में कपास के बीज पर्याप्त नमी और बारिश के अभाव में ठीक से अंकुरित नहीं हो सके, जिसके कारण किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ रही है।किसानों का कहना है कि उन्होंने कपास के बीज करीब 800 रुपये प्रति पैकेट की दर से खरीदे थे। इसके अलावा खेत तैयार करने और मजदूरी पर भी अतिरिक्त खर्च करना पड़ा। मानसून समय पर सक्रिय नहीं होने से शुरुआती बुआई करने वाले किसानों की लागत बढ़ गई है।कृषि विभाग के अनुसार, जिले में इस समय कपास, अरहर और सोयाबीन की बुवाई का कार्य चल रहा है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में एक-दो बार बारिश हुई, लेकिन शुरुआती दौर में बोए गए कपास के बीजों को पर्याप्त नमी नहीं मिल सकी। परिणामस्वरूप कई खेतों में अंकुरण कमजोर रहा और किसानों को खाली स्थानों पर दोबारा बीज डालने पड़ रहे हैं।अनौपचारिक अनुमान बताते हैं कि जिले में अब तक सामान्य खेती क्षेत्र के लगभग 60 प्रतिशत हिस्से में कपास की बुवाई पूरी हो चुकी है। पिछले वर्ष आदिलाबाद में करीब 4.30 लाख एकड़ भूमि पर कपास की खेती की गई थी।आदिलाबाद ग्रामीण मंडल के मामिदिगुडा गांव के किसान मारसाकोला सारंगाराव ने बताया कि उन्होंने 5 जून को 18 एकड़ भूमि में कपास की बुवाई की थी। इसके लिए 20 पैकेट बीज का उपयोग किया गया और करीब 30 हजार रुपये खर्च हुए। लेकिन बारिश नहीं होने से फसल का अंकुरण प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि बुआई के बाद अच्छी बारिश की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हुई।जिला कृषि अधिकारी रविंदर सिंह ने बताया कि जिले में चार लाख एकड़ के लक्ष्य के मुकाबले अब तक 1.60 लाख एकड़ क्षेत्र में कपास की बुवाई हो चुकी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि हाल में हुई बारिश से शुरुआती दौर में बोए गए बीजों के अंकुरण और फसल की बढ़वार में सुधार होगा। वहीं कुछ किसान स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई की मदद से अपनी फसल बचाने का प्रयास कर रहे हैं।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 16 पैसे गिरकर 94.89 पर खुला

खरीफ बुवाई में तेजी, धान और मोटे अनाज आगे

खरीफ बुआई में तेजी, धान और मोटे अनाज आगे; तिलहन व कपास में गिरावटनई दिल्ली: केंद्र सरकार के अनुसार, चालू खरीफ सीज़न में 19 जून तक कुल बुआई का रकबा बढ़कर 119.90 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 117.95 लाख हेक्टेयर था।कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि कई प्रमुख फसलों की बुआई में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।सबसे अधिक वृद्धि धान की बुआई में देखी गई है। धान का रकबा पिछले वर्ष के 8.09 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 12.36 लाख हेक्टेयर हो गया, यानी 4.27 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है।दालों, विशेष रूप से उड़द और मूंग, की बुआई भी बेहतर रही। इनका कुल रकबा 6.39 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 7.21 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है।इसी तरह मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा और रागी) की बुआई में भी तेज़ वृद्धि दर्ज की गई। इनका रकबा पिछले वर्ष के 9.82 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 12.43 लाख हेक्टेयर हो गया।गन्ने की बुआई में भी मामूली बढ़ोतरी हुई है और इसका रकबा 56.64 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 57.31 लाख हेक्टेयर हो गया है।हालांकि, तिलहन फसलों की बुआई अब तक अपेक्षाकृत कमजोर रही है। 19 जून तक तिलहन का कुल रकबा 7.24 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 8.11 लाख हेक्टेयर था। तिलहन फसलों में सोयाबीन की बुआई में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली, जो 2.50 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.30 लाख हेक्टेयर रह गई।वहीं, कपास की बुआई में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। इसका रकबा पिछले वर्ष के 22.82 लाख हेक्टेयर से घटकर 17.13 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 5.69 लाख हेक्टेयर की कमी आई है।खरीफ बुआई के ये मिश्रित रुझान ऐसे समय सामने आए हैं, जब हाल ही में प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता वाली आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने विपणन वर्ष 2026-27 के लिए 14 खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि को मंजूरी दी है।और पढ़ें :- मानसून में देरी और वैश्विक तेजी से कपास कीमतों में उछाल

मानसून में देरी और वैश्विक तेजी से कपास कीमतों में उछाल

मानसून में देरी और वैश्विक तेजी से कपास कीमतों में उछालअंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास वायदा कीमतों में मजबूती और देश के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की धीमी प्रगति के कारण भारतीय कपास बाजार में हाल के दिनों में तेजी देखने को मिली है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक संकेतों और बुआई में देरी ने घरेलू कीमतों को सहारा दिया है।पिछले कुछ दिनों में कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) द्वारा निर्धारित कपास कीमतों में लगभग ₹1,100 प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 19 जून तक देश में कपास की बुआई 25 प्रतिशत घटकर 17.13 लाख हेक्टेयर रह गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 22.82 लाख हेक्टेयर थी। मानसून के धीमे आगमन के कारण कई क्षेत्रों में बुआई प्रभावित हुई है।कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) की क्रॉप कमेटी के चेयरमैन अतुल गनात्रा के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी कीमतों में बढ़ोतरी का प्रमुख कारण है। ICE दिसंबर कॉटन फ्यूचर्स 75 सेंट प्रति पाउंड से बढ़कर लगभग 80 सेंट प्रति पाउंड तक पहुंच गए हैं, जबकि जुलाई फ्यूचर्स करीब 76 सेंट प्रति पाउंड पर कारोबार कर रहे हैं।अकोला के कपास ब्रोकर अरुण खेतान ने बताया कि विदर्भ जैसे प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में अभी बड़े पैमाने पर बुआई शुरू नहीं हुई है। हालांकि, सिंचाई सुविधाओं वाले कुछ किसानों ने बुआई कर ली है। उन्होंने इस वर्ष कपास के कुल रकबे में लगभग 10 प्रतिशत वृद्धि की संभावना जताई।रायचूर के सोर्सिंग एजेंट रामानुज दास बूब ने कहा कि मानसून और उत्पादन को लेकर अनिश्चितता के कारण बाजार में मजबूती बनी हुई है। उन्होंने बताया कि कपास की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन यार्न की कीमतों में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है।इस बीच, CCI कपास की मांग मजबूत बनी हुई है। पिछले सप्ताह लगभग 7 लाख गांठों की बिक्री हुई। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी गुणवत्ता वाले कपास की सीमित उपलब्धता, घटते स्टॉक और स्पिनिंग मिलों की निरंतर खरीदारी से घरेलू बाजार को समर्थन मिल रहा है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 1 पैसे की गिरावट के साथ 94.69 पर खुला

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