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कपास आयात शुल्क हटाने की मांग तेज

कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की मांग तेज, टेक्सटाइल मंत्रालय कर रहा अध्ययनकोयंबटूर/नई दिल्ली: देश की टेक्सटाइल और अपैरल इंडस्ट्री ने कच्चे कॉटन पर लगने वाली 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। उद्योग संगठनों का कहना है कि घरेलू बाजार में कॉटन की सीमित उपलब्धता और बढ़ती कीमतों के कारण स्पिनिंग मिलों तथा डाउनस्ट्रीम टेक्सटाइल कंपनियों पर लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में आयात शुल्क हटाना उद्योग के लिए जरूरी हो गया है।हाल ही में मुंबई में आयोजित कॉटन प्रोडक्शन एंड कंजम्पशन कमिटी की बैठक में उपभोक्ता उद्योग के प्रतिनिधियों ने यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया। इसके बाद टेक्सटाइल कमिश्नर कार्यालय ने केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्रालय को सिफारिश भेजी है कि अगले पांच वर्षों तक हर साल अप्रैल से सितंबर के बीच कॉटन इंपोर्ट पर लगने वाली ड्यूटी को अस्थायी रूप से निलंबित किया जाए। फिलहाल यह प्रस्ताव मंत्रालय के विचाराधीन है और सरकार इसके आर्थिक व व्यापारिक प्रभावों का अध्ययन कर रही है।कोयंबटूर में आयोजित स्टेकहोल्डर्स मीटिंग के दौरान उद्योग संगठनों ने कहा कि ड्यूटी हटने से भारतीय मिलों को वैश्विक बाजार के बराबर प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलेगा। उनका मानना है कि इससे घरेलू उद्योग को बेहतर गुणवत्ता वाला कच्चा माल उचित कीमत पर उपलब्ध हो सकेगा और कॉटन की कमी से पैदा दबाव कम होगा।उद्योग संगठनों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में टेक्सटाइल इंडस्ट्री की कॉटन आवश्यकता लगभग 337 लाख बेल रहने का अनुमान है, जबकि उपलब्धता करीब 292.15 लाख बेल रहने की संभावना है। इससे लगभग 45 लाख बेल की कमी पैदा हो सकती है। संगठनों का दावा है कि यदि समय रहते आयात आसान नहीं किया गया तो इसका असर पूरी कॉटन वैल्यू चेन पर पड़ेगा, जिससे सीधे जुड़े करीब 3.5 करोड़ लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।इस बीच, अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के चेयरमैन ए. शक्तिवेल के नेतृत्व में उद्योग प्रतिनिधिमंडल ने उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और टेक्सटाइल मंत्री गिरिराज सिंह से मुलाकात कर ड्यूटी हटाने की मांग दोहराई। तमिलनाडु सरकार ने भी केंद्र से कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी समाप्त करने और राज्य में CCI वेयरहाउस स्थापित करने की मांग की है।और पढ़ें:- डॉलर के मुकाबले रुपया 10 पैसे गिरकर 95.97 पर बंद हुआ।

कॉटन मिशन की सफलता में तकनीक कितनी जरूरी?

क्या नई टेक्नोलॉजी के बिना सफल हो पाएगा भारत का कॉटन मिशन?भारत का कॉटन सेक्टर एक बार फिर बदलाव के मोड़ पर खड़ा है। 2002 में शुरू हुए टेक्नोलॉजी मिशन ऑन कॉटन (TMC) ने Bt कॉटन जैसी नई तकनीक के जरिए देश में कॉटन उत्पादन और निर्यात को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। 2002 से 2015 के बीच कॉटन उत्पादकता करीब 300 किलोग्राम लिंट प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 500 किलोग्राम से अधिक हो गई। भारत दुनिया का सबसे बड़ा कॉटन उत्पादक और निर्यातक बनकर उभरा।लेकिन 2015 के बाद नई तकनीकों की कमी, बढ़ती लागत और पिंक बॉलवर्म जैसी समस्याओं के कारण कॉटन सेक्टर की रफ्तार धीमी पड़ गई। उत्पादन 390 लाख गांठ के रिकॉर्ड स्तर से घटकर लगभग 290 लाख गांठ तक पहुंच गया। इससे न केवल किसानों की आय प्रभावित हुई, बल्कि टेक्सटाइल उद्योग को भी कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ा।सरकार ने अब ₹5,659 करोड़ के कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन (MCP) की घोषणा की है, जिसका लक्ष्य 2031 तक उत्पादकता को 440 किलोग्राम से बढ़ाकर 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पारंपरिक उपायों से यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।मिशन में हाई डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS), बेहतर बीज और उन्नत खेती तकनीकों पर जोर दिया गया है, लेकिन असली चुनौती नई जेनेटिक टेक्नोलॉजी और मशीनीकरण की कमी है। किसान तेजी से हर्बिसाइड-टॉलरेंट Bt कॉटन जैसी तकनीकों की मांग कर रहे हैं, जबकि रेगुलेटरी मंजूरी में लगातार देरी हो रही है।विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को AI आधारित पेस्ट मॉनिटरिंग, IoT खेती, रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर और नई जेनेटिक टेक्नोलॉजी को अपनाना होगा। बिना तकनीकी नवाचार के केवल नीतियों और पारंपरिक तरीकों से कॉटन उत्पादन में बड़ी वृद्धि संभव नहीं दिखती। यदि भारत को वैश्विक कॉटन बाजार में अपनी मजबूत स्थिति फिर से हासिल करनी है, तो विज्ञान और तकनीक आधारित व्यापक सुधार जरूरी होंगे।

कपास क्षेत्र के लिए ₹5,659 करोड़ की पहल

भारतीय कपड़ा उद्योग ने कपास पर ₹5,659 करोड़ के मिशन का स्वागत किया, जिसका उद्देश्य उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना हैभारतीय कपड़ा उद्योग ने केंद्र सरकार द्वारा कपास पर पाँच साल के मिशन को मंज़ूरी देने का स्वागत किया है। इस मिशन का उद्देश्य ₹5,659.22 करोड़ के खर्च के साथ कपास की उत्पादकता बढ़ाना है। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि यह पहल कपास की खेती को मज़बूत करेगी, उत्पादकता में सुधार लाएगी, और भारत के कपड़ा और परिधान क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगी।कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री के चेयरमैन अश्विन चंद्रन ने कहा कि कैबिनेट का यह फ़ैसला इस क्षेत्र को एक बड़ी गति देगा, खासकर ऐसे समय में जब भारत मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) से मिलने वाले अवसरों का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत के कपास क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे असंतुलन को दूर करने में मदद करेगा।हालाँकि भारत दुनिया के सबसे बड़े कपास उत्पादकों में से एक है, लेकिन इसकी उत्पादकता का स्तर तुलनात्मक रूप से कम बना हुआ है, जिसका असर देश की निर्यात प्रतिस्पर्धा पर पड़ता है। चंद्रन ने बताया कि कपड़ा और परिधान उद्योग के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाक़ात की, ताकि कपास की पूरी मूल्य श्रृंखला में आने वाली चुनौतियों को उजागर किया जा सके और सरकार से हस्तक्षेप की मांग की जा सके।सदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन के चेयरमैन दुराई पलानीसामी ने याद दिलाया कि 1999 में शुरू किए गए 'टेक्नोलॉजी मिशन ऑन कॉटन' (TMC) ने इस क्षेत्र में काफ़ी बदलाव लाए थे। 2013-14 तक कपास का उत्पादन लगभग 178 लाख गांठों से बढ़कर लगभग 398 लाख गांठें हो गया था, जबकि खेती का रकबा 92 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 128 लाख हेक्टेयर हो गया था, जो वैश्विक कपास रकबे का लगभग 36–38% था।हालाँकि, TMC के बंद होने के बाद, कपास पर नीतिगत ध्यान धीरे-धीरे कम हो गया, जिससे हाल के वर्षों में उत्पादकता और उत्पादन में गिरावट आई है; वर्तमान उत्पादन लगभग 292 लाख गांठें होने का अनुमान है।उद्योग जगत के नेताओं को उम्मीद है कि यह नया मिशन कपड़ा क्षेत्र को गुणवत्तापूर्ण कपास की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा और 'एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल' (ELS) कपास के आयात पर निर्भरता को कम करेगा। उन्होंने बताया कि भारत की कपास उत्पादकता, जिसका अनुमान 450–500 किलोग्राम लिंट प्रति हेक्टेयर है, ब्राज़ील और चीन जैसे देशों की तुलना में कम बनी हुई है।इस बीच, 'साउथ इंडिया होज़री मैन्युफ़ैक्चरर्स एसोसिएशन' ने केंद्र सरकार से कपास पर आयात शुल्क हटाने और सूत की कीमतों को स्थिर करने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया है।

खरगोन में कपास सीजन की शुरुआत, वैज्ञानिक खेती पद्धति पर जोर

खरगोन में शुरू हुई ‘व्हाइट गोल्ड’ की तैयारी, खेती में सही तकनीक पर जोरमध्य प्रदेश के खरगोन जिले में किसानों ने खरीफ सीजन की तैयारियां तेज कर दी हैं. प्रदेश के सबसे बड़े कपास उत्पादक जिले के रूप में पहचान रखने वाला खरगोन हर साल लाखों क्विंटल कपास उत्पादन करता है. जिले की अर्थव्यवस्था में कपास की अहम भूमिका होने के कारण किसानों की उम्मीदें भी इस फसल से जुड़ी रहती हैं. हालांकि हर सीजन में किसान अलग-अलग कपास वैरायटी को लेकर असमंजस में रहते हैं और किसी एक विशेष किस्म की ओर तेजी से आकर्षित हो जाते हैं. लेकिन कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि बेहतर उत्पादन के लिए केवल वैरायटी नहीं, बल्कि सही खेती तकनीक और फसल प्रबंधन अधिक महत्वपूर्ण है.खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह के अनुसार जिले में खरीफ सीजन के दौरान बीटी कॉटन की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. “सफेद सोना” कहलाने वाली इस फसल की देश और विदेश दोनों बाजारों में अच्छी मांग रहती है. उन्होंने बताया कि वर्तमान में उपलब्ध लगभग सभी बीटी-2 कपास वैरायटी अच्छी उत्पादन क्षमता रखती हैं, इसलिए किसानों को किसी एक किस्म के पीछे भागने की जरूरत नहीं है.विशेषज्ञों का कहना है कि खेत की सही तैयारी अच्छी पैदावार की सबसे बड़ी कुंजी है. गहरी जुताई, समय पर बुवाई और संतुलित उर्वरकों का उपयोग उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है. किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है, ताकि फसल को सही पोषण मिले और लागत भी नियंत्रित रहे.कपास की फसल में जल प्रबंधन और कीट नियंत्रण को भी बेहद जरूरी बताया गया है. जरूरत के अनुसार सिंचाई करना, खेत में जलभराव रोकना और समय पर कीटनाशक छिड़काव फसल को सुरक्षित रखने में मदद करता है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यदि किसान आधुनिक तकनीकों और नियमित निगरानी को अपनाएं तो किसी भी अच्छी वैरायटी से बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा हासिल किया जा सकता है.

कपास किसानों के लिए हरियाणा सरकार की नई प्रोत्साहन पहल

हरियाणा में घटती कपास खेती को बचाने के लिए सरकार का खास अभियान शुरूहरियाणा में पिछले छह वर्षों के दौरान कपास की खेती में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. राज्य में 2019-20 में करीब 8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई होती थी, लेकिन 2024-25 तक यह रकबा घटकर लगभग 3.9 लाख हेक्टेयर रह गया है. लगातार कम होते रकबे और किसानों के कपास से दूरी बनाने के बाद अब राज्य सरकार ने इस फसल को दोबारा बढ़ावा देने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है.कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने “प्रमोशन फॉर कॉटन कल्टीवेशन इन हरियाणा (PCCH)” नाम से नई पहल शुरू की है. इस योजना का उद्देश्य किसानों का कपास खेती पर भरोसा वापस लाना और उत्पादन को फिर से मजबूत करना है. अभियान के तहत सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, चरखी दादरी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जैसे प्रमुख कपास उत्पादक जिलों पर विशेष फोकस किया जाएगा.विशेषज्ञों के अनुसार कपास क्षेत्र में गिरावट की सबसे बड़ी वजह पिछले वर्षों में बढ़े कीट हमले और फसल नुकसान रहे हैं. लगातार नुकसान झेलने के बाद कई किसानों ने धान जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख कर लिया, जिससे पारंपरिक कपास बेल्ट प्रभावित हुआ है.नई योजना के तहत हर जिले में दो एकड़ के डेमो प्लॉट तैयार किए जाएंगे. इन प्लॉट्स की निगरानी कृषि विभाग और चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मिलकर करेंगे. यहां किसानों को जमीन की तैयारी, बुवाई, सिंचाई, कीटनाशक प्रबंधन और कटाई तक की पूरी प्रक्रिया का व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा.राज्य समन्वयक डॉ. अरुण कुमार यादव के मुताबिक किसानों को रोग और हानिकारक कीटों की पहचान के साथ खाद और दवाइयों के संतुलित उपयोग की जानकारी भी दी जाएगी. आसपास के किसान इन डेमो फार्मों का दौरा कर विशेषज्ञों से सीधे सीख सकेंगे. सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से किसानों का भरोसा बढ़ेगा और आने वाले वर्षों में हरियाणा में कपास का रकबा फिर से बढ़ सकता है.

कपास 10 हजार पार, फिर भी किसानों को नहीं फायदा

कपास 10,000 रुपये प्रति क्विंटल के पार, फिर भी किसानों को नहीं मिला लाभपुराने आदिलाबाद ज़िले में कपास की कीमतें बढ़कर 10,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँच गई हैं, लेकिन अधिकांश किसानों को इसका फायदा नहीं मिल पाया। वजह यह रही कि किसानों ने अपनी फसल पहले ही कम दामों पर बेच दी थी। किसानों ने बाजार की अस्थिरता और नमी से जुड़ी खरीद शर्तों को अपने नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया।आदिलाबाद में इस बार कपास की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है। इसके बावजूद किसानों में उत्साह नजर नहीं आया, क्योंकि ज्यादातर किसान अपनी उपज पहले ही बेच चुके थे। केवल कुछ किसान, जिन्होंने अपनी कपास को घरों में सुरक्षित रखा था, अब बढ़ी हुई कीमतों का लाभ उठाकर मुनाफा कमा रहे हैं।कई किसानों का कहना है कि कपास बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव बना रहा, जिससे उन्हें सही समय पर उचित दाम नहीं मिल सके। नतीजतन, बड़ी संख्या में किसानों को इस नकदी फसल की खेती में नुकसान उठाना पड़ा।पुराना आदिलाबाद ज़िला — जिसमें आदिलाबाद, मंचेरियल, कुमराम भीम आसिफाबाद और निर्मल जिले शामिल हैं — राज्य के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है। इस क्षेत्र में करीब 12.60 लाख एकड़ में कपास की खेती की गई थी और अनुमानित उत्पादन 80 लाख क्विंटल रहा।भारतीय कपास निगम (CCI) ने लगभग 40.25 लाख क्विंटल कपास की खरीद की, जबकि शेष उपज निजी व्यापारियों द्वारा खरीदी गई।

अमेरिका में सूखे मौसम की चिंताओं के चलते ICE कॉटन वायदा में तेज़ी

US में सूखे मौसम की चिंताओं से ICE कॉटन वायदा कीमतों में उछालबुधवार को ICE कॉटन वायदा कीमतें बढ़त के साथ बंद हुईं, क्योंकि US के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों, खासकर पश्चिमी टेक्सास में जारी सूखे मौसम की चिंताओं ने बाज़ार में तेज़ी के रुख को बनाए रखने में मदद की। कारोबारी कम बारिश और बढ़ती नमी की कमी (moisture stress) को लेकर चिंतित रहे, जिसका असर फसल के विकास और उत्पादन की संभावनाओं पर पड़ सकता है। ज़ोरदार सट्टेबाज़ी वाली खरीदारी ने भी पूरे सत्र के दौरान कीमतों को मज़बूत बनाए रखा।सबसे ज़्यादा सक्रिय जुलाई 2026 का कॉटन अनुबंध 86.81 सेंट प्रति पाउंड पर बंद हुआ; इसमें 0.49 सेंट की बढ़त दर्ज की गई। यह इस सीज़न का दूसरा सबसे ऊँचा बंद भाव था, और अप्रैल 2024 के बाद से सबसे मज़बूत बंद भाव भी। दिसंबर 2026 का अनुबंध 86.46 सेंट पर समाप्त हुआ, जिसमें 0.18 सेंट की बढ़त हुई; यह भी मौजूदा तेज़ी के दौर के सबसे ऊँचे स्तरों में से एक था।कपास की कीमतों को कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भी सहारा मिला, जिसमें तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा था। ऊर्जा की ऊँची कीमतें पॉलिएस्टर और अन्य सिंथेटिक रेशों के उत्पादन की लागत बढ़ा देती हैं, जिससे कपास जैसे प्राकृतिक रेशों की प्रतिस्पर्द्धात्मकता बेहतर होती है। इसके अलावा, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल कपड़ा सामग्री में बढ़ती वैश्विक रुचि ने कपास की मांग को लंबे समय तक सहारा देना जारी रखा।बाज़ार के प्रतिभागियों ने US कपास के लिए चीन की ओर से मज़बूत मांग की संभावना पर भी चर्चा की, जिसमें चीनी सरकारी रिज़र्व द्वारा खरीदारी के बारे में बाज़ार में फैली अफ़वाहें भी शामिल थीं। इन उम्मीदों ने वायदा कारोबार को और भी मज़बूती दी।इस बीच, 12 मई तक ICE प्रमाणित कपास का स्टॉक 1,160 गांठ बढ़कर 185,378 गांठ हो गया। ब्राज़ील में, कंसल्टेंसी फर्म Safras & Mercado ने देश की 2025-26 की कपास की फसल का अनुमान 3.347 मिलियन टन लगाया है, जो व्यापार जगत की पिछली उम्मीदों से थोड़ा कम है।व्यापक वित्तीय बाज़ारों ने भी कपास के व्यापार को प्रभावित किया। US के थोक मुद्रास्फीति के आँकड़े उम्मीद से ज़्यादा मज़बूत आने से फेडरल रिज़र्व द्वारा तत्काल ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें कम हो गईं, जबकि US और ईरान के बीच चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने कमोडिटी बाज़ारों को अस्थिर बनाए रखा। हालाँकि, US के इक्विटी बाज़ारों में मज़बूती और निवेशकों के बढ़े हुए आत्मविश्वास ने कुल मिलाकर जोखिम लेने की प्रवृत्ति (risk appetite) को सहारा दिया।व्यापारिक गतिविधियाँ मज़बूत बनी रहीं, और कपास वायदा का कुल वॉल्यूम 81,518 अनुबंधों तक पहुँच गया। ओपन इंटरेस्ट (खुली स्थिति) में थोड़ी बढ़त हुई और यह 335,218 अनुबंधों तक पहुँच गया; यह दर्शाता है कि कारोबारियों ने बड़े पैमाने पर तेज़ी वाली स्थितियाँ बनाए रखीं, जबकि ऑप्शंस ट्रेडिंग भी सक्रिय रही। ट्रेडर्स अब बाज़ार की नई दिशा जानने के लिए आने वाले USDA एक्सपोर्ट सेल्स डेटा, CFTC ऑन-कॉल रिपोर्ट और साप्ताहिक Commitment of Traders (COT) रिपोर्ट पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं। कुल मिलाकर, मौसम के जोखिमों, अमेरिका में बुवाई में देरी, कच्चे तेल की मज़बूत कीमतों और एक्सपोर्ट की मज़बूत मांग की उम्मीदों के चलते, कॉटन फ्यूचर्स में अभी भी सावधानी भरा तेज़ी का रुख बना हुआ है।और पढ़ें :- बढ़ती लागत और वैश्विक चुनौतियों से गुजरात का कपड़ा उद्योग दबाव में

बढ़ती लागत और वैश्विक चुनौतियों से गुजरात का कपड़ा उद्योग दबाव में

बढ़ती लागत और वैश्विक चुनौतियों से गुजरात के कपड़ा उद्योग पर दबाव बढ़ रहा है।गुजरात का कपड़ा उद्योग - जिसे व्यापक रूप से भारत के मानव निर्मित फाइबर (एमएमएफ) क्षेत्र की रीढ़ माना जाता है - अपने हाल के इतिहास में सबसे गंभीर वित्तीय मंदी में से एक का सामना कर रहा है, जिसमें दक्षिण गुजरात का कपड़ा केंद्र सूरत संकट के केंद्र में है।पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, धागे की बढ़ती लागत, वैश्विक मांग में कमी और बढ़ते व्यापारिक दबावों के संयोजन ने इस क्षेत्र को गहरे संकट में धकेल दिया है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, पिछले 60 दिनों में लगभग ₹2,500-₹3,000 करोड़ का नुकसान हुआ है, और कई बुनाई इकाइयां अब अपनी स्थापित क्षमता के लगभग आधे पर ही काम कर रही हैं।भारत के सबसे बड़े कपड़ा उत्पादन केंद्रों में से एक सूरत, वर्तमान में उद्योग जगत के हितधारकों द्वारा वर्णित "लागत वृद्धि और कमजोर बाजार मांग" के "भयंकर संकट" का सामना कर रहा है। भू-राजनीतिक अस्थिरता से जुड़े एक बाहरी झटके के रूप में शुरू हुआ यह संकट तेजी से क्षेत्र की कपड़ा अर्थव्यवस्था पर संरचनात्मक दबाव में तब्दील हो गया है, जिससे निर्माताओं, व्यापारियों और संबंधित श्रमिकों के मुनाफे पर भारी दबाव पड़ रहा है।इस संकट की जड़ में कच्चे तेल की कीमतों में आई तीव्र वृद्धि है, जिसने एमएमएफ मूल्य श्रृंखला को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। चूंकि अधिकांश सिंथेटिक वस्त्र उत्पादन पेट्रोलियम से प्राप्त कच्चे माल पर बहुत अधिक निर्भर करता है, इसलिए कच्चे तेल की ऊंची दरों ने धागे की कीमतों को काफी बढ़ा दिया है। इनपुट लागत में भारी वृद्धि के बावजूद, बाजार में कपड़े की कीमतों में उस अनुपात में समायोजन नहीं हुआ है, जिससे उत्पादन लागत और प्राप्ति के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है।गुजरात बुनकर संघ (FOGWA) के अध्यक्ष अशोक जिरावाला के अनुसार, कई निर्माताओं को अपना परिचालन जारी रखने के लिए उत्पादन लागत से कम कीमत पर सामान बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि बढ़ती इनपुट लागत और स्थिर बाजार कीमतों के बीच असंतुलन के कारण पूरे क्षेत्र में दैनिक नुकसान एक लगातार बोझ बन गया है।और पढ़ें :-तिरुपूर गारमेंट इंडस्ट्री ने केंद्र से कपास पर आयात शुल्क हटाने की अपील की।

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