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कपास पर आयात शुल्क पूरी तरह समाप्त करने की मांग तेज

‘कपास पर आयात शुल्क पूरी तरह हटाने की मांग’कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) द्वारा जारी एक नए अध्ययन में कपास पर वर्तमान में लगने वाले 11% आयात शुल्क को पूरी तरह से खत्म करने की मांग की गई है।"भारत में कपास की आपूर्ति, मूल्य निर्धारण और व्यापार नीति का आर्थिक विश्लेषण" शीर्षक वाली यह रिपोर्ट बताती है कि यह आयात शुल्क देश के कपड़ा और परिधान क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर बुरा असर डाल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि जब घरेलू उत्पादन कम हो, तो उसे आयातित कपास तक आसान और भरोसेमंद पहुंच मिले।इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) और Gherzi द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि कपास पर आयात शुल्क अगस्त से दिसंबर 2025 तक अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया था, लेकिन बाद में 1 जनवरी 2026 से इसे फिर से लागू कर दिया गया।रिपोर्ट में बताया गया है कि जब से 2021 में यह शुल्क पहली बार लागू किया गया था, तब से दो बार अस्थायी राहत दी गई है; हालांकि, अब उद्योग इसे स्थायी रूप से हटाने की मांग कर रहा है। उद्योग का तर्क है कि भारत के मुख्य प्रतिस्पर्धी देश—श्रीलंका, बांग्लादेश, वियतनाम और पाकिस्तान—कपास के आयात पर इस तरह के प्रतिबंध नहीं लगाते हैं।यह अध्ययन कपास के लिए एक 'रणनीतिक भंडार' (Strategic Reserve) स्थापित करने का भी सुझाव देता है, जो चीन के मॉडल पर आधारित हो। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में कपड़ा और परिधान का निर्यात 2.2% घटकर 35.79 अरब डॉलर रह गया।गुरुवार को कोयंबटूर में आयोजित एक मीडिया ब्रीफिंग में बोलते हुए, CITI के अध्यक्ष अश्विन चंद्रन ने कहा कि Gherzi-ICAC की रिपोर्ट कपड़ा और परिधान उद्योग के लिए 2030 तक 350 अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करने के लिए एक व्यावहारिक और विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करती है।इस बीच, सदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (SIMA) के महासचिव के. सेल्वाराजू ने बताया कि पिछले तीन वर्षों में कपास की खेती के तहत आने वाला क्षेत्र लगभग 20% कम हो गया है, और भारत में उत्पादकता का स्तर काफी कम बना हुआ है। उन्होंने कहा कि 2030 का लक्ष्य हासिल करने के लिए, उद्योग को लगभग 15% की वार्षिक दर से बढ़ने की आवश्यकता होगी। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में, यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य प्रतीत होता है।उन्होंने यह भी बताया कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ गई है। इसके अलावा, गैस की कमी के साथ-साथ तेल-आधारित कच्चे माल, रंगों और रसायनों की बढ़ती कीमतों ने कपड़ा और परिधान उद्योग पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।और पढ़ें:- खानदेश में कपास का रकबा 8 लाख हेक्टेयर से नीचे जाने की आशंका

खानदेश में कपास का रकबा 8 लाख हेक्टेयर से नीचे जाने की आशंका

खानदेश में घटेगी कपास की बुवाई, रकबा 8 लाख हेक्टेयर से नीचे जाने की आशंकाखानदेश क्षेत्र में लगातार दूसरे वर्ष कपास की खेती के रकबे में गिरावट आने की संभावना है। अनुमान है कि इस साल क्षेत्र में कुल कपास बुवाई 8 लाख हेक्टेयर से कम रह सकती है। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा जलगांव जिले का होगा, जहाँ लगभग 4.75 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती होने का अनुमान है। राज्य में सर्वाधिक कपास क्षेत्र वाला जिला होने के कारण जलगांव इस वर्ष भी अपनी अग्रणी स्थिति बनाए रखेगा।हालांकि, जलगांव के साथ-साथ धुले और नंदुरबार जिलों में भी कपास के रकबे में लगातार गिरावट देखी जा रही है।जलगांव जिले में कपास का क्षेत्रफल वर्ष 2022 में 5.67 लाख हेक्टेयर था, जो 2023 में घटकर 5.54 लाख हेक्टेयर और 2024 में 5.11 लाख हेक्टेयर रह गया। पिछले सीजन (2023-24) में यह आंकड़ा लगभग 4.80 लाख हेक्टेयर तक सीमित रहा।पूरे खानदेश क्षेत्र में कपास की खेती 2022 में 8.70 लाख हेक्टेयर थी। यह 2023 में घटकर 8.50 लाख हेक्टेयर और 2024 में 8.30 लाख हेक्टेयर रह गई। इस वर्ष धुले जिले में लगभग 1.60 लाख हेक्टेयर तथा नंदुरबार में करीब 80 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास बुवाई होने का अनुमान है। सबसे अधिक गिरावट धुले जिले में दर्ज की जा रही है। घाटे का सौदा बनती कपास खेतीकपास की खेती किसानों के लिए लगातार अलाभकारी साबित हो रही है। गुलाबी इल्ली (पिंक बॉलवर्म) का बढ़ता प्रकोप, मजदूरों की कमी और बाजार में कपास को कम दाम मिलने जैसी समस्याओं ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि सूखा प्रभावित इलाकों के कई किसान अब कपास छोड़कर सोयाबीन की ओर रुख कर रहे हैं।वहीं, जिन किसानों के पास सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है, वे पपीता और केला जैसी नकदी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कुछ किसानों ने इस वर्ष कपास के लिए निर्धारित रकबा भी कम करने का निर्णय लिया है।जलगांव अब भी राज्य में नंबर वनपिछले कई वर्षों से जलगांव जिला महाराष्ट्र में कपास की खेती के मामले में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। इस वर्ष भले ही जिले में कपास का क्षेत्रफल घटने की संभावना हो, लेकिन राज्य में सर्वाधिक कपास बुवाई वाला जिला जलगांव ही रहेगा।जलगांव के बाद यवतमाल जिले का स्थान आता है, जहाँ हर वर्ष लगभग 4.5 लाख हेक्टेयर या उससे कुछ कम क्षेत्र में कपास की बुवाई की जाती है।और पढ़ें :-रुपया 33 पैसे की गिरावट के साथ 94.58 पर खुला.

अकोट कॉटन मार्केट में बढ़ी तेजी, कपास के दाम ₹10 हजार के पार

अकोट कॉटन मार्केट में तेजी: कपास के दाम 10 हजार रुपये के पारअकोट की कृषि उपज मंडी समिति (APMC) में कपास के दामों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। बुधवार (6 मई) को कपास का अधिकतम भाव 10,005 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया, जिससे किसानों में उत्साह का माहौल है। मंडी में न्यूनतम भाव 8,550 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जबकि प्रतिदिन एक हजार क्विंटल से अधिक कपास की आवक हो रही है।पश्चिमी विदर्भ में उभरती प्रमुख कपास मंडी के रूप में पहचान बना चुके अकोट में इस सीजन की शुरुआत में कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने तीन खरीद केंद्रों के माध्यम से 7.39 लाख क्विंटल से अधिक कपास की खरीद की थी। इसके बाद अप्रैल महीने से निजी व्यापारियों ने भी खरीद शुरू कर दी। अप्रैल से अब तक अकोट मंडी में लगभग 33 हजार क्विंटल कपास की खरीदी-बिक्री हो चुकी है।पिछले कुछ दिनों से कपास के दामों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। सोमवार को जहां अधिकतम भाव 9,500 रुपये प्रति क्विंटल था, वहीं मंगलवार को यह बढ़कर 9,740 रुपये तक पहुंच गया। बुधवार को कपास ने 10 हजार रुपये का आंकड़ा पार कर लिया। बाजार में जारी इस तेजी ने किसानों की उस उम्मीद को मजबूत किया है कि आने वाले दिनों में कपास के दाम और बढ़ सकते हैं।भावों में आई तेजी के चलते किसान अब अपने गोदामों में रखा कपास बाजार में ला रहे हैं। नए सीजन की तैयारियों और नकदी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भी किसान बिक्री कर रहे हैं। विशेष रूप से अच्छी गुणवत्ता वाले कपास की व्यापारियों के बीच अधिक मांग बनी हुई है, जिसके कारण किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं।अकोट क्षेत्र में बड़ी संख्या में कपास प्रसंस्करण इकाइयां संचालित हैं। इन उद्योगों को लगातार कच्चे माल की आवश्यकता रहती है, जिससे बाजार में कपास की मांग बनी हुई है। इसी वजह से कपास के दामों में सकारात्मक रुख देखने को मिल रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मांग इसी तरह बनी रही, तो आने वाले दिनों में कपास के भाव में और तेजी देखने को मिल सकती है।

कपास की कीमतों में भारी उछाल: 8 दिनों में ₹1,000 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी

कपास बाज़ार में जबरदस्त उछाल: सिर्फ़ 8 दिनों में ₹1,000 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरीराज्य के कपास बाज़ारों में इन दिनों जबरदस्त तेजी देखने को मिल रही है। पिछले आठ दिनों के भीतर कपास के दामों में लगभग ₹1,000 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कई प्रमुख बाज़ार समितियों में कपास को ₹9,950 प्रति क्विंटल तक का उच्चतम भाव मिला, जिसे इस सीज़न का अब तक का रिकॉर्ड स्तर माना जा रहा है। बढ़ती कीमतों ने किसानों के चेहरे पर राहत और उम्मीद की नई चमक ला दी है।कुछ ही दिनों पहले तक कपास औसतन ₹8,000 प्रति क्विंटल बिक रहा था, लेकिन अब अधिकांश मंडियों में इसका भाव ₹9,000 के पार पहुँच चुका है। यवतमाल, रालेगांव और हिंगनघाट जैसे प्रमुख बाज़ारों में व्यापारियों और किसानों के बीच खरीद-बिक्री को लेकर उत्साह का माहौल है। बुधवार को यवतमाल मंडी में कपास का भाव करीब ₹9,100 प्रति क्विंटल रहा, जबकि रालेगांव और हिंगनघाट बाज़ार समितियों में ₹9,950 प्रति क्विंटल तक का सर्वोच्च भाव दर्ज किया गया।विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आए बदलावों का सीधा असर घरेलू कपास व्यापार पर दिखाई दे रहा है। पॉलिएस्टर फ़ाइबर की बढ़ती कीमतों के कारण सूती धागे और कपास की मांग में तेजी आई है। इसके अलावा कच्चे तेल की ऊँची कीमतें और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव भी कपास बाज़ार को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर कपास की कीमत, जो पहले 72 से 74 सेंट प्रति पाउंड थी, अब बढ़कर 90 से 92 सेंट प्रति पाउंड तक पहुँच गई है। इसी कारण कपास की एक खांडी की कीमत लगभग ₹45,000 से बढ़कर ₹62,000 तक जा पहुँची है।हालाँकि बाजार में तेजी बनी हुई है, लेकिन कपास की आवक अभी भी सीमित है। अधिकांश किसान पहले ही अपना स्टॉक बेच चुके हैं। उदाहरण के तौर पर, बुधवार को रालेगांव मंडी में केवल 250 क्विंटल कपास की आवक दर्ज की गई। जानकारों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में बाजार में आवक बढ़ती है, तो कपास की कीमतों में और मजबूती देखने को मिल सकती है।और पढ़ें:-

मालवा में कपास की वापसी: किसान पंजाब की देसी PBD88 किस्म की ओर मुड़े

मालवा में कपास की वापसी की उम्मीद: पंजाब की नई देसी किस्म PBD88 पर किसानों की नजरपंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई नॉन-Bt देसी कपास किस्म PBD88 इस खरीफ सीज़न में पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास खेती को नई दिशा दे सकती है। ऐसे समय में जब राज्य लगातार घटते कपास रकबे और बढ़ती खेती लागत की चुनौती से जूझ रहा है, यह किस्म किसानों के लिए उम्मीद बनकर उभरी है।चार वर्षों तक किए गए परीक्षणों और फील्ड ट्रायल्स में PBD88 ने बेहतर पैदावार, कम लागत और कीट प्रतिरोध जैसी खूबियों के कारण वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों के अनुसार, देसी कपास से मिलने वाला रेशा दवा उद्योग में भी व्यावसायिक महत्व रखता है।बठिंडा स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र  के फसल प्रजनक और इस किस्म के प्रमुख वैज्ञानिक Paramjit Singh ने बताया कि PBD88 प्रति एकड़ लगभग 11 क्विंटल उत्पादन देती है। यह पारंपरिक देसी किस्मों से 1–2 क्विंटल अधिक है और हाइब्रिड कपास की औसत पैदावार के बराबर मानी जा रही है।उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में गुलाबी सुंडी, सफेद मक्खी और प्रतिकूल मौसम के कारण पंजाब में कपास का रकबा तेजी से घटा है। लेकिन परीक्षणों में पाया गया कि PBD88 पर गुलाबी सुंडी का असर अपेक्षाकृत कम होता है। यही वजह है कि अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के किसानों को इस नई देसी किस्म को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।राज्य में कपास का रकबा 2021 के 2.52 लाख हेक्टेयर से घटकर 2024 में केवल 95,000 हेक्टेयर रह गया था। हालांकि 2025 में यह बढ़कर 1.2 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा और अब कृषि विभाग ने 2026 के लिए 1.5 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य तय किया है।विशेषज्ञों का कहना है कि PBD88 की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत वाली खेती है। जहां पारंपरिक किस्मों में लगभग छह बार चुनाई करनी पड़ती है, वहीं इस किस्म में केवल तीन बार चुनाई से ही फसल की कटाई पूरी हो जाती है। इसके अलावा, कई प्रमुख कीटों के प्रति प्रतिरोध होने के कारण किसानों का कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है।राज्य कृषि विभाग के अनुसार, पहले सीज़न में किसानों के लिए PBD88 के 100 क्विंटल से अधिक बीज उपलब्ध कराए गए हैं। प्रति एकड़ इसकी बुवाई के लिए लगभग 3 किलो बीज पर्याप्त है। यह उन चुनिंदा कपास किस्मों में शामिल है जिन पर पंजाब सरकार ने 33 प्रतिशत सब्सिडी देने की घोषणा की है।विजय कुमार ने कहा कि देसी कपास किस्मों को बढ़ावा देने का उद्देश्य Bt कपास को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि खेती में विविधता लाना है। उनके अनुसार, देसी कपास में सफेद मक्खी और पत्ती मुड़ने जैसी बीमारियों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता होती है।उन्होंने यह भी बताया कि कई गैर-हाइब्रिड किस्मों में चुनाई में देरी होने पर कपास के गोले टूटकर गिर जाते हैं, जिससे किसानों को नुकसान होता है। लेकिन PBD88 में यह समस्या कम देखी गई है, जिससे किसानों की उपज अधिक सुरक्षित रहती है।   और पढ़ें :- कृषि प्रौद्योगिकी: कपास में अशुद्धियों को रोकने के लिए कच्चे कपास की गांठ (बेल) बनाने की तकनीक

कृषि प्रौद्योगिकी: कपास में अशुद्धियों को रोकने के लिए कच्चे कपास की गांठ (बेल) बनाने की तकनीक

कच्ची कपास में संदूषण कम करने के लिए अभिनव कपास बेलिंग तकनीककपास प्रसंस्करण उद्योग में बढ़ती अशुद्धियाँ एक गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। इन संदूषकों को हटाने के लिए महंगी मशीनरी की आवश्यकता होती है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है और किसानों की आय प्रभावित होती है। इस समस्या के समाधान के रूप में परभणी (महाराष्ट्र) के युवा नवोन्मेषक कृष्ण सोमानी ने एक अभिनव मशीन विकसित की है, जो सीधे खेत में ही कच्चे कपास की गांठें (बेल्स) बनाने में सक्षम है।इस प्रोटोटाइप मशीन के उन्नयन और परीक्षण के लिए Central Institute for Research on Cotton Technology (नागपुर) के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) किया गया है। यह संस्थान कपास प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी अनुसंधान केंद्र है। समस्या की पृष्ठभूमिभारत में कपास की खेती लगभग 13 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है, जिसमें महाराष्ट्र का बड़ा योगदान है। देश में कपास की कटाई प्रायः चरणबद्ध तरीके से (3–4 बार) की जाती है। किसान अपनी पूरी उपज को एक साथ बेचने के लिए इसे महीनों तक घरों में संग्रहित रखते हैं। इस दौरान:*कपास में धूल, कचरा और अन्य अशुद्धियाँ मिल जाती हैं*चूहों और कीटों का प्रकोप बढ़ता है*गुणवत्ता और वजन में कमी आती है (प्रति क्विंटल 5–6 किग्रा तक नुकसान)*आग और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैंसमाधान: खेत पर ही बेलिंग तकनीकइन समस्याओं से निपटने के लिए विकसित यह मशीन कटाई के बाद तुरंत कपास की बेलिंग कर देती है। इससे:*कपास खुला नहीं रहता, इसलिए अशुद्धियाँ कम होती हैं*भंडारण आसान और सुरक्षित होता है*परिवहन लागत और श्रम घटता हैविदेशों में जहां 2.5 टन की बड़ी गांठें बनाई जाती हैं, वहीं इस भारतीय तकनीक में लगभग 35 किलोग्राम की छोटी और हल्की बेल्स बनाई जाती हैं, जिन्हें हाथ से आसानी से उठाया जा सकता है।तकनीकी विशेषताएँ*प्रारंभ में बिजली से संचालित, अब ट्रैक्टर (PTO) आधारित यूनिट उपलब्ध*उत्पादन क्षमता: लगभग 40 बेल प्रति घंटा*साइलेज मशीन को संशोधित कर विकसित (कुल लागत ~₹9–10 लाख)*वर्तमान मशीन कीमत: ₹7–7.5 लाख*प्रति क्विंटल बेलिंग लागत: ₹100–₹150भंडारण और आर्थिक लाभबेल्स के समान आकार के कारण भंडारण अधिक व्यवस्थित हो जाता है—10×10 फुट के कमरे में 35–40 क्विंटल कपास रखा जा सकता है।एक किसान के उदाहरण में, बेलिंग और गोदाम भंडारण के माध्यम से बेहतर कीमत मिलने पर 110 क्विंटल उत्पादन पर ₹1.1 लाख अतिरिक्त लाभ हुआ।संस्थागत सहयोग और भविष्यइस तकनीक के विकास और प्रसार के लिए Central Institute for Research on Cotton Technology तथा Bajaj Industries के साथ साझेदारी की गई है। साथ ही, ‘RAFTAAR’ योजना के तहत ₹20 लाख की वित्तीय सहायता भी प्रदान की गई है।संस्थान के निदेशक Dr. S. K. Shukla के अनुसार, इस मशीन को सरकारी सब्सिडी योजनाओं में शामिल करने के प्रयास जारी हैं, जिससे यह तकनीक अधिक किसानों तक पहुँच सके। निष्कर्षकच्चे कपास की खेत-स्तरीय बेलिंग तकनीक न केवल अशुद्धियों को कम करती है, बल्कि भंडारण, परिवहन और विपणन को भी अधिक कुशल बनाती है। हालांकि अभी इसकी जागरूकता सीमित है, लेकिन भविष्य में यह तकनीक कपास उद्योग में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।और पढ़ें :- रुपया 14 पैसे की गिरावट के साथ 94.75 पर खुला.

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