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परभणी जिले में कपास की खरीद कीमतों में सुधार से किसानों को राहत।

परभणी जिले में कॉटन खरीद कीमत में सुधारपरभणी जिले में कपास के दामों में हाल के दिनों में सुधार देखा गया है। परभणी, मनावत और सेलू के प्रमुख बाजारों में निजी खरीदी दरें बढ़कर औसतन करीब 8,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं और कीमतें अब 9,000 रुपये प्रति क्विंटल की ओर बढ़ती दिखाई दे रही हैं। इससे उन किसानों को राहत मिली है, जिन्होंने बेहतर भाव की उम्मीद में अब तक अपनी उपज नहीं बेची थी।4 अप्रैल को परभणी कृषि उपज मंडी समिति में कपास का भाव 8,300 से 8,660 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहा। मनावत मंडी में यह 8,440 से 8,611 रुपये प्रति क्विंटल और सेलू मंडी में 8,480 से 8,740 रुपये प्रति क्विंटल के बीच दर्ज किया गया। अनुमान है कि जिले के लगभग 20 प्रतिशत किसानों के पास अभी भी कपास का स्टॉक बचा हुआ है।सीजन की शुरुआत (अक्टूबर-नवंबर 2025) में निजी खरीदी दरें 7,000 से 7,200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच थीं, जबकि CCI ने 7,767 से 8,060 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदी की। जनवरी में निजी दरें बढ़कर 8,400 रुपये तक पहुंचीं, जिससे CCI की खरीदी धीमी पड़ गई। बाद में कीमतें गिरकर फिर 7,000 रुपये तक आईं, तो किसानों ने दोबारा CCI का रुख किया।अब पिछले एक सप्ताह से कीमतों में फिर से तेजी देखी जा रही है, जिससे किसानों में संतोष का माहौल है। FAQ ग्रेड कपास को 8,300 से 8,660 रुपये प्रति क्विंटल (औसत 8,545 रुपये) का भाव मिला, जबकि फरदाद कपास 7,200 से 7,905 रुपये प्रति क्विंटल बिका।मांडाखली गांव के किसान रमेश राउत के अनुसार, गांव के 20–25 प्रतिशत किसानों के पास अभी भी कपास बचा हुआ है। उन्होंने बताया कि शुरुआती जरूरतों के लिए उन्होंने 25 क्विंटल कपास 7,850 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचा था, जबकि अभी भी उनके पास 50 क्विंटल स्टॉक मौजूद है, जिसे वे 9,000 रुपये के आसपास भाव मिलने पर बेचने की योजना बना रहे हैं।और पढ़ें:- रुपया 04 पैसे बढ़त 93.02 पर खुला.

धागे के दाम बढ़े, बुनकरों पर बढ़ा आर्थिक दबाव

सूती व पॉलिस्टर धागे की कीमतों में बढ़ोतरी से बुनकरों पर दबावमानपुर (बिहार)-  सूती और पॉलिस्टर धागों की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने टेक्सटाइल उद्योग, खासकर बुनकर समुदाय, के सामने गंभीर आर्थिक चुनौती खड़ी कर दी है। सूती धागे के दाम में लगभग 15% और पॉलिस्टर धागे में करीब 50% तक की वृद्धि ने उत्पादन लागत को काफी बढ़ा दिया है, जिससे छोटे और मध्यम बुनकरों पर सीधा असर पड़ रहा है।स्थिति और जटिल इसलिए हो गई है क्योंकि बढ़ती लागत के बावजूद तैयार कपड़ों की कीमतों में समान अनुपात में वृद्धि करना संभव नहीं है। नतीजतन, बुनकरों का मुनाफा लगातार घटता जा रहा है और कई इकाइयाँ आर्थिक दबाव झेल रही हैं।इस संकट को देखते हुए बुनकर संगठनों ने राज्य सरकार से सूती धागे पर 15% सब्सिडी देने की मांग की है, ताकि उन्हें तत्काल राहत मिल सके और उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहे।बुनकर प्रतिनिधियों का कहना है कि कच्चे माल की कीमतों में यह असामान्य वृद्धि पूरे उद्योग के लिए चिंताजनक है। उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार से स्पष्ट और प्रभावी रणनीति पेश करने की मांग की है, जिससे इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके।विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार में बुनकरी केवल एक पारंपरिक कला ही नहीं, बल्कि कृषि के बाद रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में काम करता है। यदि कच्चे माल की कीमतों में लगातार वृद्धि जारी रही, तो इससे लाखों परिवारों की आजीविका प्रभावित हो सकती है और सूती वस्त्र उद्योग की स्थिरता तथा लाभप्रदता पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।और पढ़ें:- कपास 9,000 के करीब, फिर भी किसान और व्यापारी संकट में

कपास 9,000 के करीब, फिर भी किसान और व्यापारी संकट में

कपास की कीमतें 9,000 रुपये के करीब पहुँच रही हैं, लेकिन किसान अब भी संकट में हैं और व्यापारी भी दबाव में दिखाई दे रहे हैं।जलगांव में पिछले कुछ हफ्तों से कपास के दाम लगातार बढ़ते हुए 8,500 से 9,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँच गए हैं। कुछ जगहों पर अच्छी गुणवत्ता वाले कपास के लिए इससे भी ज्यादा कीमत मिल रही है। पहली नजर में यह किसानों के लिए राहत की खबर लगती है, क्योंकि दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग और चिंताजनक है।सीजन की शुरुआत में बड़ी मात्रा में कपास बाजार में आ गई थी, जिससे उस समय कीमतें 7,000 से 7,500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहीं। अब बाजार में स्टॉक कम हो गया है, जबकि मिलों और व्यापारियों की मांग लगातार बनी हुई है। इस मांग और आपूर्ति के असंतुलन के कारण कीमतों में तेजी देखी जा रही है।व्यापारियों के बीच खरीद की होड़ बढ़ गई है और कई जगहों पर नीलामी में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूद परिस्थितियां, उत्पादन में कमी, निर्यात मांग और यार्न उद्योग की बढ़ती जरूरतें—ये सभी कारक आगे भी कीमतों को ऊपर ले जा सकते हैं।लेकिन असली सवाल यह है कि इस बढ़ती कीमत का फायदा किसानों को कितना मिल रहा है। हकीकत यह है कि अधिकांश किसानों ने अपनी फसल पहले ही कम दाम पर बेच दी थी। वित्तीय दबाव, कर्ज चुकाने की मजबूरी, घरेलू खर्च और भंडारण की कमी के कारण वे अपनी उपज लंबे समय तक रोक नहीं पाए।अब जब कीमतें बढ़ गई हैं, तो किसानों के पास बेचने के लिए कपास बचा ही नहीं है। ऐसे में इस तेजी का सीधा लाभ व्यापारियों, बिचौलियों और स्टॉकिस्टों को मिल रहा है, जिन्होंने पहले से कपास का भंडारण कर रखा था और अब ऊंचे दाम पर बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।यह स्थिति कृषि व्यवस्था की बुनियादी खामियों को उजागर करती है। एक ओर बाजार में तेजी है, तो दूसरी ओर किसान उससे वंचित रह जाते हैं। मेहनत करने वाला किसान घाटे में रहता है, जबकि मुनाफा बाजार के बीच के खिलाड़ियों तक सीमित हो जाता है।इस समस्या के समाधान के लिए किसानों को बेहतर भंडारण सुविधाएं उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। गांवों में आधुनिक गोदाम और कोल्ड स्टोरेज विकसित किए जाने चाहिए, ताकि किसान अपनी उपज को सही समय तक सुरक्षित रख सकें।इसके साथ ही, किसानों को कम ब्याज दर पर आसानी से ऋण उपलब्ध होना चाहिए, जिससे उन्हें तुरंत फसल बेचने की मजबूरी न रहे। बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने, ई-एनएएम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को मजबूत करने और किसान उत्पादक कंपनियों को सशक्त बनाने की भी जरूरत है। इससे किसान सीधे बाजार से जुड़कर अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।और पढ़ें:- रुपया 04 पैसे बढ़त 93.06 पर खुला.

आगामी कॉटन सीज़न में सकारात्मक संकेत

क्या आने वाला सीज़न कॉटन के लिए अच्छा रहेगा?हमने खाड़ी क्षेत्र में चल रहे युद्ध और आने वाले मॉनसून पर  एल नीनो के संभावित प्रभाव का अध्ययन किया है, ताकि यह समझा जा सके कि इन परिस्थितियों का देश, खासकर महाराष्ट्र, में कॉटन की खेती पर क्या असर पड़ेगा और किसानों को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़राइल संघर्ष को एक महीना हो चुका है। इस युद्ध को लेकर कई अनिश्चितताएँ हैं—यह कब तक चलेगा, क्या इसका दायरा और बढ़ेगा, और क्या यह किसी बड़े वैश्विक संकट का रूप ले सकता है। भले ही युद्ध में अस्थायी विराम आए, लेकिन स्थिति सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है।इन अंतरराष्ट्रीय हालातों को देखते हुए, भारत में—विशेषकर महाराष्ट्र जैसे प्रमुख राज्यों में—कॉटन किसानों, खेत मजदूरों और इससे जुड़े उद्योगों के भविष्य का आकलन करना जरूरी हो जाता है।भारत में लगभग 16% कृषि क्षेत्र में कॉटन की खेती होती है, जिसकी बुवाई अप्रैल से शुरू होती है। देश के करीब 75% कॉटन क्षेत्र मध्य भारत—महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक—में स्थित है, जहाँ जून में मॉनसून के साथ इसकी खेती होती है। अकेले महाराष्ट्र में लगभग 33% कॉटन क्षेत्र है, जिससे लाखों किसानों की आजीविका जुड़ी है।इस सीज़न में कॉटन की खेती के लिए तीन मुख्य कारक महत्वपूर्ण रहेंगे:1. मॉनसून और वर्षा की स्थिति   वर्तमान में प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति बन रही है। अनुमान है कि जून से अगस्त के बीच इसका प्रभाव बढ़ेगा, जिससे मॉनसून सामान्य से कमजोर या औसत से कम रह सकता है। इसका सीधा असर कॉटन उत्पादन पर पड़ सकता है।2. फर्टिलाइज़र की उपलब्धता   खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के कारण भारत की इंपोर्ट सप्लाई प्रभावित हो सकती है। भारत की लगभग 85% फर्टिलाइज़र और 20% क्रूड ऑयल सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती है। यदि यहाँ व्यवधान आता है, तो यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों की कमी हो सकती है, जिससे खेती की लागत और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे।3. क्रूड ऑयल और टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर असर   क्रूड ऑयल की आपूर्ति प्रभावित होने से सिंथेटिक फाइबर (जैसे पॉलिएस्टर और नायलॉन) की लागत बढ़ सकती है। इससे प्राकृतिक फाइबर—जैसे कॉटन—की मांग बढ़ने की संभावना है। भारत में पहले से ही प्राकृतिक टेक्सटाइल की खपत अधिक है, और यह रुझान आगे और मजबूत हो सकता है।और पढ़ें:- CCI ने कॉटन खरीद में बढ़त बनाई, प्राइवेट सेक्टर भी सक्रिय

CCI ने कॉटन खरीद में बढ़त बनाई, प्राइवेट सेक्टर भी सक्रिय

CCI ने 11.05 लाख क्विंटल कॉटन खरीदा, प्राइवेट सेक्टर की खरीद 9.38 लाख क्विंटलरूरल इकॉनमी: परभणी और हिंगोली जिलों में 27 मार्च तक कुल 20.43 लाख क्विंटल कपास की खरीद दर्ज की गई। इसमें कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने 11.05 लाख क्विंटल, जबकि प्राइवेट सेक्टर ने 9.38 लाख क्विंटल कपास खरीदा। इस समय बाजार में कपास की शुरुआती कीमतों में नरमी देखी जा रही है।2025-26 के खरीद सीजन की शुरुआत में किसानों ने CCI को प्राथमिकता दी, क्योंकि खुले बाजार में कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम थीं। दोनों जिलों के 14 केंद्रों पर 88,377 किसानों ने ‘कपास किसान मोबाइल ऐप’ के जरिए CCI केंद्रों पर बिक्री के लिए पंजीकरण कराया।हालांकि, जनवरी में खुले बाजार में कीमतों में तेजी आने के बाद CCI की खरीद धीमी पड़ गई। कई किसानों ने बेहतर दाम की उम्मीद में कपास रोक ली थी, यह सोचकर कि कीमतें 10,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच सकती हैं। लेकिन फरवरी में कीमतों में गिरावट आने से किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका।सिंचाई की उपलब्धता के कारण कई किसानों ने फरदाद (लेट हार्वेस्ट) फसल ली, जिसकी कटाई अभी जारी है। बाजार में इसकी आवक बनी हुई है और फरदाद कपास को लगभग 6,000 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है।परभणी जिले का प्रदर्शनपरभणी जिले में कुल 18.21 लाख क्विंटल कपास की खरीद हुई। CCI को कपास बेचने के लिए परभणी, बोरी, जिंतूर, सेलू, पाथरी, सोनपेठ, गंगाखेड, पालम और ताड़कलास की 10 कृषि उपज मंडी समितियों के अंतर्गत 74,932 किसानों ने पंजीकरण कराया।CCI ने 46 जिनिंग फैक्ट्रियों के माध्यम से 9,63,907 क्विंटल कपास खरीदा, जहां प्रति क्विंटल कीमत 7,710 से 8,060 रुपये रही। वहीं, प्राइवेट व्यापारियों ने 26 जिनिंग फैक्ट्रियों के जरिए 8,57,533 क्विंटल कपास खरीदा, जिसकी औसत कीमत 7,000 से 8,365 रुपये प्रति क्विंटल रही।कुल मिलाकर, परभणी जिले में CCI और प्राइवेट सेक्टर ने मिलकर 18,21,440 क्विंटल कपास की खरीद की।और पढ़ें:-  निर्यातकों की मांग: कपास आयात पर शुल्क हटाने की अपील

कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी में छूट की अपील

टेक्सटाइल निर्यातकों ने कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी में राहत की मांग कीपुणे: टेक्सटाइल और गारमेंट निर्यातकों ने सरकार से कॉटन पर लगाई गई 11% इंपोर्ट ड्यूटी को अस्थायी रूप से हटाने की अपील की है। उनका कहना है कि घरेलू कॉटन की बढ़ती कीमतें उनके मुनाफे को प्रभावित कर रही हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो रही है।पिछले महीने स्थानीय कॉटन की कीमतों में 7-8% तक वृद्धि हुई है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि कच्चे तेल की महंगी कीमतों के चलते सिंथेटिक फाइबर महंगा हो गया है, और मिलें फिर से नेचुरल फाइबर की ओर लौट रही हैं।इंडस्ट्री ने पिछले साल की तरह अस्थायी राहत की मांग की है। अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच सरकार ने इसी तरह की छूट देकर सप्लाई पर दबाव कम किया था। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में कॉटन की कीमतें 11-12% बढ़ीं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में 12-15% तक वृद्धि दर्ज की गई।निर्यातकों का कहना है कि भारत को विदेशी खरीदारों की मांग के अनुसार लॉन्ग-स्टेपल और कंटैमिनेशन-फ्री कॉटन के लिए इंपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ता है। टेक्सटाइल वैल्यू चेन का करीब 60-70% हिस्सा कॉटन पर आधारित है। इसी वजह से इंडस्ट्री ने केंद्र सरकार से 3 से 6 महीने के लिए इंपोर्ट ड्यूटी में छूट देने की अपील की है।उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक घटनाओं के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, जिससे टेक्सटाइल सेक्टर में कई कच्चे माल 10% से 60% तक महंगे हो गए हैं। सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है। वहीं, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को ड्यूटी-फ्री कच्चा माल मिलने के कारण वे कीमतों में बढ़त बनाए हुए हैं।और पढ़ें:- CCI ने कपास कीमतें ₹2,000 तक बढ़ाईं, साप्ताहिक बिक्री 6.76 लाख गांठ पार

CCI ने कपास कीमतें ₹2,000 तक बढ़ाईं, साप्ताहिक बिक्री 6.76 लाख गांठ पार

CCI ने कपास की कीमतें ₹1,800- ₹2,000 प्रति कैंडी बढ़ाईं; साप्ताहिक नीलामी बिक्री 6.76 लाख गांठों के पारकॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने 30 मार्च से 03 अप्रैल 2026 के सप्ताह के दौरान अपनी कपास की कीमतों में ₹1,800- ₹2,000 प्रति कैंडी की बढ़ोतरी की। इन नीलामियों में मिलों और कपास व्यापारियों की ओर से ज़ोरदार भागीदारी देखने को मिली, जिसके परिणामस्वरूप 2025–26 सीज़न से लगभग 6,76,200 गांठों की साप्ताहिक बिक्री हुई।साप्ताहिक बिक्री रिपोर्ट 30 मार्च, 2026 (सोमवार):सप्ताह की शुरुआत ज़ोरदार रही, जिसमें एक ही दिन में सबसे ज़्यादा 2,88,700 गांठों की बिक्री हुई। मिलों ने 1,13,700 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों का हिस्सा ज़्यादा रहा, जिन्होंने 1,75,000 गांठें खरीदीं।01 अप्रैल, 2026 (बुधवार):बिक्री में थोड़ी गिरावट आई, और इस दिन 2,44,300 गांठें बिकीं। मिलों ने 1,13,000 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों ने 1,31,300 गांठें खरीदीं।02 अप्रैल, 2026 (गुरुवार):सप्ताह का समापन 1,43,200 गांठों की बिक्री के साथ हुआ। मिलों ने 74,000 गांठें खरीदीं, जबकि व्यापारियों का दबदबा रहा, जिन्होंने 69,200 गांठें खरीदीं।कुल बिक्री का अपडेटCCI की कुल बिक्री अब तक पहुँच चुकी है:2025–26 सीज़न: 45,34,200 गांठें2024–25 सीज़न: 98,85,100 गांठें

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